Thursday, November 9, 2017

किसान भगवान की दशा और मुख्यमंत्री गन्ना मूल्य बढ़ने पर विशेष रिपोर भोला नाथ मिश्रा की कलम से

आजकल आधुनिक तकनीक के सहारे खेती के भी आयाम बदल गये हैं और खेती भी कई तरह की होने लगी है।अब व्यवसायिक खेती को लोग प्रमुखता देने लगे हैं।अब लघु मध्यम और बड़े तीनों वर्ग के किसान गेहूँ चना मटर धान की जगह नकदी फसल के रूप में मेंथा गन्ना सब्जी केला आम आदि को प्रमुखता दे रहें हैं।व्यवसायिक खेती के बल पर ही किसान कुछ कमाई करके अपने जरूरी कार्यों को निपटा लेता है।अनाज की  खेती घाटे की खेती इसलिए मानी जाती है क्योंकि जिसके पास बाहर की कमाई नहीं है वह खेती से फायदा की जगह नुकसान उठाता है। किसान की खेती मौसम पर निर्धारित होती है और कभी कभी मौसम की मार से किसान की लागत जमापूंजी भी चली जाती है।खेती किसानी करना  कोई बच्चों का खेल नही होता है बल्कि चूक जाने पर जान चली जाती है।जब माघ पूस की जानलेवा सर्दी होती है तब किसान अपने गेहूं के खेत में सिंचाई करता है।जाड़े में गेहूं की सिंचाई करना उतना मुश्किल नहीं होता है जितना कठिन गन्ने की कटाई सफाई कराकर अपने या किराये के टैक्ट्रर से तौल केन्द्र या मिल गेट ले जाना होता है।कभी कभी गन्ना लदी ट्रैक्टर ट्रॉली पलट जाती हैं और कभी कभी किराए की ट्राली के साथ रात भी केन्द्र पर रूककर काटनी पड़ती हैं। गन्ने के खेत में साँप अजगर भेड़िया सभी रहते हैं और अच्छी उपज के लिये लागत लगानी पड़ती है। कुल मिलाकर गन्ने की एक बार की खेती अगर खाद पानी गोड़ाई होती रही तो तीन साल मीठे रस के साथ लाभ देती रहती है।गन्ने की खेती हम करते हैं लेकिन गन्ने से बनने वाली शकर में उत्पादक किसानों की सहभागिता नहीं है।जो नियन्त्रित मूल्य की शकर महीने में दो तीन किलो देती भी थी उसे भी सरकार ने बंद कर दिया है।फिलहाल हमारे प्रदेश के संत मुख्यमंत्री योगीजी ने भी दो दिन पहले गन्ने के मूल्यों में दस रुपये की वृद्धि की  है।यह वृद्धि सभी तरह के गन्नों पर लागू होगा। मुख्यमंत्री एवं उनके मंत्रिमंडल द्वारा लिया गया यह फैसला स्वागत योग्य सराहनीय कदम है।खेती खेती होती है और सभी में हानि लाभ का खेल होता है।लोग गन्ने के बाद केले की खेती को महत्व दे रहें हैं क्योंकि गन्ने की ही तरह यह खेती भी कभी कभी दुख दरिद्रता को दूर कर देती है लेकिन कभी कभी कोई टके के भाव हो जाता है।जिनका केला नवरात्रि के आसपास बिक जाता है तो उसे लाभ मिल जाता है लेकिन जिनका बाद में बिकता है तो उसके आधे भी नही मिलते हैं।इस समय सेल्फ खेती करना संभव नहीं है इसमें सहयोगी के रूप में मजदूर की जरुरत जरूर पड़ती है।मजदूर अब मिलना गाँवों में मुश्किल हो रहा है क्योंकि मजदूर शहरों में अच्छी कमाई कर रहा है।तकनीकी खेती के लिए कृषि यंत्रों का होना जरुरी होता है किन्तु लघु और मध्यम वर्ग के किसानों के लिए यह संभव नही होता है।हालांकि सरकार कृषि यंत्रों बीज आदि खरीदने पर विशेष छूट दे रही है लेकिन इसका लाभ सभी कृषकों को नहीं मिल पाता है।कुछ नहरें तबाही मचा रही हैं तो कुछ नहरें सूखी पड़ी है जबकि दस नवम्बर से रबी फसल के गेहूं की बुआई शुरू हो जाती हैं।किसान सरकार की दया एवं रहम का हकदार क्योंकि उसे भी दयासागर किसान भगवान कहते हैं। धन्यवाद।। सुप्रभात / वंदेमातरम् / नमस्कार / शुभकामनाएं।। ऊँ भूर्भुवः स्वः---------/ ऊँ नमः शिवाय।।।
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          भोलानाथ मिश्र
    वरिष्ठ पत्रकार/पत्रकार
रामसनेहीघाट, बाराबंकी यूपी
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