Sunday, November 26, 2017

जाने क्या है प्राणिग्रहन संस्कार-भोला नाथ मिश्रा की कलम से

संस्कारों में वैवाहिक संस्कार और उनसे जुड़े ममत्व से लबरेज़ रीति रिवाजों का बहुत महत्व होता है।आमतौर पर मनुष्य के प्राणिग्रहण संस्कार की शुरुआत यज्ञोपवीत संस्कार से होती है। प्राणिग्रहण के पूर्व यज्ञोपवीत संस्कार किया जाता है वैसे यज्ञोपवीत संस्कार के लिए प्राणिग्रहण संस्कार करना आवश्यक नहीं होता है और यह कभी भी किया जा सकता है। वैदिककाल एवं वर्तमान वैदिक विद्यालयों में आज भी विद्याग्रहण की शुरूआत यज्ञोपवीत संस्कार के बाद ही की जाती है।जीवन के इस महत्वपूर्ण संस्कार से मनुष्य के जीवन की शुरुआत होती है क्योंकि इसी संस्कार के बाद ही मनुष्य को मनुष्यता की राह पर चलने की राह सीख मिलती है। जीवन जीने राह सिखाकर संस्कारित करने वाले को मनुष्य जीवन का दूसरा गुरू माना जाता है। प्रथम गुरु के रूप में माता माता को मान्यता दी गई है जबकि दूसरा गुरु रिश्तों का सुप्रीम यानी खानदान मान्य माता पिता का बहनोई आदि होता है। वह यज्ञोपवीत के समय वह यज्ञी के कान में जीवन मूल गायत्रीमंत्र को बताकर सदमार्ग पर चलने की शिक्षा देता है।मनुष्य उसके बताये हुए मार्ग पर चलकर प्राणिग्रहण संस्कार के योग्य बनता है। प्राणिग्रहण की शुरुआत देवी देवताओं खानदान के पुरखों के आवाह्वान से होती है और उनका गीतों को माध्यम से आकर प्राणिग्रहण संस्कार को विघ्नबाधा रहित कर सकुशल सम्पन्न कराने का निवेदन किया जाता है।यह कार्य घर गाँव परिवार की महिलाओं द्वारा किया जाता है। पूजन आवाह्वान का क्रम कई दिनों तक चलता है और पूजन की समाप्ति मातृपूजन से होता है और इसमें मनुष्य को ससुराल जाने से पहले कुयें में डूबकर मरने जा रही माता को जिंदगी पर पेट भरने का आश्वासन देकर घर वापस लाया जाता है।माँ और बेटे के बीच का यह दृश्य आज भी ममत्व भरा ही नही बल्कि प्रासंगिक बना हुआ है।प्राणिग्रहण संस्कार में दो अजनबियों को विभिन्न प्रकार के स्वागतों एवं रीति रिवाजों से एकाकार कर दूध में पानी की तरह आत्मसात कर देता है।प्राणिग्रहण संस्कार के दौरान अपनत्व ममत्व को मजबूती प्रदान करने के लिए तमाम रीति रिवाजों का सहारा लिया जाता है।प्राणिग्रहण संस्कार या विवाह दो अजनबी दिलों का मिलन और जीवन साथी के साथ जीवन जीने का सकंल्प होता है।धर्मपत्नी खाना बनाने एवं शारीरिक भूख मिटाने का साधन नहीं बल्कि जन्म जन्म का दुख सुख का साथी ही नही बल्कि आधा अंग होती है।प्राणिग्रहण संस्कार के बाद मनुष्य अपनी पत्नी के लिए भगवान बन जाता है।आजकल प्राणिग्रहण संस्कार के मायने बदलते जा रहे हैं और औपचारिक मात्र बनता जा रहा है।दहेज रूपी दानव ने इस पवित्र पावन संस्कार को कलंकित कर दिया है।जबसे प्राणिग्रहण संस्कार औपचारिक बनने लगा है तबसे जन्म जन्म के रिश्ते क्षण भर में चकनाचूर होने लगे हैं और मधुरता की जगह कड़ुवाहट पैदा होने लगी है।धन्यवाद।। सुप्रभात / वंदेमातरम् / गुडमार्निंग / नमस्कार / शुभकामनाएं।। ऊँ भूर्भुवः स्वः------/ऊँ नमःशिवाय।।।
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           भोलानाथ मिश्र
वरिष्ठ पत्रकार/समाजसेवी
रामसनेहीघाट, बाराबंकी यूपी
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