Friday, October 27, 2017

संविदा कर्मियों का बढ़ता प्रचलन और स्थाईकरण की लड़ाई पर विशेष रिपोर्ट भोला नाथ मिश्रा की कलम से

धीरे धीरे सरकारी व्यवस्था में गैर सरकारी या संविदा व्यवस्था पैर पसारती जा रही है।चाहे स्वास्थ्य विभाग हो चाहे विकास विभाग हो चाहे अन्य कोई सरकारी विभाग हो सभी में संविदा व्यवस्था लागू है। संविदा व्यवस्था का विस्तार दिनदूनी रात चौगुनी गति से हो रहा है।इस व्यवस्था से किसी को लाभ होता हो चाहे न होता है लेकिन सरकार को जरूर लाभ मिल रहा है और सरकारी खजाने में बचत हो रही है।एक शिक्षक को कम से कम बत्तिस हजार वेतन दिया जाता है लेकिन लेकिन शिक्षा मित्र उस समय पैतिस सौ आज दस हजार में ही मिल जाते हैं।यहीं हाल हर विभाग में रिक्त पदों के लिये है और जो सरकारी वेतन दिया जाता है उसके आधे से भी कम में पैसे में वहीं कार्य करने वाले गली गली डिग्री लिये टहल रहें है। कम्प्यूटर आपरेटर हो ग्राम रोजगार सेवक हो चाहे स्वास्थ्य विभाग में टेक्निकल सहायक  और चाहे डाक्टर और कम्पाउंड हो हर जगह संविदा कर्मी तैनात हैं।बाल विकास परियोजना में आगंनबाड़ी भी संविदा कर्मी हैं।संविदा कर्मियों की अच्छी भली बटालियन खड़ी हो गयी है।पढ़ लिखकर खाली घूमने से बेहतर मानकर लोग कम पैसे पर काम करने के लिये काम करने के लिये राजी हो जाते हैं।सरकार बेरोजगारों की इस मजबूरी का फायदा उठा रही है। कहावत है कि जिसे बैठने की जगह मिल वह धीरे धीरे पैर फैलाने और बाद में करवटें लेने लगता है। संविदा कर्मियों की भी दशा कुछ वैसी ही है और अब हर विभाग में तैनात संविदा कर्मियों ने अपना सगंठन खड़ा कर लिया है।सगंठन के जरिये संविदा कर्मी समान काम और समान वेतन की मांग कर रहें हैं।स्थाईकरण की मांग को लेकर धरना प्रदर्शन लाठी चार्ज सबकुछ हो रहें हैं।अभी कुछ दिनों पहले रोजगार सेवकों शिक्षा मित्रों और आगंनबाड़ियों पर लाठी चार्ज हो चुका है।जब आंदोलन हद पार करता है तब प्रशासन सारे वसूलों सिद्धांतों को ताख पर रखकर कानून व्यवस्था को बहाल करता है।अभी तीन चार दिन पहले आंगबाड़ी से जुड़ी महिलाओं पर निर्मम लाठीचार्ज हो चुका है। महिला सिपाहियों के अभाव में पुरूष सिपाहियों को महिलाओं की टांग उठाकर उन्हें रोड से बाहर फेंकना पड़ा और लाठियां भांजनी पड़ी।एक बात तो सही है कि संविदा कर्मियों की कोई तयशुदा जिन्दगी की उम्र है नहीं और उन्हें कभी भी हटाया जा सकता है।लेकिन यह भी सही है कि जब जिंदगी का सबसे कीमती समय निकल जाता है और तब अगर उसे नौकरी से निकाला जाता है तब वह धोबी के कुत्ते की तरह न घर का न घाट का रह जाता है।उसके बच्चों का भविष्य सुरक्षित नहीं रह जाता है और सोचने वाली बात है कि जब सरकारी नौकरी करने वाले का भला जब अपने वेतन से नहीं हो पाता है तो इन संविदा कर्मियों के बच्चों का पालन इतने कम वेतन से कैसे हो सकता है।जो संविदा कर्मी एक लम्बे समय से अपनी सेवाएं दे रहे हैं और सरकारी नौकरी की उम्र गुजरने के करीब आ गयी हैं उन्हें तोहफे के तौर पर स्थाईकरण दिया जा सकता है।जबतक इन संविदा कर्मियों का समावेश न हो जाय तब सरकारी भर्तियों में रोक लगाने की जरुरत है।आखिर यह संविदा कर्मी भी तो हमारे आपके परिवार से निकले हैं इनका दुख सुख अपने सुखदुख जैसा है।सरकार की माया भी समझ में नहीं आ रही है क्योंकि वह एक तरफ तो पचास साल के बाद कार्य करने की क्षमता समाप्त होने और रिटायरमेंट देने की बात कह रही है तो दूसरी तरफ साठ साल के बाद रिटायर होने वाले को फिर से नौकरी पर लाने की बात कह रही है। धन्यवाद।। सुप्रभात / वंदेमातरम् / गुडमार्निंग / नमस्कार / शुभकामनाएं।। ऊँ भूर्भुवः स्वः-------/ ऊँ नमः शिवाय।।।
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           भोलानाथ मिश्र
  वरिष्ठ पत्रकार/समाजसेवी
रामसनेहीघाट, बाराबंकी यूपी
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