Saturday, November 18, 2017

गांवो में चौकीदारों की भूमिका और उनकी दिन दशा-भोला नाथ

आज हम ग्रामीण क्षेत्रों में कार्य करने वाले सुरक्षा से जुड़े सबसे निचले पायदान के पहरूआ चौकीदारों की भूमिका और उनकी वर्तमान दीन दशा पर चर्चा करना चाहते है।गाँवों में रहकर पुलिस सहयोगी की भूमिका निभाने वाले इन चौकीदारों का अतीत बहुत पुराना एवं गौरवशाली रहा है।आजादी के पहले इन चौकीदारों का बहुत महत्व होता था और जब चौकीदार साफा लेकर निकलता था तो लोग अज्ञात भय से डरकर घरों में घुस जाते थे। खाकी कमीज धोती बेल्ट बल्लमदार लाठी और लाल साफा चौकीदारों की पहचान होती थी।एक समय था जबकि गाँव की सुरक्षा में चौकीदारों का महत्वपूर्ण रोल था तथा उसकी बात पर अधिकारी विश्वास करते थे।आजादी के बाद चौकीदारों की हनक में तो मी जरूर आ गयी उसकी जिम्मेदारियां बढ़ गयी हैं। इधर सरकार ने चौकीदारों का वेतन जरूर बढ़ाकर पन्द्रह सौ रूपये कर दिया है लेकिन उन्हें मिलने वाली सुविधाओं में कटौती कर दी गई है।वैसे तो इन चौकीदारों को महीने में चार दिन थाना कोतवाली हाजिरी देने आना पड़ता है लेकिन जरूरत पड़ने पर कभी भी बुलाया जा सकता है।जो कार्य कोई नही करता है और वह कार्य पुलिस का है वह कार्य चौकीदारों से लिया जाता है।चाहे कोई घटना हो चाहे दुर्घटना हो मौके पर क्षत विक्षत शवों को बटोरने साथ में कभी कभी पोस्टमार्टम तक कराने इन चौकीदारों को जाना पड़ता है। थाना चौकी कोतवाली परिसर का साफ सुथरा रखने जिम्मेदारी इन चौकीदारों की होती है और जब थाने या कोतवाली हाजिरी लगाने आते हैं तो इन्हें घास छीलना और सफाई करना पड़ता है।इन भोलेभाले चौकीदारों के लिये सिपाही थानेदार और थानेदार कप्तान के बराबर होता है।गाँव के पहुरूआ चौकीदार गाँव और थाना कोतवाली तक ही सीमित नहीं रहते हैं बल्कि इनकी डियुटी विधानसभा लोकसभा ग्रामसभा आदि चुनावों में भी लगाई जाती है और यह अगली पंक्ति में डियुटी देते हैं।डियुटी के दौरान कभी कभी यह उपेक्षित चौकीदार हादसे के शिकार हो जाते हैं और जान तक चली जाती है।यह चौकीदार शाम को थाना या कोतवाली में शाम और सुबह का खाना बाँधकर और बिस्तर लेकर आते हैं और दूसरे दिन दोपहर बाद वहाँ से वापस आते हैं।इन्हें अब न तो वर्दी धोती समय पर मिलती है और न ही नये चौकीदारों को बिल्ला साफा ही मिल पा रहा है।थाने में इन्हें एक खुराक खाना भी नसीब नही होता है और घरेलू कार्य से लेकर सरकारी कार्य करने पड़ते हैं। दुनिया भले ही बदलकर विकास के क्षितिज पर पहुंच गयी हो लेकिन चौकीदार अपने अतीत को यादकर अपनी बदहाली पर आंसू बहा रहा है। चौकीदार शब्द खुद बखुद अपनी महत्वपूर्ण भूमिका को प्रदर्शित करता है। चौकीदार पहरेदार जिम्मेदारी पर मर मिटने वाला होता है और चौकीदार गड़बड़ होने का मतलब चोर का मालामाल होना होता है।चौकीदार चोरी तब करवाता है जबकि उसका पेट चौकीदारी करने से नहीं भरता है।एक समय था जबकि गाँवों में अपराधिक प्रवृत्ति के लोग पनाह नही पाते थे क्योंकि चौकीदार सजग और जागरूक होते थे।आजकल गाँव खाला के घर बन गये हैं और असमाजिक तत्वों को संरक्षण मिलने लगा है।चौकीदार चाहकर भी अपनी भूमिका को नहीं निभा पाते हैं क्योंकि उन्हें नौकरी से जान ज्यादा प्यारी होती है।इस समय कुछ स्थान ऐसे हैं जहाँ पर चौकीदार साफा बल्लमदार लाठी लेकर नहीं बल्कि अगौछा लेकर आ रहें हैं जबकि साफा बेल्ट ही उनकी पहचान होती है।चौकीदारों को कमजोर बनाकर गाँवों को सुरक्षित नहीं बनाया जा सकता है।चौकीदारों को निष्क्रिय नहीं बल्कि ग्राम सुरक्षा ईकाई के रूप विकसित करने की आवश्यकता है।गाँव के संदिग्ध लोगों की गतिविधियों पर नजर रखना और समय रहते पुलिस के चंगुल तक  अपराध करने से पहले पहुंचाना आवश्यक हो गया है क्योंकि अपराधी तभी डरता है जब उसे मालूम हो जाता है कि चौकीदार या पुलिस उस पर नजर रखने लगी है।धन्यवाद।। सुप्रभात / वंदेमातरम् / गुडमार्निंग / नमस्कार / शुभकामनाएं।। ऊँ भूर्भुवः स्वः--------/ ऊँ नमः शिवाय।।।
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           भोलानाथ मिश्र
  वरिष्ठ पत्रकार/समाजसेवी
रामसनेहीघाट, बाराबंकी यूपी
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