Friday, October 6, 2017

ग्रामीण पत्रकारों की समस्याओं और उनकी भूमिका पर खास रिपोर्ट

ग्रामीण क्षेत्रों में घुसकर पत्रकारिता करने वाले पत्रकार वास्तविक रूप से प्रंशसा के पात्र होते हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में पत्रकारिता करना आसान नहीं होता है क्योंकि क्षेत्र बहुत दूरूह होता है और बिना वाहन के मौके तक पहुंचना असंभव रहता है।ग्रामीण पत्रकारों को भले ही अखबार या चैनल वाले कुछ न दे रहे हो लेकिन उन्हें समाचार कवरेज करने तो जाना ही पड़ता है।ग्रामीण क्षेत्र की पत्रकारिता गाँव के सबल सरहंग लोगों व ग्रामीण क्षेत्र में कराये जा रहे विकास कार्यों व समाजिक अपराधिक समस्याओं से जुड़ी होती है।ग्रामीण क्षेत्रों से जुड़े समाचारों को छापने का मतलब गांव के भ्रष्टाचार से जुड़े लोगों से दुश्मनी मोल लेने जैसा होता है।समाज में हो रही गतिविधियां ही समाचार के मुख्य आधार होते हैं और इन गतिविधियों के सूत्रधार नहीं चाहते हैं कि उनके कृत्यों का पर्दाफाश हो।इसके लिए वह पहले तो प्रलोभन देता है हाथ पैर जोड़ता है। फिर भी अगर पत्रकार पत्रकारिता धर्म का निर्वहन करता है तो उसकी जान माल का खतरा पैदा हो जाता है।गुंडों से पिटवा दिया जाता है और गांव घर के विरोधियों को तलाश करके उनके कंधों पर बंदूक रखकर हमला बोल दिया जाता है।वैसे हमारा अपना चालीस साल की पत्रकारिता का अनुभव है कि अगर ग्रामीण पत्रकार समाज के साथ उसके दुखसुख में साथ रहकर राग द्वेष से दूर होकर पत्रकारिता करता है तो समाज भी दुखसुख में उसके साथ यथाशक्ति खड़ा रहते है।यह बात अलग है कि जो वर्ग समर्थन में रहता है वह खुद असहाय होता है।यहीं कारण होता है कि हमारे पत्रकार साथियों की पिटाई कर दी जाती है और यहाँ तक कि गोली मारकर हत्या कर दी जाती हैं।दुख मुसीबत आने पर पत्रकार अकेला पड़ जाता है और अन्याय भ्रष्टाचार घपला घोटाला करने वाले सभी एक हो जाते हैं। ग्रामीण पत्रकारिता सरकार और समाज को उसका असली आइना दिखाकर किसान भगवान व अन्य वर्गों की तस्वीर पेश करता है।यहीं कारण है कि सरकारें भी इन ग्रामीण पत्रकारों की तरफ ध्यान नही देती हैं।कई बार पहल बार की गयी लेकिन उसका क्रियान्वयन नहीं किया गया। अधिकाशं ग्रामीण पत्रकारों को न तो अधिकृत रूप से अखबार ही पत्रकार मानता है और न सरकार ही उन्हें पत्रकार मानती है।यह बात अलग की है कि जब ग्रामीण क्षेत्रों में विभिन्न कार्यक्रम होते हैं तो उसमें पत्रकारों को विशेष तवज्जो दी जाती है।अब वर्तमान समय में पत्रकारिता का उद्देश्य ही बदल गया और ग्रामीण पत्रकारों को जिला पत्रकार या ब्यूरो की इच्छानुसार समाचार लिखना व पत्रकारिता करना पड़ता है। पत्रकारिता स्वछंद नही बल्कि सेठ साहूकारों राजनेताओं के अधीन हो गयी है।इस समय चाहे ग्रामीण या राज्य स्तर का पत्रकार है और अपने उत्तरदायित्वों का निर्वहन करता है तो उसके सिर पर निश्चित तौर पर काले साये मडरा रहे हैं। हर स्तर पर पत्रकार को मारा जा रहा है लेकिन सरकार चुप्पी साधे बैठी है।पिछले दिनों सरकारों ने खूब रेवड़ियां बांटी लेकिन इन बहादुर ग्रामीण पत्रकारों या लोकतंत्र के चौकीदारों को किसी ने एक रेवड़ी तक नहीं दिया। लगता है कि जैसे सरकार गांव खलिहान की आंख और आवाज माने जाने वाले पत्रकारों से सरकारें नफरत करती है।अगर ऐसा नहीं होता अबतक ग्रामीण पत्रकारिता भी कम से कम सरकारी मान्यता प्राप्त गई होती।अगर सरकार पत्रकारों की हत्याओं को थोड़ी ही गंभीरता से ले ले तो अभी एक खौफ फैल जाय कि पत्रकार को मारना ठीक नहीं है।लेकिन पत्रकार का भी धर्म है कि वह हर हाल हर दशा में पत्रकारिता का धर्म निर्वहन करें तथा जो लोग पत्रकारिता को कंलकित कर रहे हैं उनका पर्दाफाश करें।पत्रकारिता जैसे पावन पाक ईश्वरीय कार्य को करना हम सभी साथियों को सौभाग्य है।धन्यवाद।।भूलचूक गलती माफ।। सुप्रभात / वंदेमातरम् / गुडमार्निंग / नमस्कार / शुभकामनाएं।। ऊँ भूर्भुवः स्वः-------/ ऊँ नमः शिवाय।।।
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                भोलानाथ मिश्र
   वरिष्ठ पत्रकार/समाजसेवी
   रामसनेहीघाट,बाराबंकी यूपी
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