Tuesday, December 26, 2017

बेदर्दी ठंढ का जानलेवा कहर-भोला नाथ मिश्रा का लेख

आज हम सबसे पहले अपने पाठक साथियों को प्रभु ईशु के जन्मदिन व बड़े दिन पर बधाई देना चाहते हैं। मौसमों में जाड़े के मौसम को बड़ा बेदर्द माना जाता है इसीलिए जाड़े के मौसम में हर छोटा बड़ा अमीर गरीब बेहाल हो जाता है। जाड़े का मौसम कमजोर वेवश और बुढ्ढों के लिये महाकाल बनकर आता है और जवानों के लिये खूब मनचाहा भोजन करके मस्ती फरमाने का सुनहरा अवसर होता है।जाड़े के दिनों में जो कुछ खाया जाता है वह सब हजम हो जाता है और बदहजमी नजदीक नही फटकने पाती है।इस समय में युवा दिलों की धड़कनें बढ़ जाती हैं और मौसम को रंगीन बना देती हैं।जाड़े के मौसम से निपटना हर एक के वश बात नही होती है क्योंकि जाड़ा का मुकाबला सिर्फ आग या गर्म कपड़ों से किया जा सकता है।गर्म कपड़ों में गर्मी पैदा करने के लिये भी शरीर में गर्मी पैदा करने के लिए आग की ही जरूरत पड़ती है।आग को गले से लटकाकर पहाड़ी लोग जाड़े से बचाव करते हैं लेकिन मैदानी क्षेत्रों के लोगों के लिए ऐसा संभव नही है।जाड़े के मौसम ने अभी सिर्फ अगड़ाई ली है उतने में ही पूरा वातावरण कड़ाके की चपेट में आकर कपकपाने लगा है।लोगों को घर में दुबकने के विवश होना पड़ रहा है।इस मौसम में कोई घर से जल्दी बाहर नहीं निकलता है लेकिन जिसकी मजबूरी होती है उसे तो निकलना ही पड़ता है। जिन्हें मजबूरी में बीमारी आजारी अदालत अस्पताल जाना है उन्हें इस जानलेवा सर्दी से बचने में के लिये विशेष जरूरत होती है।इन वेवश मजबूर लोगों को सर्दी से बचाने का उत्तरदायित्व सरकार निभाती है और करोड़ों रुपये कम्बल और सार्वजनिक स्थानों पर अलाव जलाने के नाम पर हर साल खर्च करती है।सरकारी इस जाड़ा बचावों अभियान का फायदा आम जनमानस को नही मिल पाता है बल्कि हर ग्राम पंचायत के दस पांच प्रधान और लेखपाल के कृपापात्रों को ही इस अभियान मिल पाता है। समाज एक बड़ा तबका ऐसा है जो बेहतर ढंग से जाड़े से बचाव की व्यवस्था नही कर पाता है और किसी तरह जाड़े की रात काटता है। अबतक जाड़े में हर गरीब अमीर को जलौनी मिल जाती थी क्योंकि पुरानी बागें थी और सड़क के किनारे लगे पुराने पेड़ गरीबों के लिए वरदान थे। आजकल जलौनी की समस्या है क्योंकि पुरानी बागें और सड़क के किनारे लगे फलदार व छायादार पेड़ समाप्त हो गये हैं। यूक्लिप्टस जैसे पेड़ जलौनी का आधार बने हुए हैं लेकिन छः सौ से आठ सौ रूपये कुंटल देकर खरीदना हर किसी के वश की बात नही होती है। लकड़ी की मंहगाई सरकार अलाव को प्रभावित करने लगी है और सरकारी अलाव के नाम पर मात्र औपचारिकता पूरी की जाती है।सरकारी अलाव जलाने के नाम मजाक किया जाता था और जाड़े में लगातार सार्वजनिक स्थानों पर अलाव नही जल पाते हैं। पुलिस सार्वजनिक स्थानों पर अपनी जान बचाने के लिए लकड़ी की व्यवस्था करती है और उसे मौका पड़ने पर सरकारी अलाव बताकर सरकारी धन हड़प लिया जाता है। गाँव गली में सरकारी अलाव की व्यवस्था न होने से लोगों को भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है।कोई भी दैवी आपदा का मुकबला सरकारी भरोसे नही हो पाता है और हमेशा समाज के दानवीर कर्णों को आगे आना पड़ता है।इस बात की बहुत खुशी है कि हर बार बाढ़ हो चाहे दैवी आपदा हो हमारे तमाम दानवीर लोग आगे आ जाते हैं।गरीबों को जाड़े से बचाना ईश्वरीय कार्य एवं ईश्वरीय पूजा होती है और इस पूजा को करना हर मानव का धर्म बनता है।घर के पुराने कपड़ों को ठंड में दान देकर पुण्य कमाया जा सकता है और जो लोग इस कार्य में लगे हैं वह सभी बधाई के पात्र हैं।अब वह समय आ गया है कि दानवीर लोग सामने आकर गरीबों को जाड़े की मार से बचाने में जुट जाय।अबतक सरकारी कम्बलों का वितरण शुरू नहीं हुआ है जबकि ठंड अपनी जवानी पर आ गयी है।धन्यवाद।। भूलचूक गलती माफ।। सुप्रभात / वंदेमातरम् / गुडमार्निंग /नमस्कार / शुभकामनाएं।। ऊँ भूर्भुवः स्वः---------/ऊँ नमः शिवाय।।।
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          भोलानाथ मिश्र
वरिष्ठ पत्रकार/समाजसेवी
रामसनेहीघाट, बाराबंकी यूपी
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