Wednesday, November 15, 2017

मनुष्य जीवन और उनकी परिस्थितियों पर विशेष रिपोर्ट

मनुष्य जीवन में नशे का बहुत महत्व होता है और बिना नशा के जीवन विधवा महिला जैसा रहता है।नशा मनुष्य को नर से नारायण और नर से नरपशु व नरपिशाच बना देता है।जीवन में नशा दो तरह के होते हैं इनमें एक नशा तो मदिरापान आदि नशीली चीजों से होता है जबकि दूसरा नशा जिसे लग जाता है उसका मनुष्य जीवन सफल हो जाता है। वह नशे में अपनी सुद्ध बुद्ध भूलकर ईश्वर से एकाकार होकभी नाचने तो कभी गाने और कभी रोने लगता है। जब मनुष्य जीवन में भक्ति का नशा आस्था श्रद्धा के सहारे चढ़ता है तो सारी दुनिया के जीवों में ईश्वर दिखाई देने लगता है। भक्ति का नशा इतना बुरा होता है जो मनुष्य को महलों से निकालकर फुटपाथ पर पागलों की तरह प्रभु के गुणगान गाने पर मजबूर कर देती है।कहा भी गया है कि-"लागी ऐसी लगन मीरा हो गयी मगन वह गलीगली हरि गुन गाने लगी"।जिसे ईश्वर की भक्ति का नशा चढ़ जाता है वह साधारण मानव से देवतुल्य देवमानव बन जाता है। तमाम संत शिरोमणि ही नही साधारण लोग भी भक्ति के नशे के सहारे ईश्वर के प्रिय हो चुके हैं। भक्ति का  नशा उसे लगता है जो भक्ति पूर्ण वातावरण में रहकर अपने आपको अपने बाप को और अपनी औकात को पहचानता है। जो सुबह आँख खोलने के बाद सबसे पहले हथेली चूमकर ईश्वर को याद करते और नाम लेते हुये धरती माता को प्रणाम कर पैर  रखकर दिन शुरुआत करते हैं उन्हें भक्ति के नशे का शिकार माना जा सकता है।भक्ति के नशे में इंसान कभी किसी के साथ छल कपट प्रपंच छीनाझपटी आदि संसारिक ईश्वरीय गुनाह नहीं करता है बल्कि वह सभी जीवों को समान रूप से ईश्वर की संतान और अपना भाई मानता है। आजकल लोग भक्ति का नहीं मदिरा आदि का नशा करते हैं जिसे निशाचरी वृत्ति माना गया है।संसार के सारे गुनाह इसी मदिरापान करने से होते हैं और इंसान इसका सेवन करते ही इंसान से शैतान बन जाता है। जीवन में नशा अच्छे कर्म करने और ईश्वरीय भजन का करना चाहिए। धन्यवाद।। सुप्रभात /वंदेमातरम् / गुडमार्निंग / नमस्कार / शुभकामनाएं।। ऊँ भूर्भुवः स्वः-------/ ऊँ नमः शिवाय।।।
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          भोलानाथ मिश्र
वरिष्ठ पत्रकार/समाजसेवी
रामसनेहीघाट, बाराबंकी यूपी
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