Sunday, October 15, 2017

जन जीवन से जुड़ी होती है चकबन्दी

भूमि बंदोबस्त करने की व्यवस्था बहुत पहले से चल रही है और इसकी शुरुआत राजा टोडरमल के जमाने में हुयी थी।राजा टोडरमल की भूमि बंदोबस्त की व्यवस्था आज भी प्रासंगिक एवं महत्वपूर्ण बनी हुयी है।भूमि बंदोबस्त करने का कार्य हर बीस साल नियमानुसार होता है।वैसे तो भूमि बंदोबस्त यानी चकबंदी की प्रक्रिया सतत चलती रहती है क्योंकि एक साथ पूरे देश प्रदेश में हो पाना संभव नहीं है। इसलिए क्रमानुसार जिला तहसीलों का चयन हुआ करता है।चकबंदी प्रक्रिया आम लोगों के जनजीवन से जुड़ी होती है क्योंकि इसमें सभी वर्गों के लोगों की ही नहीं बल्कि पशुओं तक का ख्याल रखा जाता है।इतना नहीं हर बार किसानों की भूमि की कटौती करके उस भूमि को जनहित में सुरक्षित कर दिया जाता है।भूमि से जुड़ी हर समस्या का निदान इस प्रक्रिया में हो जाता है।आम जनजीवन से जुड़ी इस चकबंदी प्रक्रिया में किसी का कोई अहित या अन्याय न हो इसक लियेे बाकायदा अदालती न्यायिक सुनवाई की जाती है। जिस तहसील में चकबंदी प्रक्रिया चलती है उस तहसील के राजस्व अधिकार उसमें नीहित हो जाते हैं और राजस्व विभाग से जुड़े न्यायिक अदालतों व अधिकारियों के अधिकारियों शून्य हो जाते हैं।चकबंदी प्रक्रिया पूरी होने के बाद अधिसूचना जारी करने के बाद राजस्व अभिलेख राजस्व विभाग को सौंप दिये जाते हैं।तब जाकर उनके अधिकार बहाल हो पाते हैं।इस महत्वपूर्ण प्रक्रिया का लाभ तमाम लोगों को मिल जाता है।इसी लिये हर आदमी चकबंदी प्रक्रिया से जुड़ जाता है।चकबंदी से जुड़े मुकदमों की सुनवाई अधिसूचना जारी होने के बाद तक चला करती है और राजस्व अभिलेखों में उनकी अमलदरामद हुआ करती हैं।इधर भ्रष्टाचार के युग महत्वपूर्ण चकबंदी प्रक्रिया प्रदूषित एवं गैर जिम्मेदाराना होती जा रही है।जरा से लाभ या लालच में अक्सर मुकदमों से जुड़ी फाइलें गायब हो जाती हैं और झूठी तारीखें देते और दौड़ते रहते हैं।तमाम लोग तो थककर हताश होकर चुप हो जाते हैं किन्तु गरजी उसकी तलाश के लिये सतत प्रयत्नशील रहता है क्योंकि वाद उसके जिंदगी या घर परिवार के भविष्य से जुड़ा होता है। गलती विभागीय जिम्मेदार करते हैं और उसका खामियाजा एक परेशान को भुगतना पड़ता है क्योंकि दस पंद्रह साल जब अगर मुकदमे की फाइल सूचना के अधिकार के बनने से मिल भी जाती है तो उसमें समय बीत जाने का जल्दी लाभ विभागीय अदालतें देने में आनाकानी करने लगती हैं। विभाग में व्याप्त भ्रष्टाचार मनमानी लापरवाही के कारण लोगों को न्याय नहीं मिल पाता है। ऐसे मामलों में नरमी लाने की जरूरत है ताकि न्यायिक प्रक्रिया के लाभ से किसी का अहित न हो सके। विभागीय अधिकारियों कर्मचारियों की लापरवाही के चलते चकबंदी की शुरूवाती प्रक्रिया जिसमें भूमि स्थलीय सत्यापन और सर्वे किया जाता है स्वच्छ तरीके नहीं किया जाता है।चकबंदी के विवादों का जन्म इसी प्रक्रिया के साथ हो जाता है।  स्थलीय सत्यापन न करके आबादी को पशुचर खलिहान या अन्य सुरक्षित सरकारी भूमि के रूप यथावत छोड़ दिया जाता है।जिसका खामियाजा लोगों चकबंदी हो जाने की बाद झेलना पड़ता है और इज्ज्त दांव पर लग जाती है।चालीस पचास साल से आबाद के उजड़ने की स्थिति आ जाती है। चकबंदी प्रक्रिया के दौरान  जहाँ पर लोग घर बना कर दशकों से रहते उसे आबादी घोषित कर अन्य भूखंड को उसकी जगह सुरक्षित कर देना चाहिए। नियमानुसार अदालती मुकदमों की फाइलों को अदालती आदेश के बाद अभिलेखागार में जमा कर देना चाहिए लेकिन फाइल पर न कोई आदेश होता है और न ही सभी फाइलों को जमा ही किया जाता है।आम लोगों के जीवन से जुड़ी इस अति महत्वपूर्ण भूमि बंदोबस्ती व्यवस्था में व्याप्त भ्रष्टाचार उसकी कार्यशैली और उत्तरदायित्वों पर प्रश्न चिन्ह लगाने लगा है जो चिंता का विषय है।सत्ता परिवर्तन और योगीराज का लाभ बंदोबस्ती विभाग के माध्यम आमजन को मिलने के लिए इसकी भी समीक्षा होनी जरूरी हो गयी है।जो लोग न्याय पाने की गरज से अदालती प्रक्रिया से जुड़े हैं उन्हें न्याय दिलाना सरकार धर्म बनता है। धन्यवाद।। सुप्रभात / वंदेमातरम् / गुडमार्निंग / नमस्कार / शुभकामनाएं।। ऊँ भूर्भुवः स्वः-------/ उँ नमः शिवाय।।।
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             भोलानाथ मिश्र
   वरिष्ठ पत्रकार/समाजसेवी
रामसनेहीघाट, बाराबंकी यूपी
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