Tuesday, October 10, 2017

जाने प्रेम और ज्योतिष का अपना महत्व अभय पाण्डेय के साथ

प्रेम और ज्योतिष
प्रेम एक पवित्र भाव है। मानव मात्र प्रेम के सहारे जीता है और सदैव प्रेम के लिए लालयित रहता है। प्रेम का अर्थ केवल पति-पत्नी या प्रे‍मी-प्रेमिका के प्रेम से नहीं लिया जाना चाहिए। मनुष्य जिस समाज में रहता है, उसके हर रिश्ते से उसे कितना स्नेह- प्रेम मिलेगा, यह बात कुंडली भली-भाँति बता सकती है।
कुंडली का पंचम भाव प्रेम का प्रतिनिधि भाव कहलाता है। इसकी सबल स्थिति प्रेम की प्रचुरता को बताती है। इस भाव का स्वामी ग्रह यदि प्रबल हो तो जिस भाव में स्थित होता है, उसका प्रेम जातक को अवश्य मिलता है।

* पंचमेश लग्नस्थ होने पर जातक को पूर्ण देह सुख व बुद्धि प्राप्त होती है।
* पंचमेश द्वितीयस्थ होने पर धन व परिवार का प्रेम मिलता है।
* तृतीयस्थ पंचमेश छोटे भाई-बहनों से प्रेम दिलाता है।
* पंचमेश चतुर्थ में हो तो माता का, जनता का प्रेम मिलता है।
* पंचमेश पंचम में हो तो पुत्रों से प्रेम मिलता है।
* पंचमेश सप्तम में हो तो जीवनसाथ‍ी से अत्यंत प्रेम रहता है।
* पंचमेश नवम में हो तो भाग्य साथ देता है, ईश्‍वरीय कृपा मिलती है। पिता से प्रेम मिलता है।
* पंचमेश दशमस्थ होकर गुरुजनों, अधिकारियों का प्रेम दिलाता है।
* पंचमेश लाभ में हो तो मित्रों व बड़े भाइयों का प्रेम मिलता है।
पंचमेश की षष्ट, अष्‍ट व व्यय की स्थिति शरीर व प्रेम भरे रिश्तों को नुकसान पहुँचाती है।
पंचम भाव के अतिरिक्त लग्न का स्वामी द्वितीय में जाकर परिवार का, तृतीय में भाई-बहनों का, चतुर्थ में माता व जनता का, पंचम में पुत्र-पुत्री का, सप्तम में पत्नी का, नवम में पिता का व दशम में गुरुजनों का स्नेह दिलाता है।
प्रेम विवाह योग

कुंडली में पंचम भाव का स्वामी प्रबल होकर सप्तम में हो या सप्तमेश पंचम में हो, शुक्र-मंगल युति-प्रतियुति हो, केंद्र या नव पंचम योग हो, लग्नेश पंचम, सप्तम या व्यय में हो, पत्रिका में चंद्र, शुक्र शुभ हो तो प्रेम विवाह अवश्‍य होता है।


यदि सप्तम में स्वराशि का मंगल हो, फिर भी जीवन साथी का भरपूर प्रेम मिलता है। सप्तम व व्यय पर शुभ ग्रहों की दृष्‍टि विवाह सुख बढ़ाती है, प्रेम संबंध प्रबल करती है, वहीं अशुभ ग्रहों की उपस्थिति प्रेम की राह में रोडे अटकाती है।
प्रेम विवाह मुख्यत: शुक्र प्रधान राशियों में देखा जाता है। जैसे वृषभ व तुला ! इसके अतिरिक्त धनु राशि के व्यक्ति रुढि़यों को तोड़ने का स्वभाव होने से प्रेम विवाह करते हैं। इसके अलावा कर्क राशि में यदि चंद्र-शुक्र प्रबल हो तो प्रेम विवाह में रुचि रहती है। पंचम भाव यदि शनि से प्रभावित हो और शनि सप्तम में हो तो प्रेम विवाह अवश्‍य होता है।
* केतु यदि नवम भाव या व्यय में स्थित हो तो मनुष्‍य को आध्यात्मिक प्रेम मिलता है, अलौकिक शक्ति के प्रेम को हासिल करने में उसकी रुचि रहती है।
ज्योतिर्विद् अभय पाण्डेय
वाराणसी
9450537461

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