Tuesday, September 26, 2017

नवरात्रि पर मां की महिमा पर सम्पादकीय

🇨🇮सुप्रभात-सम्पादकीय
इस धरती पर जब जब अनाचार पापाचार और नारी का अपमान होता है तब तब ईश्वर की योगमाया महाशक्ति परमशक्ति के साथ अवतरित होकर इन अधर्मियों का सर्वनाश करने अवतरित होती हैं।जगत जननी मां दुर्गा भवानी आदि शक्ति परम शक्ति एक हैं लेकिन ईश्वर की तरह धरती धर्म नारी सम्मान के लिए विभिन्न स्वरूपों में आता है उसी तरह माता भी एक होते हुए भी भक्तों के लिए एक से अनेक हो जाती हैं।नवरात्रि में जगत जननी माँ जगदम्बा दुर्गा भवानी के नौ स्वरूपों की पूजा अर्चना की जाती है।जगत जननी ने अपने आठ स्वरूप विशेष परिस्थितियों में विशेष कार्य के लिए बनाये हैं।जिस समय महाबली निशाचर अपने को तीनों लोकों का राजा बताकर अत्याचार कर रहे थे उस समय उन मायावी निशाचरों के मद को चकनाचूर करने के लिये माता को अपने नौ रूपधारण करने पड़े।जगती के यह नौ स्वरूप जनकल्याण के लिये हैं जिनकी अलग अलग पूजा करने से अलग अलग किस्म का लाभ मिलता है।माँ के कुछ भक्त माता द्वारा विशेष परिस्थितियों में किये गये आसुरी प्रवृत्ति के कार्यों का अनुसरण करके मानव से दानव बन रहे हैं। माँ दुर्गा के स्वरूपों ने संग्राम के दौरान निशाचरों का विनाश करने तथा आक्रोश में आने के लिये सुरापान किया था जबकि सुरापान करना असुरों का कार्य होता है।सुरापान किये निशाचरों का मुकालबा बिना किये संभव नहीं था। आजकल कुछ लोग देवी जी के नाम उनकी कृपादृष्टि पाने के नाम पर सुरापान करते हैं।इसी तरह संग्राम के दौरान मां दुर्गा भवानी को मायावी हिंसक निशाचरों का मुकाबला करने के लिए हिंसक ही नहीं बनना पड़ा बल्कि सुरापान के साथ ही उनका माँस भी भक्षण करना पड़ा।मां भक्त आज भी जगत जननी के स्वरूपों द्वारा क्षणिक आवश्यकता के लिए किये गये आसुरी कार्यों का अनुसरण कर रहें हैं।विशेष परिस्थितियों में किये गये किसी भी कार्य को परम्परा बनाना उचित नहीं है क्योंकि देवी, देवता  मनुष्य सभी के लिये मांस मदिरा का सेवन एवं वध करना प्रतिबंधित है। मांस मदिरा मनुष्य को पथभ्रष्ट बनाकर नर से निशाचर बना देती है।इस समय नवरात्रि की पावन वेला पर कुछ देवी स्थानों पर बलि देने की परम्परा है। कुछ लोग बलि व शराब चढ़ाकर और खुद मांस मदिरा पीकर देवी को प्रसन्न करते हैं लेकिन शायद उन्हें यह नहीं मालूम है कि इससे देवी का वहीं स्वरूप खुश होता है जो देवी ने असुरों के सर्वनाश के लिये क्षणिक धारण किया था।जगत जननी शक्तिस्वरूपा हैं और अपने भक्तों को शक्ति प्रदान करती हैं जो लोग माँ के साथ पिता को भी याद करते रहते हैं उनकी शक्ति का जल्दी दुरपयोग नहीं होता है।आज शक्ति सम्पन्न कुछ लोग शक्ति का सदपयोग कर रहें हैं तो कुछ लोग शक्ति का दुरपयोग कर रहें हैं।ध्यान रखें कि इस समय नवरात्रि की पावन वेला चल रही है और जगत जननी के नव स्वरूप व्यक्तिगत से लेकर विश्व कल्याण तक करने में सक्षम हैं।माँ के यहीं नौ रूप तंत्र मंत्र को सिद्धि प्रदान करने वाले हैं और  इस समय इस तरह के विशेष अनुष्ठान चल रहें है।नवरात्रि में सभी नारियां शक्तिस्वरूपा हो जाती हैं इसलिए नव स्वरूपों की  पूजा अर्चना अनुष्ठान सिद्धि सब ब्रह्मचर्य धारण करके की जाती है।माता तो माता ही होती है और बच्चों के प्रति उनका प्रेम लगाव उसके स्वभाव में शामिल है।कहते भी हैं कि- पुत्र तो कुपुत्र हो सकते हैं लेकिन माता कभी कुमाता नहीं हो सकती है।बच्चे की तरह हमेशा माता के समक्ष ध्यान में या प्रतिमा के समक्ष जाना चाहिए बाप बनकर नहीं।शराब पीने के बाद मनुष्य बाप और अपने को महाबली समझने लगता है।ऐसे भी माँ की हमदर्दी लगाव जितना बच्चे के प्रति होता है उतना बाप के साथ नहीं होती है।जो बाप बनकर जगत जननी के समक्ष जाता है उसकी दशा चंड मुंड और महिषासुर जैसी होती है।हम आज नवरात्रि की छठे दिन की अधिष्ठात्री देवी माता के स्वरूप को शतशत नमन करते हैं और उनसे विश्व कल्याण विश्व शांति की कामना करते हुए अपने  सुधीजन पाठकों एवं उनके इष्ट मित्रों परिजनों के सुख शांति की विनती करते हैं।जय माताजी। धन्यवाद।। सुप्रभात/ वंदेमातरम्/  गुडमार्निंग/ अदाब /शुभकामनाएं ।। ऊँ भूर्भुवः स्वः------/ ऊँ नमः शिवाय।।।
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           भोलानाथ मिश्र
वरिष्ठ पत्रकार/समाजसेवी
रामसनेहीघाट, बाराबंकी यूपी
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