Sunday, November 12, 2017

जीएसटी के फंडे में बेबस सरकार-भोलानाथ मिश्रा का लेख

राजनीति में जल्दबाजी में कभी कभी अपना ही राजनैतिक दाँव अपने ही गले की हड्डी बन जाता है। मोदीजी के "सरकारी खजाना भरो" अभियान के तहत लागू की गयी "एक देश एक टैक्स  के तहत जीएसटी यानी गुड सर्विस टैक्स का कानून उनके ही रास्ते का कांटा और गले की हड्डी बनता जा है।इस कानून का जितना विरोध हो रहा है उसकी उम्मीद किसी को भी नहीं थी। गुजरात में हो रहे चुनावों में जीएसटी विजय अभियान में बाधा खड़ी कर रहीं है।जीएसटी की विसंगतियों को लेकर सरकार पर हमले और तंज कसे जा रहे हैं।विपक्षी जीएसटी को अगले चुनाव का मुद्दा बनाकर चुनाव वैतरणी पार लगाने में जुट गयी है।जीएसटी लागू होने से देश में  सबसे छोटा व्यवसाय करने वालों की भी नींद हराम हो गयी है क्योंकि छोटा बड़ा धंधा करने वाले भी बिना जीएसटी रजिस्ट्रेशन के कोई कारोबार नहीं कर सकते हैं।इस बिल का विरोध व्यापारी वर्ग शुरू से कर रहा है।साल में पचास हजार से एक दो लाख का व्यवसाय करने वालों की रोजी ही चली गयी है और जीएसटी उनके लिये काला कानून बन गया है।जीएसटी के विरोध को देखते हुए अभी तीन दिन पहले जीएसटी कौंसलिंग की तेईसवीं बैठक में वित्त मंत्री जी को एक सौ अठहत्तर चीजों पर जीएसटी दर घटाना पड़ा। जिन चीजों पर जीएसटी को चुनावी मुद्दा बना रहे थे उनमें से लगभग सभी चीजों पर जीएसटी घटा दी है।अब रेस्तरां रेस्टोरेंट में खाना महंगा नहीं खाना पड़ेगा क्योंकि जीएसटी घटाकर पांच प्रतिशत कर दी है।वित्तमंत्री के इस फैसले से सरकार को करीब एक अरब दस करोड़ का नुकसान होगा। यह कटौती आगामी पन्द्रह नवम्बर से प्रभावी हो जायेगी।वित्तमंत्री के इस फैसले से समाज के सभी वर्गों के लोगों को राहत मिलेगी।
सरकारी खजाना आम जनता का खून चूसकर भरना लोकतंत्र में शुभ नहीं माना जाता है।देश की साठ फीसदी आमजनता के लिये लाली लिपिस्टिक जैसे श्रंगार ही नही तमाम चींजों की दैनिक जरूरत पड़ती है। ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी सभी सुहागिनें रोजाना मंहगाई के चलते अपने श्रंगार की  चीजों का इस्तेमाल यदाकदा ही कर पाती हैं। अन्य आम चीजों की सबसे ज्यादा जरूरत आमजनता को पड़ती है और सस्ती मंदी होने का सबसे ज्यादा असर उसी साठ फीसदी ग्रामीण जनता पर ही पड़ता है। सरकार का अधिकांश टैक्स घूम फिरकर आम जनता ही झेलती है। मोदी सरकार जितनी तेजी से विकास का रथ दौड़ना चाहते हैं उतनी तेजी से आमजनता दौड़ने लायक अभी नही हो पायी है।आमजनता से जुड़ी तमाम योजनाओं में कटौती या बंद करने का सीधा प्रभाव आम लोगों पर पड़ रहा है। कंट्रोल की शकर का वितरण बंद होना और मिट्टी तेल में लगातार हो रही कटौती से आमजनता तिलमिलाने लगी है।आमजनता को मिल रहे अनुदानों को धीर धीरेे बंद करना या कटौती करना आमलोगों को अबतक मिल रही सरकारी राहत पर कुठाराघात करने जैसे है। सरकार की नोटबंदी के बाद बैंकों द्वारा उपभोक्ताओं के साथ शुरू की गयी नाकेबंदी और मनमानी कटौती आम जनता को प्रभावित कर रही है। मोदी सरकार के वित्त मंत्री द्वारा जीएसटी की दरों की गयी कमी को भले ही राजनैतिक दल गुजरात चुनाव का खौफ और अपने मुख्यमंत्रियों का दबाव बता रहे हो लेकिन सरकार का यह कदम आम जनता को राहत देने वाला सराहनीय कदम है।इसकी जितनी प्रंशसा की जाय उतनी कम है। धन्यवाद।। सुप्रभात / वंदेमातरम् / गुडमार्निंग / नमस्कार /शुभकामनाएं।। ऊँ भूर्भुवः स्वः ---------/ ऊँ नमः शिवाय।।।
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            भोलानाथ मिश्र
वरिष्ठ पत्रकार/समाजसेवी
रामसनेहीघाट,बाराबंकी यूपी
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