Monday, December 18, 2017

मातृभाषा हिंदी की उपेक्षा और अंग्रेजी को बढ़ावा

🇮🇳सुप्रभात-सम्पादकीय🇮🇳 देश को आजादी मिले भले ही छः दशक बीत गये हो लेकिन हमारी मातृभाषा हिन्दी आज भी गुलामी की जंजीरों से जकड़ी अंग्रेजी की गुलाम बनी हुयी है। दुनिया के सभी देश अपने कार्य व्यवहार में अपने देश की मातृभाषा का इस्तेमाल करते हैं किन्तु अकेला भारत ऐसा देश है कि जहाँ आज भी हिन्दी की जगह अधिकांश कार्य व्यवहार अंग्रेजी में होता है।अंग्रेज भले ही हमारे देश से चले गये हो लेकिन अंग्रेजी आज भी अपना दबदबा बनाये हुये है और तमाम लोग उसके गुलाम बने हुये हैं।चाहे सरकारी कार्यालय हो चाहे बैंक हो चाहे अदालत हो हर जगह अंग्रेजी का भरपूर इस्तेमाल होता है।सरकारी योजनाओं के प्रारूप हो चाहे बैंक के बंधपत्र आदि हो सभी अंग्रेजी में होते हैं जिन पर अनपढ़ लोगों से अँगूठा लगवा लिया जाता है।उसमें क्या लिखा होता है यह सिर्फ अंग्रेज की औलादें ही जान सकती हैं।यहीं कारण है कि भोलीभाली हिन्दी भाषी जनता जानकारी के अभाव में धोखाधड़ी के शिकार हो जाते हैं।यह कैसी विडम्बना है कि हिन्दी को अपने ही घर में महत्वहीन पंगु बना दिया गया है। जब कभी कोई विदेशी राजनेता हमारे यहाँ आता है तो अपने देश की मातृभाषा बोलता है और दुभाषिया उसका रूपांतरण करता है लेकिन हमारे देश के नेता जब विदेश दौरे पर जाते हैं तो अपनी मातृभाषा की जगह अंग्रेजी का इस्तेमाल करते हैं। आज हिन्दी अपनों की ही उपेक्षा की शिकार होकर सिसकियां भर रही है।अदालतों में प्रायः चाहे अदालती कार्यवाही या चाहे बहस आदि हो वह सब अंग्रेजी में ही होती है और हिन्दी भाषी मुवक्किल कुछ समझ नहीं पाता है और अदालत व वकील का मुंह ताकता रह जाता है।मातृभाषा हिन्दी को आजाद करने की मांग आजादी के समय से ही की जा रही है फिर भी वह आजतक गुलाम बनी हुयी है।परसो महामहिम राष्ट्रपति महोदय ने इस दिशा में एक न्यायिक कार्यक्रम के दौरान एक स्वागत योग्य पहल की गयी है और न्यायिक समारोह में इस पर चिंता व्यक्त करते हुए अदालती कार्य व्यवहार अंग्रेजी की जगह हिन्दी में करने की सलाह दी गई है।यह पहला अवसर है जबकि देश के प्रथम नागरिक महामहिम राष्ट्रपति ने हिन्दी की वकालत की गयी है। हिन्दी का उद्भव हमारी देवभाषा संस्कृत से हुआ है जबकि अन्य भाषाओं का उद्भव हिन्दी से हुआ है।हिन्दी को सभी भाषाओं की जननी माना गया है लेकिन दुख की बात है कि अपनी जननी का सम्मान अपने ही लोग नहीं कर रहे हैं।कुछ लोग हिन्दी में बात करना अपनी बेइज्जती मानते हैं और अंग्रेजी बोलने में गर्व महसूस करते हैं।हिन्दी की उपेक्षा के पीछे यह तर्क दिया जाता है कि अंग्रेजी विश्व की भाषा है तथा इसीलिए सभी लोग अंग्रेजी को प्रमुखता दे रहें हैं।हमारे देश में अंग्रेजी माध्यम के विद्यालयों को बढ़ावा दिया जा रहा है और हिन्दी संस्कृत को बढ़ावा देने वाले विद्यालयों की उपेक्षा की जा रही है जिसके कारण वह पतनोन्मुख हो रहे हैं।अगर यहीं हाल रहा तो.वह दिन दूर नहीं है जबकि हिन्दी संस्कृत लुप्त हो जायेगी।हिन्दी संस्कृत लुप्त होने का मतलब भारतीय संस्कृति एवं भारतीय सभ्यता का लुप्त होना होता है।महामहिम राष्ट्रपति महोदय की चिंता और मशविरा इस दिशा में अनूठीं पहल है और इस पहल की जितनी प्रशंसा की जाय उतनी कम है।अपनी मातृभाषा का जब अपने ही देश में इस्तेमाल नहीं होगा तो क्या दूसरे देश में होगा? इसके लिए जरुरी है कि चाहे बैंक हो चाहे अदालत हो चाहे कोई भी सरकारी अर्द्धसरकारी कार्य हो उसे हिन्दी में होना आवश्यक है क्योंकि देश की आधी आबादी अंग्रेजी नही जानती है।धन्यवाद।। भूलचूक गलती माफ।। सुप्रभात / वंदेमातरम् / गुडमार्निंग / नमस्कार / शुभकामनाएं।। ऊँ भूर्भुवः स्वः----------/ऊँ नमः शिवाय।।।
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            भोलानाथ मिश्र
वरिष्ठ पत्रकार/समाजसेवी
रामसनेहीघाट, बाराबंकी यूपी
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