Wednesday, October 25, 2017

लड़ाई हो तो पुलिस बुलाओ हत्या हो तो पुलिस बुलाओ लेकिन

आज हम एक ऐसे वर्ग अथवा विभाग की बात करने जा रहे हैं जिसकी बुराई सभी करते हैं किन्तु अवसर आने पर सभी उसी के पास जाते भी हैं और प्राणरक्षक देवदूत भी मानते हैं। हम बात कर रहें हैं सरकार के मुख्य स्तम्भ सुरक्षा से जुड़े पुलिस वालों की जो हमेशा खौफ के साये में जीवन यापन कर रहें हैं। जो जहाँ है वहीं डांट खाकर एस सर के आगे कुछ नहीं बोल सकता है क्योंकि वह अनुशासन से बंधा हुआ है।इनकी सुनने वाला कोई नहीं डांटने वाले बहुत हैं। सब सरकारी डियुटी आठ घंटे करते हैं और उसमें भी एक घंटे का दोपहर में लंच भी मिलता है।कुल मिलाकर उन्हें छः घंटे से ज्यादा डियूटी नहीं करनी पड़ती है लेकिन पुलिस की जीडी चौबिस घंटे चला करती है और सभी उसी जीडी से बंधे होते हैं।सबसे बुरी स्थिति उनकी है जो थाना चौकी कोतवाली या जिले से जुड़े रहते हैं।इनमें से भी सबसे बुरी स्थिति सबसे निचले स्तर पर सबसे आगे चलने वाले सिपाहियों की है। सिपाहियों की कमी को पूरा करने का क्रम जारी है लेकिन इनकी समस्याएं यथावत हैं।इन्हें डियूटी की तुलना में चपरासी जैसा वेतनमान दिया जा रहा है।इनकी वर्दी पेटी तक की सुध समय पर नहीं हो पाती है और उन्हें हमेशा अनुशासन के नाम पर खौफ के साये में रहना पड़ रहा है।समय बदल रहा है ऐसे में गैर कानूनी कार्य करने से रोकना मुश्किल हो गया है क्योंकि यह जानना कठिन हो गया है कौन कितनी पहुंच का है।गलत वहीं करता है जो सबल पहुंच वाला होता है।विभागीय किसी भी कार्यवाही में ऐसा नहीं होता है जिसमें सिपाही शामिल न होता हो क्योंकि थानेदार हो चाहे कप्तान डीआईजी आईजी या डीजीपी हो सबके साथ रवानगी सिपाही की जरूर होती है।थानेदारों की भी दशा कोई खास बेहतर नहीं है और उन्हें न तो समय पर खाना मिल पाता है और न ही समय पर उनका प्रमोशन ही हो पाता है।उन्हें भी विभाग में कुढ़नभरी जिन्दगी जीनी पड़ती है क्योंकि इतनी ड्यूटी देनी पड़ती कि कभी चैन की नींद नहीं सो पाता है। कार्यालयों में स्टेशनरी तक कभी कभी खरीदनी पड़ जाती है और कफन या देवदूत बनकर भी फील्ड में कार्य करना पड़ता है।समाज के सभी वर्ग के लोगों को दरोगा सिपाही पर इतना भरोसा है कि जब भी जान सकंट में पड़ती है तो लोग या तो ईश्वर को याद करते हैं या फिर पुलिस की याद करते हैं।इतना ही नहीं उन्हें विश्वास होता है कि पुलिस उनका दुख दर्द धर्मराज युधिष्ठिर बनकर "हर" लेगी।वहीं दूसरी तरफ अधिकारियों की भी आंतरिक दिल की धड़कन सामान्य नहीं है और उन्हें समय समय पर अपने रक्तचाप की जांच करनी या करवानी पड़ती है क्योंकि अधिकारियों के माध्यम से ही उच्च अधिकारियों सरकार और उनके जनप्रतिनिधियों के सारे निर्देशों का अनुपालन कराया जाता है। सभी चाहते हैं कि जो उनकी इच्छा है उसके अनुरूप वह अपने अधीनस्थों से उसका अनुपालन करायें।इच्छानुसार कार्य कराने में अधिकारी की नींद हराम रहती है और रात दिन उसे विभागीय, सरकार और उसके जनप्रतिनिधियों के खौफ के साये रहना पड़ रहा है। पुलिस को सरकार की रीढ की हड्डी माना जाता है और रीढ की हड्डी की कमजोरी का मतलब ढांचा कमजोर होना होता है।आजकल पुलिस अपने मूल उद्देश्य से दूर हो गयी है और इतने तरह की ड्युटियां करनी पड़ती है कि उसे इतना समय ही नहीं मिल पाता है कि वह समाज में पनप रहे असमाजिक अपराधिक अपराधियों पर नजर रख सके। इसके बावजूद उसे सबकुछ एक साथ करना पड़ता है।कभी ऐसा भी मौका आ जाता है जबकि कोतवाल को सिर्फ एक दो सिपाहियों के सहारे घूमना या थाना कोतवाली पड़ती है।इनकी अहर्निश सेवाओं को देखते हुये सरकार के अगुवा संत शिरोमणि योगीराज की दयादृष्टि एवं समीक्षा करने की जरूरत प्रतीत होती है। हमने पुलिस की समस्याएं अपने अध्ययन व अनुभव के आधार पर लिखा है अगर अज्ञानता भ्रम या भूलवश कोई गुस्ताखी हो गयी हो तो हम क्षमा चाहते हैं। धन्यवाद।। सुप्रभात / वंदेमातरम् / गुडमार्निंग / नमस्कार / शुभकामनाएं।। ऊँ भूर्भुवः स्वः------/ ऊँ नमः शिवाय।।।
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           भोलानाथ मिश्र
  वरिष्ठ पत्रकार/समाजसेवी
रामसनेहीघाट, बाराबंकी यूपी
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