Sunday, December 24, 2017

ग्रहस्थ जीवन मे परिवार की भूमिका सुखद अनुभव

सुप्रभात-सम्पादकीय
मनुष्य जीवन में गृहस्थ जीवन को बहुत महत्व दिया गया है क्योंकि गृहस्थ जीवन संसारिक क्रियाकलापों एवं झंझावातों के साथ कर्तव्यों कर्मो उत्तरदायित्वों एवं धर्मकर्म से जुड़ा होता है। गृहस्थ जीवन का परिवार आधार होता है क्योंकि एकांकी मनुष्य घर गृहस्थ नही बन सकता है। गृहस्थ बनने के लिए खेतपात धनदौलत ताकत की जरूरत नहीं बल्कि परिवार की जरुरत होती है। परिवार अपेक्षाओं एवं स्वार्थों से परिपूर्ण होता है इसलिए जल्दी परिवार में एकरूपता एवं समानता नहीं आ पाती है। जिस परिवार में एकरूपता समानता आ जाती है उस परिवार के सदस्यों एवं मुखिया का गृहस्थ जीवन धन्य हो जाता है।जिस परिवार में इसका अभाव हो जाता है उसका गृहस्थ जीवन नरक हो जाता है और मुखिया मायामोह में फंसकर मनुष्य जीवन बेकार कर लेता है।इसीलिए गृहस्थ जीवन के अंत में परिवार का त्याग करके वानप्रस्थ की व्यवस्था बनाई गयी थी।वानप्रस्थ की व्यवस्था जबसे समाप्त हो गयी तबसे गृहस्थ जीवन का अंत दुखदायी होने लगा है क्योंकि परिवार अपने उत्तरदायित्वों का निर्वहन नही कर रहा है।इस कलियुग में परिवार में कौन राक्षस वर्ण है कौन देववर्ण है पहचान करना कठिन हो गया है और समय समय पर कहने लगते हैं कि यह पत्नी भाई बेटा बेटी पुत्र नही बल्कि दुश्मन हैं राक्षस हैं तथा यह हमारी जान लेने आये हैं। गृहस्थ जीवन सुबह से रात तक तमाम कर्तव्य कर्मो धर्मो से जुड़ा रहता है और पूजा पाठ जप तप ध्यान मान करने का जल्दी कोई विशेष अवसर नही मिल पाता है। इन तमाम झंझावातों के बावजूद जो कभी भी किसी भी तरह ईश्वर को आँख मूंदकर एक बार भी सिर झुकाकर सजदा कर लेता है तो उसे जपी तपी ज्ञानी विज्ञानी संत महात्मा की तपस्या से अधिक का फल प्राप्त हो जाता है। इसीलिए गृहस्थ जीवन को तपोभूमि भी कहा गया है और इसी गृहस्थ जीवन से जूझकर न जाने कितने लोग ईश्वर के प्रिय बन चुके हैं। संत तुकाराम का परिवार ही उनकी ईश्वर भक्ति पर यकीन नहीं करता था जबकि उन्होंने जीवन में कई चमत्कार भी दिखाई। आखिर में जब ईश्वर ने उन्हें लेने के लिए विमान भेजा और उन्हें मनचाही संख्या में साथ लाने का अधिकार दे दिया तब भी लोगों को कौन कहे उनके परिवार ने उनके ऊपर यकीन नहीं किया। घर परिवार एवं गाँव वालों को तुकाराम की बात पर यकीन तब आया जबकि वह स्वर्ग विमान पर बैठकर सीमा से दूर निकल गये। गृहस्थ जीवन में परिवार ही माया मोह का मूल होता है और मनुष्य इसमें फंसकर लाख गुनाहों के बावजूद परिवार का त्याग नहीं कर पाता है।एक परिवार भगवान रामचन्द्र जी का था और एक परिवार भगवान श्रीकृष्ण जी का भी था।भगवान राम का परिवार के लिए तो आदर्श था तो भगवान श्रीकृष्ण का परिवार इतना नालायक निकला उसे अपनी आंख के समाप्त होते देखना पड़ा। परिवार के मुखिया को कभी कभी भगवान राम की तरह नदी में डूबकर जान दे देनी पड़ती है। गृहस्थ जीवन में ईश्वर की याद और उसकी मौजूदगी का अहसास करते दिनचर्या बनाये रखना ही बचाव का एकमात्र विकल्प होता है। धन्यवाद।। भूलचूक गलती माफ।। सुप्रभात / वंदेमातरम् / गुडमार्निंग / नमस्कार / शुभकामनाएं।। ऊँ भूर्भुवः स्वः----/ ऊँ नमः शिवाय।।।     
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          भोलानाथ मिश्र
वरिष्ठ पत्रकार/समाजसेवी
रामसनेहीघाट, बाराबंकी यूपी
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