Monday, September 25, 2017

स्वार्थी दुनियाँ के मतलबी रिश्ते नाते है लेकिन

-सम्पादकीय
इस इस संसार जो भी नाते रिश्ते होते हैं वह सभी स्वार्थ के वशीभूत होते हैं।कमाई न करके निठ्ठले घूमने वाले असंस्कारिक  को माता पिता रिश्तेदार भी अपना पुत्र व नाते रिश्तेदार  अपना नही मानते हैं।यह दुनिया ही स्वार्थ के वशीभूत है और स्वार्थ के सहारे यह दुनिया चल रही है।मनुष्य इसी स्वार्थ की पूर्ति में जीवन भर उलझा रहता है और ईश्वर को याद करना भूल जाता है।एक ईश्वर ही ऐसा होता है जो निःस्वार्थ भाव से अपने भक्तों की रक्षा करता है।जो ईश्वरीय कार्य करते हैं उनके संसारिक कार्य ईश्वरीय व्यवस्था से पूरे हो जाते हैं।जिस पर ईश्वर की कृपा दृष्टि हो जाती है वह हर तरह से मालामाल होकर सुदामा जी की तरह निहाल हो जाता है। जो जागृत अवस्था में अपनी हर गतिविधियां ईश्वर को हाजिर नाजिर मानकर उसका नाम लेकर  संचालित करता है उसका कोई बालबाँका  नही कर सकता है।जो उसके सहारे उसके बताये मार्ग जो चलता है उसका मार्गदर्शन ईश्वर खुद करता है।जो किसी भी अन्याय उत्पीड़न को बर्दाश्त कर लेता है। उसकी शिकायत थाना पुलिस एसडीएम तहसीलदार से न करके ईश्वर से दीनहीन भाव से ईश्वर से करता है उसका फैसला निश्चित होता है।यह कहावत गलत है कि ईश्वर के यहाँ देर है लेकिन अंधेर नही है असलियत तो यह है कि उसके यहाँ न देर होती है और न ही अंधेर होती है।इमरजेंसी वाले मामले ईश्वर भी इमरजेंसी में ही देखता है और जो मामले इमरजेंसी नहीं होते हैं उन्हें बाद में देखता है।मनुष्य जीवन में कर्म प्रधान होते हैं और कहा भी गया है कि- कर्म प्रधान विश्व रचि राखा जो जस करै ते तस फल चाखा। मनुष्य के कर्म ही उसे मानव से महामानव और देवमानव बना देते हैं।धन्यवाद।। भूलचूक गलती माफ।।सुप्रभात/ वंदेमातरम्/ गुडमार्निंग/ अदाब/ शुभकामनाएं।। ऊँ भूर्भुवः स्वः----------/ ऊँ नमः शिवाय।।।
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              भोलानाथ मिश्र
वरिष्ठ पत्रकार/समाजसेवी
रामसनेहीघाट, बाराबंकी यूपी।
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