Monday, September 25, 2017

बुध सूर्य के द्रतीय भाव से बनता है भास्कर योग व्यक्ति बन जाता है महान

सू्र्य के अनेक नामों में भास्कर भी एक है.यह योग कुण्डली तब बनता है जबकि बुध सूर्य से द्वतीय भाव में होता है एवं बुध से एकादश भाव में चन्द्रमा और इससे पंचम अथवा नवम में गुरू होता है.ग्रहों का यह योग अति दुर्लभ होता है.जिस व्यक्ति की कुण्डली में यह महान योग बनता है वह व्यक्ति भी महान बन जाता है.इस योग के प्रभाव से धन वैभव से घर भरा होता है.भमि, भवन एवं वाहन का सुख प्राप्त होता है.इनमें कला के प्रति लगाव एवं अन्य लोगों के प्रति स्नेह होता है.
संतान प्रतिबंधक योग
1- तृतीय भाव का अधिपति और चंद्रमा केंद्र या त्रिकोण भावों में स्थित हो तो जरक को संतान सुख में बाधा होती है !
2- लग्न में मांगल, आठवें शनि और पंचम भाव में शनि हो तो भी जातक को संतान सुख में बाधा होती है !
3- बुध और लग्न भाव का अधिपति ये दोनों लग्न के अलावा केंद्र स्थानों में हो तो भी संतान सुख में बाधा होती है !
4- लग्न, अस्थम एवम बारहवें भाव में पापग्रह हो तो संतान सुख में बाधा उत्पन्न होती है !
5- सप्तम भाव में शुक्र, दशवें भाव में चन्द्रमा, एवं सप्तम भाव में शनि या मंगल हो तो संतान सुख में बाधा होती है !
6- तीसरे भाव का अधिपति 1/2/3/5 वें भाव में स्थित हो तथा शुभ से युत या द्रस्त हो तो ऐसे जातक को संतान सुख में बाधा होती है !
भाग्योदय योग
सप्तमेश या शुक्र 3, 6, 10, 11वें स्थान पर हों, तो 22वें वर्ष में भाग्योदय होता हो|
भाग्येश रवि हो, तो 24वें वर्ष में|
चन्द्रमा भाग्येश हो, तो 25वें वर्ष में|
भाग्येश भौम हो, तो 28वें वर्ष में|
भाग्येश बुध हो, तो 32वें वर्ष में|
भाग्येश गुरु हो, तो 16वें वर्ष में|
शुक्र भाग्येश हो, तो 25वें वर्ष में|
शनि भाग्येश हो, तो 36वें वर्ष में|
राहु-केतु भाग्येश हो, तो 42वें वर्ष में|नवम भाव में गुरु या शुक्र हो|
नवमस्थ गुरु शुभ राशि का व स्वराशिस्थ हो|
नवम भाव में शुभग्रह हो और उस पर किसी पापग्रह की दृष्टी न हो|
स्त्री रोग योग
1. लग्न में शनि, मंगल या केतु हो|
2. सप्तमेश 8, 12वें भाव में हो|
3. सप्तमेश और दुतीयेश पापग्रहो से युक्त हो|
4. नीच का चन्द्रमा सातवें भाव में हो|
5. सातवें भाव में बुध पापग्रहो से दृष्टी हो|
रोग योग
षष्ठेश सूर्य के साथ 1 या 8वें भाव में हो, तो मुखरोग|
षष्ठेश चन्द्र के साथ 1 या 8वें भाव में हो, तो तालुरोग|
12वें भाव में गुरू और चन्द्र साथ हों|
मंगल और शनि का योग 6 या 12वें भाव में हो|
लग्नेश रवि का योग 6, 8 व 12वें स्थान में हो|
मंगल और शनि लग्न स्थान या लग्नेश को देखते हों|
सूर्य ,मंगल तथा शनि-तीनों जिस स्थान में हो, उस स्थान वाले अगं पर रोग होता है|
पापी मंगल पापराशि में हो|
शुक्र और मंगल में सूर्य का योग हो|
अष्टमेश और लग्नेश साथ हो|
छठे स्थान पर शनि की पुणॅ दृष्टी हो|
चन्द्र और शनि एक साथ कर्क राशि में हो|
छठे भाव में चन्द्र, शनि और बुध हों, तो जातक कोढ़ी होता है|
अष्टमेश नीच ग्रहों के बीच में हो|
सूर्य पापग्रह द्रारा दृष्ट हो|
बहुसन्तान योग
1. पंचमेश शनि शुक्र के साथ पाप स्थानगत हो|
2. आठवें भाग में पंचमेश हो|
3. पंचमेश तथा तृतीयेश साथ-साथ हो|
4. पंचमेश के स्थान में तृतीयेश हो|
5. सप्तमेश-तृतीयेश का अन्योंयास्रित योग हो|
गोद जाने का योग
1. कर्क या सिंह राशि मे पापग्रह हो|
2. ४ या १०वें स्थान पर पापग्रह हो|
3. चन्द्रमा से चतुर्थ राशि मे पापग्रह हो|
4. सूर्य से ९वें स्थान पर पापग्रह हो|
5. चन्द्रमा या सूर्य शत्रुक्षेत्र मे हो|
जमींदारी योग1. चौथे घर का मालिक दशम मे तथा दशमेश चतुर्थ मे हो|
2. चतुर्थेश, २ या ११वें स्थान पर हो|
3. चतुर्थेश, दशमेश और चन्द्रमा बलवान हों तथा परस्पर मित्र हों|
4. पंचमेश लग्न मे हो|
5. सप्तमेश, नवमेश तथा एकादशेश लग्न मे हों|
ससुराल से धन-प्राप्ति के योग
1. सप्तमेश और द्वतीयेश एक साथ हों और उन पर शुक्र की दृष्टि हो|
2. चौथे घर का स्वमी सातवें घर में हो, शुक्र चौथे स्थान पर हो, तो ससुराल से धन मिलता है|
3. सप्तमेश नवमेश शुक्र द्वारा देखे जाते हों|
4. बलवान धनेश स्थान पर बैठे शुक्र द्वारा देखा जाता हो|
धन-सुख योग
दिन मे जन्म लेने वाले जातक का चन्द्रमा अपने नवांश मे हो तथा उसे गुरु देखता हो, तो धन-सुख योग होता है|
रात मे जन्म हो, चंद्रमा को शुक्र देखता हो, तो धन-प्राप्ति होती है|
भाग्य के स्वामी का लाभ के स्वामी के साथ योग हो|
चौथे घर का मालिक भाग्येश के साथ बैठा हो|
भाग्येश और पंचमेश का योग हो|
भाग्येश और द्वितीयेश का योग हो|
दशमेश और लाभेश साथ हों|
दशमेश और चतुर्थेश २, ४, ५, ९ घर मे साथ बैठे हो|
धनेश और पंचमेश का योग हो|
लग्न का स्वामी चौथे घर के साथ बैठे हो|
लाभेश और चतुर्थेश का योग हो|
लाभेश और धनेश का योग हो|
लाभेश और लग्नेश का योग हो|
लग्नेश और धनेश का योग हो|
लग्न का स्वामी पांचवें स्थान के स्वामी के साथ हो|
अरिष्ट भंग योग
वर्षलग्नेश पंचवर्गी में सबसे अधिक बलवान होकर एक, चार, पांच, सात, नौवें या दसवें भाव में हों, तो अरिष्टनाशक योग होता है|
ब्रहस्पति केंद्र (१, ४, ७, १०) या त्रिकोण (५, ९) में शुभग्रहों से द्रष्ट हो व उस पर पापग्रहों की दृष्टि न हो, तो अरिष्टनिवारक योग होता है|
चतुर्थ भाव अपने स्वामी के साथ या शुभग्रह के साथ अथवा उससे दृष्ट हो, तो भी अनिष्टनाशक योग होकर धन, दुःख और सम्मान कि वृद्धि करता है|
सप्तमेश लग्न में ब्रहस्पति के साथ हो और क्रूरग्रह उसे न देखते हों, तो ऐसा योग अरिष्टनिवारक योग कहलाता है|
नवम घर का स्वामी तथा दुसरे घर का स्वामी बलवान होकर लग्न में हों तथा उन पर पापग्रहों की दृष्टि न हो, तो जातक राज्य में सम्मान प्राप्त करता है|
तीसरे, छठें, तथा ग्यारहवें स्थानों में पापग्रह एवं केन्द्र तथा त्रिकोण में शुभग्रह होते हैं, तो अरिष्टनिवारक योग बनता है|
लग्नेश पूर्णबली होकर केन्द्र, त्रिकोण या ११, १२वें स्थान में हो, तो जातक की सभी इच्छाएं पूरी होती हैं|
उच्च राशि का स्वामी बलवान होकर वर्षेश हो तथा वह तीसरे व ग्यारहवें भाग में स्थित हो, तो अरिष्टनिवारक योग होता है|
सूर्य, ब्रहस्पति, तथा शुक्र परस्पर इत्थशाल योग करते हों, तो उस वर्ष जातक को नौकरी में प्रमोशन मिलता है|
शुक्र, बुध और चन्द्रमा अपनी मुधा में हों, तो जातक व्यापर से लाभ उठता है|
मंगल वर्षेश होकर मित्र की र्शी में हो और घर में पड़े ग्रह से मुत्थशिल योग करता है, तो उस वर्ष जातक को उच्च वाहन मिलता है|अल्पायु योग
1. 1, 4, 5, 8 स्थानों का शनि लग्न में हो|
2. शुभग्रह 3, 6, 9 स्थानों में हो|
3. अष्टमेश पापग्रह होकर गुरु से दृष्ट हो|
4. चन्द्र, शनि और सूर्य आठवें भाव में हो|
5. लग्नेश निर्बल होकर पाप राशि में पड़ा हो|
6. दिन में जन्म हो और चन्द्रमा से आठवें स्थान पर पापग्रह हो|
7. दीघॉयु योग का अभाव हो|
जन्म कुंडली में दुर्घटना होने के योग
जन्म कुंडली में आठवाँ भाव अथवा अष्टमेश, मंगल तथा राहु से पीड़ित होने पर दुर्घटना होने के योग बनते हैं.
सारावली के अनुसार शनि, चंद्रमा और मंगल दूसरे, चतुर्थ व दसवें भाव में होने पर वाहन से गिरने पर बुरी दुर्घटना देते हैं.
जन्म कुंडली में सूर्य तथा मंगल चतुर्थ भाव में पापी ग्रहों से दृष्ट होने पर दुर्घटना के योग बनते हैं.
सूर्य दसवें भाव में और चतुर्थ भाव से मंगल की दृष्टि पड़ रही हो तब दुर्घटना होने के योग बनते हैं.
निर्बली लग्नेश और अष्टमेश की चतुर्थ भाव में युति हो रही हो तब वाहन से दुर्घटना होने की संभावना बनती है.
लग्नेश कमजोर हो और षष्ठेश, अष्टमेश व मंगल के साथ हो तब गंभीर दुर्घटना के योग बनते हैं.
जन्म कुंडली में लग्नेश कमजोर होकर अष्टमेश के साथ छठे भाव में राहु, केतु या शनि के साथ स्थित होता है तब गंभीर रुप से दुर्घटनाग्रस्त होने के योग बनते हैं.
जन्म कुंडली में आत्मकारक ग्रह पापी ग्रहों की युति में हो या पापकर्तरी में हो तब दुर्घटना होने की संभावना बनती है.
जन्म कुंडली का अष्टमेश सर्प द्रेष्काण में स्थित होने पर वाहन से दुर्घटना के योग बनते हैं.
जन्म कुंडली में यदि सूर्य तथा बृहस्पति पीड़ित अवस्था में स्थित हों और इन दोनो का ही संबंध त्रिक भाव के स्वामियों से बन रहा हो तब वाहन दुर्घटना अथवा हवाई दुर्घटना होने की संभावना बनती है.
जन्म कुंडली का चतुर्थ भाव तथा दशम भाव पीड़ित होने से व्यक्ति की गंभीर रुप से दुर्घटना होने की संभावना बनती है।
ज्योतिर्विद अभय पाण्डेय
वाराणसी
9450537461
Email Abhayskpandey@gmail.com

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