Friday, November 10, 2017

धन धर्म और भक्ति पर विशेष रिपोर्ट- वरिष्ठ पत्रकार भोलानाथ मिश्रा की कलम

आज हम धन धर्म और भक्ति पर चर्चा कर रहे हैं।धन बहुत लोग कमाते हैं लेकिन उसे खर्च करना बहुत कम लोग जानते हैं। धन लक्ष्मी प्रायः उसी के पास आती है जो ज्ञानवान नहीं होता है।धन और ज्ञान दोनों अलग अलग एक दूसरे के विरोधी हैं और जिसके पास ज्ञान होता है वह प्रायः धनवान नही होते हैं। कहते लक्ष्मी जी की सवारी उल्लू होती है और जिस आदमी उल्लू कह दिया जाय तो वह झगड़ा कर लेगा।आजकल कोई अपने को उल्लू कहलाने के लिये राजी नही है और सब अपने को ज्ञानवान ही मानते हैं।हमारे सनातन और इस्लाम आदि सभी धर्मो में धन को खर्च करने के रास्ते भी बताये गये हैं।हिंदुओं और मुसलमानों के यहाँ भी साफ साफ कहा गया है कि मेहनत की कमाई का दसवाँ हिस्सा नेक कार्य में खर्च कर देना चाहिए और शेष धन का सदपयोग अपने जरूरी कार्यों में करना चाहिए।हिन्दू इसे दशांश और मुसलमान इसे जकार्त कहते हैं।सनातन धर्म में राजाओं का धर्म होता था कि वह लोकहित  प्रजाहित में यज्ञों महायज्ञों और धर्म सम्मेलनों का आयोजन कराये क्योंकि इन्हें कराना छोटेे साधारण व्यक्ति के वश की बात नही होती है। इसी तरह धर्म संसद और श्रीमद्भागवत साप्ताहिक मासिक ज्ञानयज्ञ का आयोजन सेठ साहूकार भी कराते थे क्योंकि उनके पास भी अथाह धन होता है।आजकल कलियुग में यज्ञ महायज्ञ धर्म सम्मेलन सब हो रहें हैं लेकिन उसमें जो धन खर्च हो रहा है वह जकार्त या दशांश निकालने के बाद नही बल्कि हराम की कमाई से धन कमाने के उद्देश्य से हो रहें हैं।आजकल लोग मेहनत की कमाई को कौन कहे हराम की कमाई से भी जकार्त दशांश नही निकालते हैं।हराम का कमाई लक्ष्मी नहीं होती हैं बल्कि कुलक्षिणी होती है और अच्छे अच्छे को बरबाद कर डालती हैं।धन जब मद बन जाता है तब वह काला नाग बन जाता है और जिसे डस लेता है उसका रामनाम सत्य हो जाता है।धन अगर धर्म से जुड़ जाता है तो वह लक्ष्मी का असली स्वरूप हो जाता है और विष्णु भगवान का प्रिय हो जाता है।धन अगर भक्ति से जुड़ जाता है तो वह भक्त को साधारण से असाधारण और भक्त से भगवान बना देता है। भक्ति के साथ शक्ति का उपयोग नर से नारायण बनने जैसा माना गया है।धन से धर्म ज्यादा महत्वपूर्ण और जरूरी होता है क्योंकि धर्म के बिना धन इंसान को हैवान बना देता है। अभी चार दिन पहले हैवन देशों में हैवन लोगों का अकूत धन जमा होने का पर्दाफाश हो चुका है।इस समय धन के नाम पर कुछ लोग लक्ष्मी नही बल्कि कुलक्षिणी कमा रहें जो हमें नर से नरपिशाच बना देती हैं और राक्षसी प्रवृत्ति की ओर अग्रसर करती हैं।कहा भी गया है कि-" संत मिलन औ हरिकथा दुर्लभ जग माहि,सुत दारा और लक्ष्मी पापिहु के घर होत"।धन के बारे में जब दो पहिया चार दस सोलह बीस चक्का वाहन नोट करेंसी नही थे तब कहा गया था कि-"गोधन गजधन और बाजधन और रतन धन खानि जब आवै संतोष धन सब धन धूरि समान।।धन्यवाद।। सुप्रभात / वंदेमातरम् / गुडमार्निंग / नमस्कार / शुभकामनाएं।। ऊँ भूर्भुवः स्वः--------/ ऊँ नमः शिवाय।।।
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           भोलानाथ मिश्र
  वरिष्ठ पत्रकार/समाजसेवी
रामसनेहीघाट, बाराबंकी यूपी
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