Friday, December 1, 2017

किसानों की हमदर्द सरकार और नवम्बर में नहरों की सफाई पर विशेष

इस देश में एक तरफ तो किसान को भगवान कहा जाता है और दूसरी तरफ उसका हर स्तर पर शोषण करके उसे बेवकूफ एवं कमजोर बनाया जा रहा है। किसान एक ऐसा है जिसकी मेहनत से सभी मनुष्यों का ही नही बल्कि पशु पक्षियों व जीवों का पेट भरता है।किसान भगवान होते हुए भी हमेशा बेचारा बना रहता है।एक बीघे से एक हेक्टेयर तक के किसान को खेती में फायदा नहीं बल्कि घाटा उठाना पड़ता है।किसान भगवान और सरकार दोनों के भरोसे अपनी खेती को करता है और जब दोनों दगा दे जाते हैं तो वह बेहाल होकर निढाल होकर मृत्युशैय्या की ओर अग्रसर होने लगता जाता है। किसान को समय पर खाद पानी बीज उपलब्ध कराना सरकार का दायित्व बनता है और दायित्व का निर्वहन करना सरकार का धर्म होता है।किसान इस देश का इकलौता ऐसा उत्पादक होता है जिसे अपने उत्पादन का मूल्य निर्धारित करने का अधिकार नही है बाकी अन्य सभी उत्पादक अपने उत्पाद का मूल्य खुद तय करते हैं।इसी तरह किसान को छोड़कर अन्य हर उत्पादकों को नुकसान होने पर पूरी बीमित धनराशि बीमा कम्पनी से मिल जाती है लेकिन किसानों को उनकी बीमित फसल की शतप्रतिशत क्षतिपूर्ति नही मिल पाती है।किसान के उत्पादन का मूल्य वह लोग निर्धारित करते हैं जो खेती किसानी से कोसों दूर एअरकंडीशन में रहते हैं और उन्हें खेती का ककरहा कखगघड तक भी नही मालूम होता है। भोलाभाला किसान सरकार और भगवान के भरोसे खेती किसानी करता है।सरकार किसानों को खाद पानी बीज दवाएं सबकुछ उपलब्ध कराती है लेकिन उसकी अनुभवहीनता या लापरवाही किसानों के लिये समस्या ही नहीं पैदा कर रही है बल्कि उसे कंगाल बना देती है। इस समय किसान अपने सारे अन्य कार्यों को छोड़कर रबी फसल की बुआई करने के लिये बेताब है क्योंकि गेहूँ बुआई करने का समय समाप्त होने वाला है। हमारे यहाँ पर आज भी चालीस फीसदी किसानों के पास सिंचाई करने की निजी व्यवस्था नहीं है और वह नहर या किराये के पानी से खेती करते है। एक समय था कि सितम्बर के पहले या दूसरेे पखवाड़े नहरों में पानी आ जाता था और पन्द्रह नवम्बर तक छोटे बड़े सभी किसान गेहूँ बुआई करने के लिये अपने अपने खेत का पलेवा कर लेते थे।इस तरह से बुआई समय पर एक माह के अंदर हो जाती थी।हमारा देश भले ही पहले की अपेक्षा अब प्रगति पर हो लेकिन सिंचाई विभाग और सरकार का रवैया किसानों के प्रति पहले से भी बदतर हो गया है।आज नवम्बर महीने की अंतिम तारीख है और गेहूँ बुआई करने का समय अंतिम दौर में पहुंच गया है लेकिन इस समय सरकार गेहूं बुआई करने के लिये पानी उपलब्ध कराने के लिए नहरों की सफाई करवा रही है। सभी जानते हैं कि पलेवा करने के बाद खेत  जुताई बुआई करने लायक बनने में एक पखवाड़े का समय लग जाता है।कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि पन्द्रह दिसम्बर के बाद बुआई करने से उत्पादन घटकर आधा हो जाता है और फसल के दाने पतले होकर बेकार हो जाते हैं।लेकिन ताज्जुब तो इस बात का है कि सरकार को नहरों की सफाई करवाने की सुधि नवम्बर महीने में आई है।लगता है कि सरकार और सिंचाई विभाग किसानों को पानी तब देगें जब उसकी जरूरत खत्म हो जायेगी और नुकसान होने लगेगा। किसानों की हमदर्द सरकार का फर्ज बनता था कि जो कार्य सरकारी खजाने का पैसा खर्च करके अब करवा रही है उसे समय पर सितम्बर के प्रथम पखवाड़े में करा लेती। कहावत भी है कि-" का बरखा भय कृषि सुखाने " यानी फसल सूखने के बाद बरसात होने का कोई फायदा नही होता है।कहते हैं कि-"समय का चूका किसान और डाल का चूका बंदर जल्दी जीवित नहीं बचता है।गेहूँ बुआई के समय पलेवा करने की तैयारी करना किसानों की हमदर्दी का नहीं बल्कि दुश्मनी का प्रतीक है। सरकार द्वारा जल्दबाजी में कराये गये कार्य गुणवत्तापूर्ण नहीं बल्कि अनौपचारिक होते हैं।यहीं कारण है कि सरकार द्वारा करवाई जा रही नहरों की सफाई की गुणवत्ता पर सवाल उठने लगे हैं क्योंकि नहरों की सफाई मशीन द्वारा रातोरात करा दी गयी है।सरकार विपक्ष और व्यवस्था में बैठे लोग अपने को किसान हितैषी बता रहें हैं लेकिन शायद उन्हें खेती करने का समय ज्ञान नही है।अगर होता तो नवम्बर महीने में नहरों की सफाई नही बल्कि टेल तक पानी पहुंच रहा होता। धन्यवाद।। सुप्रभात / वंदेमातरम् / गुडमार्निंग / नमस्कार / शुभकामनाएं।। ऊँ भूर्भुवः स्वः-------/ ऊँ नमः शिवाय।।।
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           भोलानाथ मिश्र
वरिष्ठ पत्रकार/समाजसेवी
रामसनेहीघाट, बाराबंकी यूपी
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