Friday, September 29, 2017

जानिए पंचांग के बारे में गूढ़ बात अभय पांडेय के साथ

काल के अविरत प्रवाह को निर्धारित करना मुश्किल है।. और उसी की गिनती के प्रयासरूप से पंचांग की उत्पत्ति की गयी।. काल की गिनती अविकसीय पिण्ड की मद्दत लेके और सूर्य,चंद्र की गति को ध्यान में लेके गिनती शुरू हुई।सूर्य ब्रह्माण्ड के केंद्र में है, और उसी के आसपास अविकसीय पिण्ड घूमते है।. पृथ्वी अपनी धरी पे घूमती है और पृथ्वी का उपग्रह चंद्र जो पृथ्वी के आसपास घूमता है,उसी के साथ पृथ्वी सूर्य के आसपास घूमती है।.पृथ्वी गोल है और वो 21.5° उत्तरध्रुव साइड झुक के अपनी धरी पे फिरती है। उससे ऋतुओं का निर्माण होता है।. और अपनी ही धरी पर पश्चिम से पूर्व की ओर घूमने से दिन और रात होती है।. पृथ्वी को एक भचक्र पूर्ण करने में 24 घंटे लगते है।.इससे मानने में आता है सही में वैधशाला की घड़ी के हिसाब से परीभ्रमण पूर्ण करने में पृथ्वी को 23 घंटे,56 मिनिट, और  04 सेकंड लगते है।. यानी लगभग एक दिन और  एक रात्रि जिसे हम *अहोरात्रि* कहते है। पृथ्वी को सूर्य के आसपास फिरने में एक साल लगता है।.सूर्य स्थिर ओर केंद्र बिंदु होने के बावजूद पृथ्वी वासीओ को पृथ्वी से देखने मे सूर्य घूमता हुआ लगता है।. जिसे हम सूर्य की गति गिनते है। ऐसे सूर्य और चंद्र की गति भेद को ध्यान में लेके समय की गणना सुरु हुई ओर उसमे से पंचांग का उदभव हुवा।
हकीकत में सूर्य स्थिर है। पृथ्वी का सूर्य के आसपास से भ्रमण करने से हमने जो ऊपर दिखाया उस हिसाब से *क्रान्तिवृत* में भ्रमण करता दिखता है, या प्रतीत होता है, बाकी वैसे तो सूर्य स्थिर ही है, ये *क्रान्तिवृत के एक जैसे 12 भाग उसे हम राशियां कहते है और 27 एक जैसे भाग उसे हम नक्षत्र कहेंगे |.अब आगे देखते है।
सूर्य और चंद्र के संबंध से भर्ती ओर ओट आती है।. 0° से 180° सूर्य-चंद्र हो तो बड़ी भर्ती आती है।.
जब इनका अंतर 90° का होता तो भर्ती का प्रमाण कम होता है।.
पृथ्वी अपनी धरी पे पश्चिम से पूर्व की ओर घूमती है। इसलिये हमे सूर्योदय पूर्व में और  सूर्यास्त पश्चिम की तरफ होता दिखता है।.
आकाश में जो स्थिर तारे दिखते है उसे हम *नक्षत्रो* से पहचानते है।. उसी के बीच मे से सूर्य का भ्रमण होता है।. जिसे हम *क्रान्तिवृत* से पहचानते है।.

पृथ्वी का सूर्य के आसपास प्रदक्षिणा से सूर्य का भ्रमण मार्ग कायमी एक जैसा होता है।. ऐसे ही सूर्य का उदय ओर अस्त होना भी वर्ष के हरेक दिन का निर्धारित समय निश्चित होता है।. उसमें किसी प्रकार का बदलाव संभव नही होता।. ऐसे सूर्य की एक सी गति होती है ।. एकबार सूर्य जो नक्षत्र के तारों के पास से भ्रमण होता है तो फिर सूर्य वापिश एक साल बाद फिर वही नक्षत्र के तारों के पास से पसार होता है। ऐसा देखा गया है।.

सूर्य विषुववृत्त से उत्तर में 23.5° ओर दक्षिण में 23.5° के बीच मे भ्रमण करता है।. सूर्य का मार्ग निश्चित होता है।. उससे ऊपर या नीचे सूर्य कभी नही जाता।. ये जो क्षेत्र बनता है उस क्षेत्र को हम *क्रान्तिवृत* कहते है।.

ज्योतिर्विद् अभय पाण्डेय
वाराणसी

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