Saturday, January 20, 2018

मै देर करता नही देर हो जाती है

महोबा, ( रितुराज राजावत ) जिंदगी भाग रही है रफ्तार के साथ और तमाशबीन बनकर देख रहा हूँ मैं । अजीब कशमकश भरी तन्हा जिंदगी गुजरती जा रही है । हर तरफ चेहरे तो जाने पहचाने से लगते हैं पर उनमे कोई अपना नही दिखता । दिल में अजीब सी उलझन है आखिर तलाश किसको रहा हूँ मैं । मुस्कुराहट एक बोझ की तरह चेहरे पर छा जाती है शायद जिंदगी जीने का सलीका भूल बैठा हूँ मैं । अपनों के लिए वख्त नही और पराए के पीछे दौड़ता जा रहा हूँ मैं। अजीब हालातों के साथ गुजर रहा है जिंदगी का एक एक लम्हा सब कुछ पास होते हुए भी दिल को सुकून नही मिलता । रास्तों से गुजरते इंसानों को देखकर जिंदगी सभी के अकेले होने का एहसास बड़ी मासूमियत के साथ दिला जाती । शायद चलते फिरते बेजान जिस्मों से अब रूहें जुदा हो चुकीं हैं । सोंचता हूँ कि जैसे सिर्फ मैं ही मायूस हूँ पर गौर से तफ्तीश करने में हर एक को खुद के जैसा पाता हूँ मैं । ना जाने कितने सावन इन आँखों ने अब तक बरसते देख लिए । पर दरख्तों की सूखी  डालियों को आज भी अपने इर्द गिर्द पाता हूँ मैं । बड़ा सोंचता हूँ मैं की जिंदगी को खुशनुमा रफ्तार के साथ जियूं पर ना चाहकर भी अक्सर देर कर जाता हूँ मैं।

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