Monday, October 30, 2017

राजनैतिक दलों में आंतरिक लोकतंत्र और परिवारवाद पर विषेस लेख -भोलानाथ मिश्रा की कलम से

राजतंत्र में अकेला राजा ही सर्वोपरि होता है लेकिन लोकतंत्र में बहुमत और सदस्यों के मत का बड़ा महत्व होता है।राजतंत्र परिवारवाद पर आधरित होता है और लोकतंत्र का बहुत कम स्थान होता है।लोकतांत्रिक प्रणाली में चाहे राजनैतिक दल हो चाहे संस्थाएँ हो सभी बहुमत के आधार पर काम करती हैं। आजादी के पहले तक अपने देश में भी राजतंत्र था और राजा जो भी फैसला कर देता था वहीं प्रजा को मानना पड़ता था।आजादी के बाद से अपने देश में भी लोकतंत्र प्रणाली लागू हो गयी है जबकि कांग्रेस में यह प्रणाली आजादी की लड़ाई के समय से ही गांधी जी ने लागू कर रखा था। यह बात अलग है कि जब नेता जी सुभाषचंद्र बोस को अधिवेशन में सर्वसम्मति से अध्यक्ष चुन लिया गया था लेकिन गर्मदल के नेता होने के कारण दबाव बना कर उनसे इस्तीफा ले लिया गया था। आजकल के राजनैतिक दौर में पार्टी गेट के बाहर लोकतंत्र का बैनर लगा मिल जायेगा किन्तु अंदर राजतंत्र ही कायम है।कुछ ही लोग ऐसे खास विश्वासपात्र होते हैं जिन्हें गाइड लाइन के अनुसार बोलने का हक होता है बाकी तो दर्शक की तरह ताली बजाकर समर्थन देने वाले निपट होते हैं। इधर राजनैतिक दलों में आंतरिक लोकतंत्र और परिवार वाद को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी ने एक नयी बहस छेड़ दी है और पूरे राजनैतिक क्षेत्र में उनके बयान को लेकर चर्चाएं हो रही हैं।यह सही है कि कभी कभी दुख मुसीबत में राजनैतिक दलों में लोकतंत्र जागृत हो जाता है। ऐसा नहीं होता तो सपा के संस्थापक जन्मदाता नेताजी मुलायम सिंह यादव की जगह बहुमत से अखिलेश यादव राष्ट्रीय अध्यक्ष नहीं बन पाते।मुलायम सिंह के बाद अखिलेश यादव की ताजपोशी परिवारवाद का ज्वलंत उदाहरण है।अपना दल के नेता सोनेलाल फटेल की मृत्यु के बाद उभरा परिवारवाद जगजाहिर है और परिवाद का परिणाम है कि कांग्रेस को लकवा सा मार गया है और फलफूल नही पा रही है। बसपा प्रमुख द्वारा अपने भाई को अपना उत्तराधिकारी बनाने का प्रयास परिवारवाद नही तो और क्या है?आजकल पार्टी के हर नेता को अपने नेता के सामने अपनी औकात दिखानी पड़ती है और वफादारी की दुम हिलानी पड़ती है।इसके लिए नेता अपने खास झोला लेकर चलने और जी हजूरी करने वाले विश्वास पात्र को ही पैसा देकर चुनाव लड़वाता है।इधर पैसा देकर चुनाव लड़वाने की प्रथा धीरे धीरे समाप्त होने लगी है और लोग अपने पैसे से चुनाव ही नहीं लड़ते हैं बल्कि पार्टी को भी चंदा देनेे लगें हैं।इधर कुछ दशकों में राजनैतिक दलों के आंतरिक लोकतंत्र पर कुछ अधिक कुठाराघात हुआ है।इसमें राष्ट्रीय दलों की अपेक्षा क्षेत्रीय दल सबसे आगे हैं और दूल्हा बिकता है बोलो खरीदोगें वाली कहावत चरितार्थ होने लगी थी। इसी तरह अगर भाजपा में आंतरिक लोकतंत्र होता तो तमाम वरिष्ठ नेता आज तम्बू से बाहर नहीं होते।असलियत तो यह है कि पार्टियों में आंतरिक लोकतंत्र  दिखावे के लिए होती हैं लेकिन फैसला वहीं होता है जो पार्टी प्रमुख चाहता है।पार्टी प्रमुख की बात को काटने का हक किसी को भी नहीं होता है।जो बात काटकर लोकतंत्र को जिंदा करता है उसे बागी करार देकर पार्टी से निलम्बित या निकाल दिया जाता है।आंतरिक लोकतंत्र की हालत का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि पार्टी में लोग जब नेता के साथ रहते हैं तबतक तो मौन धारण किये रहते हैं किन्तु जैसे ही पार्टी छोड़ देते हैं वैसे ही अपने नेता को तानाशाह घूसखोर मक्कार साम्प्रदायिक बताने लगते हैं।पार्टी में लोकतांत्रिक व्यवस्था को बनाये रखना पार्टी गठन का मूल उद्देश्य होता है।राजनैतिक दलों की मजबूरी है कि वह अनुशासन के नाम पर लोकतांत्रिक लगाम को अपने हाथों में लिये रहते हैं।पार्टी में नेता के विचारों से विभिन्नता व्यक्त करने का मतलब बगावत माना जाता है।आज के दौर में जिस कांग्रेस को लेकर आँतरिक लोकतंत्र की बहस शुरू करने की बात प्रधानमंत्री जी कर रहे हैं उसी कांग्रेस ने आजादी के पहले इसकी शुरुआत की थी।यह बात अलग है कि जब सुभाषचंद्र बोस को बैठक में बहुमत से अध्यक्ष चुन लिया गया था लेकिन गर्मदल का होने के नाते उनसे इस्तीफा ले लिया गया था।आज भी अधिकांश नेता पुत्र और परिवारवाद को बढ़ावा दे रहे हैं और लालू यादव मुलायम सिंह यादव का परिवार इसका उदाहरण है। कहने के लिए हर दल दावा करता है कि उसके दल में सारी कार्यवाही लोकतांत्रिक ढंग से होती है लेकिन हर जगह मात्र औपचारिकता पूरी की जाती है।सदन में लोग हो चाहे बैठकों आदि में हो ताली बजाकर या मेज थपथपा कर आतंरिक लोकतंत्र जिंदा रखा जाता है।परिवारवाद के दम पर नेहरू परिवार से जुड़ी तो कांग्रेस आज भी उसके बिना अधूरी दिखने लगती है।यह सही है कि भाजपा परिवार वाद से थोड़ा दूर खड़ी है और जो जीता वही सिकंदर वाली कहावत पार्टी में चरितार्थ होती है।यह सही है कि परिवारवाद की वेल पार्टी के होनहार प्रतिभा की राह में बाधक बन जाती है। धन्यवाद।। सुप्रभात / वंदेमातरम् / गुडमार्निंग / नमस्कार / शुभकामनाएं।। ऊँ भूर्भुवः स्वः-------/ ऊँ नमः शिवाय।।।
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            भोलानाथ मिश्र
  वरिष्ठ पत्रकार/समाजसेवी
रामसनेहीघाट, बाराबंकी यूपी
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