Friday, November 3, 2017

गांव नगर की सरकारी योजनाओं पर विशेष रिपोर्ट-भोला नाथ मिश्रा की कलम से

एक तरफ तो सरकार समाज के विभिन्न वर्गों के कल्याण के लिए तमाम महत्वाकांक्षी कल्याणकारी योजनाएं चला कर सरकारी खजाने को खाली कर रही है वहीं दूसरी तरफ समाज के विभिन्न वर्गों को इन योजनाओं का शतप्रतिशत लाभ नहीं मिल पा रहा है।सरकार की सारी कल्याणकारी योजनाओं का ध्रुवीकरण नगर पंचायतों एवं ग्राम पंचायतों में हो जाता है।नगर पंचायतें या ग्राम पंचायतें सरकार की इन तमाम योजनाओं का लाभ पात्रता देखकर नहीं बल्कि मुंह देखकर देती हैं।नगर पंचायत हो चाहे ग्राम पंचायत हो हर जगह पात्र वहीं होता है जो प्रधान या चेयरमैन साहब का विश्वासपात्र समर्थक होता है और चुनाव के दौरान सीना ठोककर उनके साथ रहता है।यहीं कारण है कि चाहे पहले की वीपीएल सूची हो चाहे आवास सूची हो चाहे आर्थिक गणना हो चाहे सरकारी आवासों का वितरण हो सभी योजनाओं में तमाम लोगों के नाम छूट जाते हैं और पात्र की जगह अपात्रों का चयन हो जाता है।वेवश बेसहारा विधवाओं विकलांगों वृद्धों के लिये सरकार भले ही पेंशन योजना चला रही हो लेकिन इसके बावजूद तमाम विधवाएं विकलांग वृद्ध ऐसे हैं जिन्हें योजना का लाभ नही मिल पा रहा है।जिन्हें योजनाओं का लाभ मिल भी रहा है वह योजनाओं को खरीद रहे हैं।अगर पेंशन के लिए डेढ़ से दो हजार रुपये नहीं दिये जाते हैं तब तक पेंशन स्वीकृत नहीं की जाती है और वह बैंक में खाता चेक करता रह जाता है।इसी तरह लोहिया आवास योजना के समय एक आवास के बदले लोगों से पचास से सत्तर हजार रुपये तक वसूले गये और जुबान न खोलने की हिदायत दी गई।इस मोदी योगी सरकार प्रधानमंत्री आवास थोक भाव में वितरित कर रही है और उसका दावा है कि सन् दो हजार बाइस तक देश में कोई भी आवासविहीन नही बचेगा। प्रधानमंत्री से लेकर मुख्यमंत्री तक सभी आवास के नाम पर धन उगाही न करने की लगातार हिदायत दे रहे हैं इसके बावजूद गांवों व नगरों में प्रायः बीस से तीस पैतिस हजार रुपये लेने के बाद ही नाम सूची में उस शर्त  शामिल किया जाता है कि किसी से इसकी शिकायत नहीं करेंगे।बहुत कम ही लोग भाग्यशाली होते हैं जिन्हें कुछ देना नहीं पड़ता है और मुफ्त में आवास मिल जाता है।सरकार तमाम पैसा गाँव व नगर पंचायतों को सर्वांगीण विकास कराने के लिए देती है किन्तु ठेकदारी प्रथा और कमीशनखोरी के चक्कर में कितना और किस क्वालिटी का कार्य होता है उसे सभी जानते हैं।कुछ कार्य कराये जाते हैं और कुछ का भुगतान बिना कार्य ही निकाल लिया जाता है।एक ही कार्य के नाम पर अलग अलग कई लोग सरकारी पैसा हजम कर जाते हैं। मनरेगा जैसी महत्वाकांक्षी योजना अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों के भ्रष्टाचार के चलते बदनाम हो गयी और वर्षों से सीबीआई जांच चल रही है।गांव नगर में चलने वाली सरकार की अति महत्वाकांक्षी परियोजना राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन और उसके तहत चलने वाली जननी सुरक्षा योजना गाँव गरीबों का भला कर रही हो या न कर पा रही हो लेकिन तमाम नेताओं और अधिकारियों का भला जरूर हो गया।अगर भला नहीं हुआ होता तो सीबीआई जांच में लोग जेल क्यों जाते? क्यों लोगों ने जेल में कथित आत्महत्या कर ली?गाँवों की स्वच्छता के लिए स्वास्थ्य विभाग अपने स्तर से चाहे ग्राम पंचायत स्तर हो या नगर पंचायत हो दोनों को अलग एक मुश्त धनराशि हर साल दी जाती है।इस धनराशि का आहरण प्रधान और महिला स्वास्थ्य कार्यकर्ता एएनएम के संयुक्त हस्ताक्षर से होता है किन्तु उसका उपयोग धरातल पर लक्ष्य के अनुकूल कभी नही होता है।नगर और गाँवों की पेयजल समस्या का निदान सरकार और जनप्रतिनिधि दोनों करते हैं लेकिन दोनों जगहों पर धन उगाही के आरोप अब तक लगते रहें हैं।गाँव नगर की सफाई के लिए सफाई कर्मियों की फौज तैनात है फिर भी गाँव नगर सभी जगहों पर नालियां बजबजा कर संक्रामक बीमारियां फैला रही हैं।गाँव गरीबों के लिए सरकार सस्ते दामों पर राशन किरोसिन आदि उपलब्ध कराती है जिसके लिए अब आनलाइन आवेदन कराया गया है पिछले दो सालों से बार बार जांच हो रही है और पांच किलो प्रति व्यक्ति राशन के लिये मारामारी मची है।तमाम लोग चिल्ला रहे हैं कि कई बार आनलाइन होने के बाद भी उनका नाम वितरण सूची नहीं आया है।विभाग कह रहा है कि जिन गाँवों का लक्ष्य पूरा हो गया है वहाँ के लोग चिल्लपों कर रहें हैं।गाँव नगर से जुड़ी किसी भी योजना का शतप्रतिशत कौन कहे सत्तर फीसदी भी खर्च मौके पर नहीं हो पाता है।गाँवों के बहुमुखी विकास के लिए हर सरकार विशेष ग्राम विकास योजनाएं चलाकर विकास करवाती है लेकिन उसी गाँव का चयन सरकार बदलने पर पुनः हो जाता है फिर गाँव का बहुमुखी विकास मौके पर नहीं हो पाता है।गाँव के विकास के लिए गाँव गाँव करोडों खर्च करके डामरदार या सीसी रोड बनवाई जा रही हैं लेकिन वह पांच साल भी नहीं टिक पाती है और मरम्मत योग्य होकर बेकार होने लगती है।गाँव और नगरों का विकास पहले की अपेक्षा बहुत हुआ है और गाँव गाँव तक बिजली रोड घर घर या टोलावार इंडिया मार्का हैंडपंप लग गये हैं और घर घर दो पहिया चार पहिया वाहन और मोबाइल हो गये हैं।इसके बावजूद अभी भी तमाम लोग ऐसे हैं जो बद से बदतर जीवन यापन करते हैं।प्रकृति के साथ हर तिमाही छमाही जुँआ खेलने वाले किसान भगवान ऐसे हैं जो आज भी थोड़ी बहुत खेती होने के बावजूद भूंखे नंगे तंगहाल रहते हैं।खेती उद्योग नहीं बल्कि एक सेवा होती है इसीलिए किसान को भगवान कहा जाता है। धन्यवाद।। सुप्रभात / वंदेमातरम् / गुडमार्निंग / नमस्कार / शुभकामनाएं।। ऊँ भूर्भुवः स्वः-------/ऊँ नमः शिवाय।।।
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            भोलानाथ मिश्र
  वरिष्ठ पत्रकार/समाजसेवी
रामसनेहीघाट, बाराबंकी यूपी
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