Saturday, September 30, 2017

सुबह की स्नान को सास्त्र में चार नाम दिए गए है जाने क्या

*स्नान कब ओर केसे करे घर की समृद्धि बढाना हमारे हाथमे है*
सुबह के स्नान को धर्म शास्त्र में चार उपनाम दिए है।

*1*  *मुनि स्नान।*
जो सुबह 4 से 5 के बिच किया जाता है।
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*2*  *देव स्नान।*
जो सुबह 5 से 6 के बिच किया जाता है।
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*3*  *मानव स्नान।*
जो सुबह 6 से 8 के बिच किया जाता है।
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*4*  *राक्षसी स्नान।*
जो सुबह 8 के बाद किया जाता है।

▶मुनि स्नान सर्वोत्तम है।
▶देव स्नान उत्तम है।
▶मानव स्नान समान्य है।
▶राक्षसी स्नान धर्म में निषेध है।
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किसी भी मानव को 8 बजे के बाद स्नान नही करना चाहिए।
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*मुनि स्नान .......*
👉🏻घर में सुख ,शांति ,समृद्धि, विध्या , बल , आरोग्य , चेतना , प्रदान करता है।
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*देव स्नान ......*
👉🏻 आप के जीवन में यश , किर्ती , धन वैभव,सुख ,शान्ति, संतोष , प्रदान करता है।
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*मानव स्नान.....*
👉🏻काम में सफलता ,भाग्य ,अच्छे कर्मो की सूझ ,परिवार में एकता , मंगल मय , प्रदान करता है।
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*राक्षसी स्नान.....*
👉🏻 दरिद्रता , हानि , कलेश ,धन हानि , परेशानी, प्रदान करता है ।
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किसी भी मनुष्य को 8 के बाद स्नान नही करना चाहिए।
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पुराने जमाने में इसी लिए सभी सूरज निकलने से पहले स्नान करते थे।

*खास कर जो घर की स्त्री होती थी।* चाहे वो स्त्री माँ के रूप में हो,पत्नी के रूप में हो,बेहन के रूप में हो।
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घर के बडे बुजुर्ग यही समझाते सूरज के निकलने से पहले ही स्नान हो जाना चाहिए।
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*ऐसा करने से धन ,वैभव लक्ष्मी, आप के घर में सदैव वास करती है।*
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उस समय...... एक मात्र व्यक्ति की कमाई से पूरा हरा भरा पारिवार पल जाता था , और आज मात्र पारिवार में चार सदस्य भी कमाते है तो भी पूरा नही होता।
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उस की वजह हम खुद ही है । पुराने नियमो को तोड़ कर अपनी सुख सुविधा के लिए नए नियम बनाए है।
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प्रकृति ......का नियम है, जो भी उस के नियमो का पालन नही करता ,उस का दुष्टपरिणाम सब को मिलता है।
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इसलिए अपने जीवन में कुछ नियमो को अपनाये । ओर उन का पालन भी करे।
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आप का भला हो ,आपके अपनों का भला हो।
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मनुष्य अवतार बार बार नही मिलता।
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अपने जीवन को सुखमय बनाये।

जीवन जीने के कुछ जरूरी नियम बनाये।
☝🏼 *याद रखियेगा !* 👇🏽
*संस्कार दिये बिना सुविधायें देना, पतन का कारण है।*
*सुविधाएं अगर आप ने बच्चों को नहीं दिए तो हो सकता है वह थोड़ी देर के लिए रोए।*
*पर संस्कार नहीं दिए तो वे जिंदगी भर रोएंगे।*
ऊपर जाने पर एक सवाल ये भी पूँछा जायेगा कि अपनी अँगुलियों के नाम बताओ ।
जवाब:-
अपने हाथ की छोटी उँगली से शुरू करें :-
(1)जल
(2) पथ्वी
(3)आकाश
(4)वायू
(5) अग्नि
ये वो बातें हैं जो बहुत कम लोगों को मालूम होंगी ।

5 जगह हँसना करोड़ो पाप के बराबर है
1. श्मशान में
2. अर्थी के पीछे
3. शौक में
4. मन्दिर में
5. कथा में

सिर्फ 1 बार भेजो बहुत लोग इन पापो से बचेंगे ।।

अकेले हो?
परमात्मा को याद करो ।

परेशान हो?
ग्रँथ पढ़ो ।

उदास हो?
कथाए पढो ।

टेन्शन मे हो?
भगवत गीता पढो ।

फ्री हो?
अच्छी चीजे फोरवार्ड करो
हे परमात्मा हम पर और समस्त प्राणियो पर कृपा करो......

सूचना
क्या आप जानते हैं ?
हिन्दू ग्रंथ रामायण, गीता, आदि को सुनने,पढ़ने से कैन्सर नहीं होता है बल्कि कैन्सर अगर हो तो वो भी खत्म हो जाता है।

व्रत,उपवास करने से तेज़ बढ़ता है,सर दर्द और बाल गिरने से बचाव होता है ।
आरती----के दौरान ताली बजाने से
दिल मजबूत होता है ।

ये मेसेज असुर भेजने से रोकेगा मगर आप ऐसा नही होने दे और मेसेज सब नम्बरो को भेजे ।

श्रीमद भगवत गीता पुराण और रामायण ।
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''कैन्सर"
एक खतरनाक बीमारी है...
बहुत से लोग इसको खुद दावत देते हैं ...
बहुत मामूली इलाज करके इस
बीमारी से काफी हद तक बचा जा सकता है ...

अक्सर लोग खाना खाने के बाद "पानी" पी लेते है ...
खाना खाने के बाद "पानी" ख़ून में मौजूद "कैन्सर "का अणु बनाने वाले '''सैल्स'''को '''आक्सीजन''' पैदा करता है...

''हिन्दु ग्रंथो मे बताया गया है कि...

खाने से पहले'पानी 'पीना
अमृत"है...

खाने के बीच मे 'पानी ' पीना शरीर की
''पूजा'' है...

खाना खत्म होने से पहले 'पानी'
''पीना औषधि'' है...

खाने के बाद 'पानी' पीना"
बीमारीयो का घर है...

बेहतर है खाना खत्म होने के कुछ देर बाद 'पानी 'पीये...

ये बात उनको भी बतायें जो आपको "जान"से भी ज्यादा प्यारे है...

जय श्री राम

रोज एक सेब
नो डाक्टर ।

रोज पांच बदाम,
नो कैन्सर ।

रोज एक निबु,
नो पेट बढना ।

रोज एक गिलास दूध,
नो बौना (कद का छोटा)।

रोज 12 गिलास पानी,
नो चेहेरे की समस्या ।

रोज चार काजू,
नो भूख ।

रोज मन्दिर जाओ,
नो टेन्शन ।

रोज कथा सुनो
मन को शान्ति मिलेगी ।।

"चेहरे के लिए ताजा पानी"।

"मन के लिए गीता की बाते"।

"सेहत के लिए योग"।

और खुश रहने के लिए परमात्मा को याद किया करो ।

अच्छी बाते फैलाना पुण्य है.किस्मत मे करोड़ो खुशियाँ लिख दी जाती हैं ।
जीवन के अंतिम दिनो मे इन्सान इक इक पुण्य के लिए तरसेगा ।

जब तक ये मेसेज भेजते रहोगे मुझे और आपको इसका पुण्य मिलता रहेगा...

जय श्री राम

नवमी में माँ के रंग में रँगे भक्त व्यवस्था चाक चौबंद

गोण्डा  पवन कुमार द्विवेदी
मेहनौन में मौजूद माता पटमेश्वरी देवी मंदिर सहित इटियाथोक  क्षेत्र के अनेको देवी स्थानों पर आज नवमी के अवसर पर देवी भक्तो भारी भीड़ रही।सभी जगह
हवन और प्रसाद वितरण के कार्यक्रम हुए।इन स्थानों पर आज दिनभर चहल पहल रही। कई जगह भंडारे के कार्यक्रम भी आयोजित हुए जिसमे तमाम स्थानीय लोग सम्लित रहे।कुछ
स्थानों पर भंडारे का आयोजन शनिवार को होगा।मेहनौन में देवी मंदिर पर नवमी को क्षेत्र के सैकड़ो भक्तो ने दूर दूर से आकर
देवी दर्शन किये,आज यहाँ सबसे अधिक भीड़ देखी गई।इस मंदिर समिति के सदस्यों द्वारा बताया गया की आज दिनभर यहाँ लोगो की अपार भीड़ रही जो इससे पहले कभी शायद नही रही।
मंदिर के निर्माण प्रभारी पं0 रामानंद तिवारी ने बताया की
इतनी भीड़ के बावजूद भी धानेपुर पुलिस के सहयोग से सबकुछ शांतिपूर्वक रहा,कोई अप्रिय घटना नही हुई।बताया की कल भी यहाँ भीड़ होगी और विविध धार्मिक अनुष्ठान होंगे।
इटियाथोक क्षेत्र अंतर्गत अर्जुनपुर के कामिनपुर मंदिर और विशुनपुर संगम के मुरलीपुरवा देवी मंदिर पर भी लोग भारी संख्या में मौजूद रहे, यहाँ भी हवन और प्रसाद वितरण के कार्यक्रम हुए।माँ की आरती व जयकारो से क्षेत्र के माता पांडाल भक्तिमय रहे।इसी क्रम में इटियाथोक कसबे के काली मन्दिर में हवन का आयोजन किया गया जिसमें लोगो ने बढ़चढ़ कर भाग लिया। हवन पूजन कार्यक्रम के बाद कन्याओ का पूजन अर्चन हुवा तत्पश्चात कन्याभोज आयोजित किया गया।जिसमें माँदुर्गा की रूप के कन्याओ को महिलाओं ने लालचुनरी पहनाकर हलुवा-पूड़ी का प्रसाद खिलाया।तमाम माँ भक्तो ने यहाँ सभी कन्याओ का आशीर्वाद प्राप्त किया।

Friday, September 29, 2017

मुम्बई हादसे का जिम्मेदार कौन

मुंबईः मुंबई के वेस्टर्नव लाइन पर स्थित एलफिंसटन रेलवे ब्रिज पर मची भगदड़ में अब तक 19 लोगों की मौत हो गई है वहीं 30 लोग इस हादसे में जख्मी हुए हैं. ये घटना सुबह करीब 9.30 बजे घटी. ब्रिज टूटने की अफवाह के कारण ये भगदड़ मची और जिस वक्त से भगदड़ हई उस वक्त बारिश हो रही थी और फिसलन के कारण इतना बड़ा हादसा हो गया. एलफिंसटन ब्रिज सेंट्रल और वेस्टर्न लाइन को जोड़ता है लिहाजा इस पर काफी भीड़ रहती है.

मौका-ए-वारदात पर मौजूद एक चश्मदीद के मुताबिक सबसे पहले एक शख्स फिसल कर नीचे आया फिर लोग एक के ऊपर एक चढ़ते गए. 16 लोगों की मौत हुई है बाकि कोई गिनती ही नहीं है कई लोग घायल पड़े हुए हैं. कोई अफवाह नहीं हुआ ये हादसा. सहां सीढ़िया इतनी गंदी पड़ी हुई है ये साफ तौर पर सरकार की गलती है. बारिश के पानी और गंदगी से हुए फिसलन के कारण ये हादसा हुआ है.
चश्मदीद ने आगे बताया कि लगभग 150 लोग ब्रिज पर हादसे के वक्त मौजूद थे. टिकट काउंटर से लेकर लोग सीढ़ियों तक भरे थे. लोग एक के ऊपर एक गिर गए. हमने निकालने की कोशिश की तो लोग इस कदर दब चुके थे कि निकल नहीं पा रहे थे. एक बच्चा भी भगदड़ में दब गया. ये सरकार की जिम्मेदारी है की सीढ़िया साफ हो और नई बनाई जाएं. यहां फिसलन बहुत ज्यादा होती है और भीड़ को देखते हुए पुल को और बढ़ाया जाए. जो भी हुआ है वो ब्रिज के कारण हुआ है. शॉर्ट सर्किट या कोई अफवाह के कारण नहीं हुआ है.
पुलिस ने क्या कहा?
पुलिस के मुताबिक अब तक 19 लोगों की मौत हो चुकी है और 30 से ज्यादा लोग घायल हैं. दरअसल ब्रिज के टूटने की अफवाह फैली और ये सुनते ही लोग जान बचाने के लिए इधर-उधर भागने लगे. अफरातफरी के आलम में लोग एक दूसरे पर चढ़ गए, कूदने लगे. लोगों के कूदने और भागने से लोगों की दब कर मौत हो गई साथ ही कई गंभीर रुप से जख्मी हो गए. इ
दरअसल, जहां हादसा हुआ है वहां बारिश हो रही थी, पिक आवर भी था त्यौहारों के सीजन के कारण काफी भीड़ थी. बड़ी संख्या में लोग इस फूटओवर ब्रिज पर रुक गए और जमा होते गए, तभी ब्रिज की एक शेड के एक टुकड़ा गिरने की अफवाह फैली ऐसी अफरातफरी मची की कयामत जैसा समा हो गया. जान बचाने की इस दौड़ कई जानें हमेशा के लिए नींद से सो गई.
R.g.

जानिए पंचांग के बारे में गूढ़ बात अभय पांडेय के साथ

काल के अविरत प्रवाह को निर्धारित करना मुश्किल है।. और उसी की गिनती के प्रयासरूप से पंचांग की उत्पत्ति की गयी।. काल की गिनती अविकसीय पिण्ड की मद्दत लेके और सूर्य,चंद्र की गति को ध्यान में लेके गिनती शुरू हुई।सूर्य ब्रह्माण्ड के केंद्र में है, और उसी के आसपास अविकसीय पिण्ड घूमते है।. पृथ्वी अपनी धरी पे घूमती है और पृथ्वी का उपग्रह चंद्र जो पृथ्वी के आसपास घूमता है,उसी के साथ पृथ्वी सूर्य के आसपास घूमती है।.पृथ्वी गोल है और वो 21.5° उत्तरध्रुव साइड झुक के अपनी धरी पे फिरती है। उससे ऋतुओं का निर्माण होता है।. और अपनी ही धरी पर पश्चिम से पूर्व की ओर घूमने से दिन और रात होती है।. पृथ्वी को एक भचक्र पूर्ण करने में 24 घंटे लगते है।.इससे मानने में आता है सही में वैधशाला की घड़ी के हिसाब से परीभ्रमण पूर्ण करने में पृथ्वी को 23 घंटे,56 मिनिट, और  04 सेकंड लगते है।. यानी लगभग एक दिन और  एक रात्रि जिसे हम *अहोरात्रि* कहते है। पृथ्वी को सूर्य के आसपास फिरने में एक साल लगता है।.सूर्य स्थिर ओर केंद्र बिंदु होने के बावजूद पृथ्वी वासीओ को पृथ्वी से देखने मे सूर्य घूमता हुआ लगता है।. जिसे हम सूर्य की गति गिनते है। ऐसे सूर्य और चंद्र की गति भेद को ध्यान में लेके समय की गणना सुरु हुई ओर उसमे से पंचांग का उदभव हुवा।
हकीकत में सूर्य स्थिर है। पृथ्वी का सूर्य के आसपास से भ्रमण करने से हमने जो ऊपर दिखाया उस हिसाब से *क्रान्तिवृत* में भ्रमण करता दिखता है, या प्रतीत होता है, बाकी वैसे तो सूर्य स्थिर ही है, ये *क्रान्तिवृत के एक जैसे 12 भाग उसे हम राशियां कहते है और 27 एक जैसे भाग उसे हम नक्षत्र कहेंगे |.अब आगे देखते है।
सूर्य और चंद्र के संबंध से भर्ती ओर ओट आती है।. 0° से 180° सूर्य-चंद्र हो तो बड़ी भर्ती आती है।.
जब इनका अंतर 90° का होता तो भर्ती का प्रमाण कम होता है।.
पृथ्वी अपनी धरी पे पश्चिम से पूर्व की ओर घूमती है। इसलिये हमे सूर्योदय पूर्व में और  सूर्यास्त पश्चिम की तरफ होता दिखता है।.
आकाश में जो स्थिर तारे दिखते है उसे हम *नक्षत्रो* से पहचानते है।. उसी के बीच मे से सूर्य का भ्रमण होता है।. जिसे हम *क्रान्तिवृत* से पहचानते है।.

पृथ्वी का सूर्य के आसपास प्रदक्षिणा से सूर्य का भ्रमण मार्ग कायमी एक जैसा होता है।. ऐसे ही सूर्य का उदय ओर अस्त होना भी वर्ष के हरेक दिन का निर्धारित समय निश्चित होता है।. उसमें किसी प्रकार का बदलाव संभव नही होता।. ऐसे सूर्य की एक सी गति होती है ।. एकबार सूर्य जो नक्षत्र के तारों के पास से भ्रमण होता है तो फिर सूर्य वापिश एक साल बाद फिर वही नक्षत्र के तारों के पास से पसार होता है। ऐसा देखा गया है।.

सूर्य विषुववृत्त से उत्तर में 23.5° ओर दक्षिण में 23.5° के बीच मे भ्रमण करता है।. सूर्य का मार्ग निश्चित होता है।. उससे ऊपर या नीचे सूर्य कभी नही जाता।. ये जो क्षेत्र बनता है उस क्षेत्र को हम *क्रान्तिवृत* कहते है।.

ज्योतिर्विद् अभय पाण्डेय
वाराणसी

जाने क्या होता है कुंडली मिलान में नाड़ी दोस

कुंडली मिलान में नाड़ी दोष का महत्त्व जाने ज्योतिर्विद् अभय पाण्डेय सेनाड़ी दोष विवाह के लिए कुंडली और गुण मिलान करते समय नाड़ी दोष को नजर-अंदाज नहीं करना चाहिए।विवाह में वर-वधू के गुण मिलान में नाड़ी का सर्वाधिक महत्त्व को दिया गया है। 36 गुणों में से नाड़ी के लिए सर्वाधिक 8 गुण निर्धारित हैं। ज्योतिष की दृष्टि में तीन नाडियां होती हैं – आदि, मध्य और अन्त्य।
इन नाडियों का संबंध मानव की शारीरिक धातुओं से है।
वर-वधू की समान नाड़ी होने पर दोषपूर्ण माना जाता है तथा संतान पक्ष के लिए यह दोष हानिकारक हो सकता है।
शास्त्रों में यह भी उल्लेख मिलता है कि:-“नाड़ी दोष केवल ब्रह्मण वर्ग में ही मान्य है”।“समान नाड़ी होने पर पारस्परिक विकर्षण तथा असमान नाड़ी होने पर आकर्षण पैदा होता है |”आयुर्वेद के सिद्धांतों में भी तीन नाड़ियाँ – वात (आदि ), पित्त (मध्य) तथा कफ (अन्त्य) होती हैं। शरीर में इन तीनों नाडियों के समन्वय के बिगड़ने से व्यक्ति रूग्ण हो सकता भारतीय ज्योतिष में नाड़ी का निर्धारण जन्म नक्षत्र से होता है।प्रत्येक नक्षत्र में चार चरण होते हैं।9-नौ नक्षत्रों की एक नाड़ी होती है।
जो इस प्रकार है –आदि नाड़ी अश्विनी, आर्द्रा, पुनर्वसु, उत्तराफाल्गुनी, हस्त, ज्येष्ठा, मूल, शतभिषा, पूर्व भाद्रपद ।
मध्य नाड़ी  भरणी, मृगशिरा, पुष्य, पूर्वाफाल्गुनी, चित्रा, अनुराधा, पूर्वाषाढ़ा, धनिष्ठा और उत्तराभाद्रपद।
★अन्त्य नाड़ी कृतिका, रोहिणी, आश्लेषा, मघा, स्वाति, विशाखा, उत्तराषाढ़ा, श्रवण तथा रेवती ।

 

नाड़ी के तीनों स्वरूपों आदि, मध्य और अन्त्य ..आदि नाड़ी ब्रह्मा विष्णु और महेश का प्रतिनिधित्व करती हैं। यही नाड़ी मानव शरीर की संचरना की जीवन गति को आगे बढ़ाने का भी आधार है।

 

सूर्य नाड़ी, चंद्र नाड़ी और ब्रह्म नाड़ी जिसे इड़ा, पिंगला, सुषुम्णा के नाम से भी जानते हैं। कालपुरुष की कुंडली की संरचना बारह राशियों, सत्ताईस नक्षत्रों तथा योगो करणों आदि के द्वारा निर्मित इस शरीर में नाड़ी का स्थान सहस्रार चक्र के मार्ग पर होता है। यह विज्ञान के लिए अब भी “पहेली”- बना हुआ है कि नाड़ी दोष वालों का ब्लड प्राय: ग्रुप एक ही होता है ।और “ब्लड ग्रुप” एक होने से रोगों के “निदान, चिकित्सा, उपचार” आदि में समस्या आती हैं।

 

यही सोच और वंशवृद्धि का द्योतक “नाड़ी” हमारे दांपत्य जीवन का आधार स्तंभ है। अत: नाड़ी दोष को आप गंभीरता से देखें। यदि एक नक्षत्र के एक ही चरण में वर कन्या का जन्म हुआ हो तो नाड़ी दोष का परिहार संभव नहीं है। और यदि परिहार है भी तो जन मानस के लिए असंभव है। ऐसा देवर्षि नारदने भी कहा है।

 

एक नाड़ी विवाहश्च गुणे:

सर्वें: समन्वित: l

वर्जनीभ: प्रयत्नेन

दंपत्योर्निधनं ll

 

अर्थात वर -कन्या की नाड़ी एक ही हो तो उस विवाह वर्जनीय है। भले ही उसमें सारे गुण हों, क्योंकि ऐसा करने से पति -पत्नी के स्वास्थ्य और जीवन के लिए संकट की आशंका उत्पन्न हो जाती है।

 

पुत्री का विवाह करना हो या पुत्र का, विवाह की सोचते ही “कुण्‍डली मिलाने की सोचते हैं जिससे सब कुछ ठीक रहे और विवाहोपरान्‍त सुखमय गृहस्‍थ जीवन व्‍यतीत हो. कुंडली मिलान के समय आठ कूट मिलाए जाते हैं।

 

इन आठ कूटों के कुल अंक 36 होते हैं. इनमें से एक ..कूट नाड़ी होता है जिसके सर्वाधिक अंक 8 होते हैं. लगभग 23% प्रतिशत इसी कूट के हिस्‍से में आते हैं, इसीलिए नाड़ी दोष प्रमुख है।

 

ऐसी लोक चर्चा है कि वर कन्या की नाड़ी एक हो तो पारि‍वारिक जीवन में अनेक बाधाएं आती हैं और संबंधों के टूटने की आशंका या भय मन में व्‍याप्‍त रहता है. कहते हैं कि यह दोष हो तो संतान प्राप्ति में विलंब या कष्‍ट होता है, पति-पत्नी में परस्‍पर ईर्ष्या रहती है और दोनों में परस्‍पर वैचारिक मतभेद रहता है |.

 

नब्‍बे प्रतिशत लोगों का एकनाड़ी होने पर ब्लड ग्रुप समान और आर एच फैक्‍टर अलग होता है यानि एक का पॉजिटिव तो दूसरे का ऋण होता है. हो सकता है इसलिए भी संतान प्राप्ति में विलंब या कष्‍ट होता है।

 

चिकित्सा विज्ञान की आधुनिक शोधों में भी समान ब्लड ग्रुप वाले युवक युवतियों के संबंध को स्वास्थ्य की दृष्टि से अनउपयुक्त पाया गया है।

 

चिकित्सकों का मानना है कि यदि लड़के का आरएच फैक्टर RH+ पॉजिटिव हो व लड़की का RH- आरएच फैक्टर निगेटिव हो तो विवाह उपरांत पैदा होने वाले बच्चों में अनेक विकृतियाँ सामने आती हैं, जिसके चलते वे मंदबुद्धि व अपंग तक पैदा हो सकते हैं। वहीं रिवर्स केस में इस प्रकार की समस्याएँ नहीं आतीं, इसलिए युवा अपना रक्तपरीक्षण अवश्य कराएँ, ताकि पता लग सके कि वर-कन्या का रक्त समूह क्या है। चिकित्सा विज्ञान अपनी तरह से इस दोष का परिहार करता है, लेकिन “ज्योतिष” ने इस समस्या से बचने और उत्पन्न होने पर नाड़ी दोष के उपाय निश्चित किए हैं ।

 

इन उपायों में जप-तप, दान पुण्य, व्रत, अनुष्ठान आदि साधनात्मक उपचारों को अपनाने पर जोर दिया गया है ।

शास्त्र वचन यह है कि :-

एक ही नाड़ी होने पर-

★गुरु और शिष्य,

★मंत्र और साधक,

★देवता और पूजक में भी क्रमश: ईर्ष्या, अरिष्ट और मृत्यु जैसे कष्टों का भय रहता है |

 

 देवर्षि नारद ने भी कहा है :-

★वर-कन्या की नाड़ी एक ही हो तो वह विवाह वर्जनीय है. भले ही उसमें सारे गुण हों, क्योंकि ऐसा करने से तो पति-पत्नी के स्वास्थ्य और जीवन के लिए संकट की आशंका उत्पन्न हो जाती है ।

 

ll वेदोक्त श्लोक ll

अश्विनी रौद्र आदित्यो,

अयर्मे हस्त ज्येष्ठयो l

निरिति वारूणी पूर्वा

आदि  नाड़ी स्मृताः ll

भरणी सौम्य तिख्येभ्यो,

भग चित्रा अनुराधयो l

आपो च वासवो धान्य

मध्य नाड़ी स्मृताः ll

 

कृतिका रोहणी अश्लेषा,

मघा स्वाती विशाखयो।

विश्वे श्रवण रेवत्यो,

*अंत्य नाड़ी* स्मृताः॥

 

 

★आदि नाड़ी के अंतर्गत नक्षत्र –

क्रम: 01, 06, 07, 12, 13, 18, 19, 24, 25 वें नक्षत्र आते हैं।

 

*★मध्य नाड़ी* के अंतर्गत नक्षत्र –

क्रम : 02, 05, 08, 11, 14, 17, 20, 23, 26 नक्षत्र आते हैं।

 

★अन्त्य नाड़ी* के अंतर्गत क्रम : 03, 04, 09, 10, 15, 16, 21, 22, 27 वें नक्षत्र आते हैं ।

 

★‌‌‌ गण :-

अश्विनी मृग रेवत्यो,

हस्त: पुष्य पुनर्वसुः।

अनुराधा श्रुति स्वाती,

कथ्यते *देवता-गण* ॥

 

त्रिसः पूर्वाश्चोत्तराश्च,

तिसोऽप्या च रोहणी ।

भरणी च मनुष्याख्यो,

गणश्च कथितो बुधे ॥

 

कृतिका च मघाऽश्लेषा,

विशाखा शततारका ।

चित्रा ज्येष्ठा धनिष्ठा,

च मूलं रक्षोगणः स्मृतः॥

 

*देव गण- नक्षत्र :- 01, 05, 27, 13, 08, 07, 17, 22, 15*

*मनुष्य गण-नक्षत :- 11, 12, 20, 21, 25, 26, 06, 04.*

*राक्षस गण- नक्षत्र क्रम:- 03, 10, 09, 16, 24, 14, 18, 23, 19.*

 

स्वगणे परमाप्रीतिर्मध्यमा देवमर्त्ययोः।

मर्त्यराक्षसयोर्मृत्युः कलहो देव रक्षसोः॥

 

“संगोत्रीय विवाह” को कराने के लिए कर्म कांडों में एक विधान है, जिसके चलते संगोत्रीय लड़के का दत्तक दान करके विवाह संभव हो सकता है ।

 

इस विधान में जो माँ-बाप लड़के को गोद लेते हैं। विवाह में उन्हीं का नाम आता है।

 

वहीं ज्योतिष के वैज्ञानिक पक्ष के अनुरूप यदि एक ही रक्त समूह वाले वर-कन्या का विवाह करा दिया जाता है तो उनकी होने वाली संतान विकलांग पैदा हो सकती है।

 

अत: नाड़ी दोष का विचार ही आवश्यक है |.

 

एक नक्षत्र में जन्मे वर कन्या के मध्य नाड़ी दोष समाप्त हो जाता है लेकिन नक्षत्रों में चरण भेद आवश्यक है।

 

ऐसे अनेक सूत्र हैं जिनसे नाड़ी दोष का परिहार हो जाता है।

जैसे दोनों की राशि एक हो लेकिन नक्षत्र अलग-अलग हों |.

वर-कन्या का नक्षत्र एक हो और चरण अलग-अलग हों |.

 

वर-ईश्वर (कृतिका द्वितीय),

वधू-उमा (कृतिका तृतीया)

 

दोनों की अंत्य नाड़ी है। परंतु कृतिका नक्षत्र के चरण भिन्नता के कारण शुभ है।

एक ही नक्षत्र हो परंतु चरण भिन्न हों:– यह निम्न नक्षत्रों में होगा l

 

★आदि नाड़ी

वर- आर्द्रा, (मिथुन),

वधू- पुनर्वसु, प्रथम, तृतीय चरण (मिथुन),

वर उत्तरा फाल्गुनी (कन्या) – *वधू*- हस्त (कन्या राशि).

 

★मध्य नाड़ी

वर- शतभिषा (कुंभ)-

वधू- पूर्वाभाद्रपद प्रथम, द्वितीय, तृतीय (कुंभ),

 

★अन्त्य नाड़ी:-

वर- कृतिका- प्रथम, तृतीय, चतुर्थ (वृष)-

वधू- रोहिणी (वृष)

वर- स्वाति (तुला)-

*वधू*-विशाखा- प्रथम, द्वितीय, तृतीय (तुला)

वर- उत्तराषाढ़ा- द्वितीय, तृतीय, चतुर्थ (मकर)- *वधू*- श्रवण (मकर) –

 

*एक नक्षत्र हो परंतु राशि भिन्न हो*

 

जैसे *वर अनिल*- कृतिका- प्रथम (मेष) तथा *वधू इमरती*-

कृतिका- द्वितीय (वृष राशि)। दोनों की अन्त्य नाड़ी है परंतु राशि भिन्नता के कारण शुभ पाद-वेध नहीं होना चाहिए |.

 

★वर-कन्‍या के नक्षत्र चरण “प्रथम और चतुर्थ” या

★”द्वितीय और तृतीय” नहीं होने चाहिएं |.

 

उक्त परिहारों में यह ध्यान रखें कि वधू की जन्म राशि, नक्षत्र तथा नक्षत्र चरण, वर की राशि, नक्षत्र व चरण से पहले नहीं होने चाहिए। अन्यथा नाड़ी दोष परिहार होते हुए भी शुभ नहीं होगा ।-

 

1.वर- कृतिका- प्रथम (मेष), वधू- कृतिका द्वितीय (वृष राशि)-

2.शुभ वर- कृतिका- द्वितीय (वृष),

वधू-कृतिका- प्रथम (मेष राशि)-अशुभ

 

वैसे तो वर कन्या के राशियों के स्वामी आपस में मित्र हो तो-

★वर्ण दोष,

★वर्ग दोष,

★तारा दोष,

★योनि दोष,

★गण दोष भी …नष्ट हो जाता है |.

 

वर और कन्या की कुंडली में राशियों के स्वामी एक ही हो या मित्र हो अथवा D-9 नवांश के स्वामी परस्पर मित्र हो या एक ही हो तो सभी “कूट-दोष” समाप्त हो जाते हैं।

 

नाड़ी दोष हो तो महामृत्युञ्जय मंत्र का जाप अवश्य करना चाहिए. इससे दांपत्य जीवन में आ रहे सारे दोष समाप्त हो जाते हैं।

 

नाड़ी दोष का उपचार:-

 

पीयूष धारा के अनुसार स्वर्ण दान, गऊ दान, वस्त्र दान, अन्न दान, स्वर्ण की सर्पाकृति बनाकर प्राण प्रतिष्ठा तथा महामृत्युञ्जय जप करवाने से नाड़ी दोष शान्त हो जाता है।

 

ज्योतिषशास्त्र के अनुसार अगर वर और कन्या की (१=१) राशि समान हो तो उनके बीच परस्पर मधुर सम्बन्ध रहता है।

 

दोनों की राशियां एक दूसरे से (४×१०)चतुर्थ और दशम होने पर वर वधू का जीवन सुखमय होता है।

 

तृतीय और एकादश राशि होने पर (३×११) गृहस्थी में धन की कमी नहीं रहती है।

 

ध्यान देने योग्य बात यह भी है कि वर और कन्या की कुण्डली में षष्टम भाव, अष्टम भाव और द्वादश भाव में समान राशि नहीं हो।

 

वर और कन्या की राशि अथवा लग्न समान होने पर गृहस्थी सुखमय रहती है परंतु गौर करने की बात यह है कि-

राशि अगर समान हो तो नक्षत्र भेद होना चाहिए…अगर नक्षत्र भी समान हो तो चरण भेद आवश्यक हो।अगर ऐसा नही है तो राशि लग्न समान होने पर भी वैवाहिक जीवन के सुख में कमी आती है।

 

कुंडली में दोष विचार –

 

विवाह के लिए कुण्डली मिलान करते समय दोषों का भी विचार करना चाहिए |.

 

कन्या की कुण्डली में

वैधव्य योग ,

व्यभिचार योग,

नि:संतान योग,

मृत्यु योग एवं दारिद्र योग हो तो ज्योतिष की दृष्टि से सुखी वैवाहिक जीवन के यह शुभ नहीं होता है।

 

इसी प्रकार वर की कुण्डली में

अल्पायु योग,

नपुंसक योग,

व्यभिचार योग,

पागलपन योग एवं

पत्नी नाश योग ..रहने पर गृहस् जीवन में सुख का अभाव होता है।

ज्योतिष शास्त्र के अनुसार कन्या की कुण्डली में विष कन्या योग होने पर जीवन में सुख का अभाव रहता है।

पति पत्नी के सम्बन्धों में मधुरता नहीं रहती है।

 

हालाँकि कई स्थितियों में कुण्डली में यह दोष प्रभावशाली नहीं होता है अत: जन्म कुण्डली के अलावा नवमांश और चन्द्र कुण्डली से भी इसका विचार करके विवाह किया जा सकता है।

 

ज्योतिर्विद् अभय पाण्डेय

भगवती ज्योतिष परामर्श केन्द्र

वाराणसी

9450537461

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