Sunday, November 12, 2017

नगर निकाय चुनाव में रूठों को मनाने का क्रम सुरु

लोकतंत्र में राजनीति की शुरुआत निःस्वार्थ सेवाभाव को लेकर हुयी थी। यहीं राजनीति का मतलब भी होता है किन्तु इधर राजनीति के मायने ही बदल गये हैं और अब राजनीति निःस्वार्थ भाव से नही बल्कि स्वार्थ के वशीभूत होकर होने लगी है। राजनीति में वसूलों सिद्धांतों और निःस्वार्थ सेवाभाव का दौर समाप्त हो गया है।अब राजनीति विचारधारा की नहीं बल्कि स्वार्थों की होती जा रही है।अब राजनीति देशहित में कम और चुनाव हित में ज्यादा होने लगी है। चुनाव में अपनी राजनीति चमकाने के लिए वसूलों सिद्धान्तों की बलि दे दी जाती है।इस समय चुनाव का दौर चल रहा है और पल पल दिल की धड़कने तेजी पकड़ने लगी है।कल तक जो अपने थे और अपने साथ चलते थे वह बेगाने हो रहे हैं।निजी स्वार्थ के आगे पार्टी की निष्ठा व विश्वसनीयता तार तार होने लगी है।जो लोग अपनी अपनी पार्टियों से नगर प्रमुख पद के लिये टिकट मांग रहे थे और पार्टी ने उन्हें नजरअंदाज करके दूसरे को टिकट दे दिया है वह बगावत पर उतर रहें हैं।नगर पंचायत चुनाव में फिर कार्यकर्ताओं की मांग बढ़ गयी है और शीशी खुलने लगी हैं। नामांकन के साथ ही कार्यकर्ताओं की जरूरत हर प्रत्याशी को है इसलिए उनके नखरे तो उठाने ही पड़ते हैं।इस चुनाव में सपा बसपा कांग्रेस और भाजपा ऐड़ी चोटी का जोर लगाये हैं।सभी ने एक से बढ़कर एक नगीना प्रत्याशी मैदान में उतारे हैं।राजनैतिक दलों की दृष्टि में चुनाव की महत्ता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा रहा है कि भाजपा ने मुख्यमंत्री मंत्री और केन्द्रीय मंत्रियों तक को चुनाव प्रचार में उतारने का निर्णय लिया है।इतना ही नहीं शायद नगर निकायों के चुनाव में पहली बार हैलीकॉप्टर का भरपूर इस्तेमाल किया जायेगा और भाजपा के स्टार प्रचारक इससे चुनावी सभाएँ करेगें।नगर निकायों में चुनावी डंका बज गया है और कार्यकर्ताओं का ध्रुवीकरण तथा मतदाताओं को अपनी तरफ आकर्षित करने का सिलसिला शुरू हो गया है।नगर निकायों के चुनाव में नामांकन कमी के कारण रद्द होने की संभावना बहुत कम होता है इसलिए नामांकन के साथ ही प्रचार शुरू जनसम्पर्क शुरू हो जाता है।जिन्हें अबतक लोग अपने सामने बैठने की अनुमति नहीं देते थे वह उनकी चरण वंदना करने में जुट गये हैं।रूठों  को मनाने गैरों को गले लगाने का दौर शुरू हो गया है।कुछ मतदाता समस्याओं को लेकर मुखरित होने लगे हैं लेकिन जहाँ निर्वतमान चेयरमैन चुनाव नहीं लड़ रहें हैं वहाँ पर बुराई करने का दौर जारी हो गया है।दारू की शीशी का कमाल गली कूचे तक दिखने लगा है और समर्थक लोग शीशी लगाकर प्रत्याशी की वकालत करने लगे हैं।मतदाताओं का वर्ग तीन खंडो में विभाजित है एक वर्ग ऐसा जो अपने मताधिकार को समझता है जिसे अपने नगर की चिंता है दूसरा वर्ग वह है जो विभिन्न राजनैतिक विचारधारा से जुड़ा होता है।तीसरा वर्ग किसी विचाराधारा से नही बल्कि वह शराब और पैसे पर चलता है।शराब और पैसे की प्रवृत्ति मतदाताओं ने नहीं बल्कि नेताओं ने शुरू की है। चुनाव शुरू होते ही शराब और पैसे के बल चुनावी जिंदाबाद मुर्दाबाद शुरू हो जाता है।स्थिति यहाँ तक आ जाती है कि कार्यकर्ताओं में ही आपसी भिंड़त हो जाती है।नगर निकायों के चुनाव ऐसे लोगों के लिए वरदान बनकर आये हैं।इस षमय हर प्रत्याशी अपने को विजयी मानकर सिर कफन बाँधकर चुनावी महाभारत में कूद पड़ा है। धन्यवाद।। सुप्रभात / वंदेमातरम् / गुडमार्निंग / नमस्कार / शुभकामनाएं।। ऊँ भूर्भुवः स्वः---------/ ऊँ नमः शिवाय।।।
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           भोलानाथ मिश्र
वरिष्ठ पत्रकार/समाजसेवी
रामसनेहीघाट, बाराबंकी यूपी
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