Tuesday, January 9, 2018

बेदर्द जानलेवा ठंड का कहर

हम सौभाग्यशाली हैं कि हमें साल में चार तरह के मौसमों का आनंद मिलता है।इस तरह का सौभाग्य हर जगह नहीं मिल पाता है। इन चार तरह के मौसमों में ठंड का मौसम सबसे ज्यादा जालिम एवं निष्ठुर माना जाता है। ठंड का मौसम गरीबों के लिए जानलेवा होता है और जरा सी चूक होने पर जान पर बन आती है।बड़े लोग तो अपनी गाड़ी और घरों में गर्म एसी चलाकर जाड़े को ठेगा दिखा देते हैं और उनके ऊपर मौसम बदलाव का कोई असर नहीं पड़ता है। सबसे ज्यादा दिक्कत मध्यम एँव छोटे लोगों को होता है जिनके पास गर्म "एसी" नहीं होती है और वह सिर्फ कपड़ें के सहारे माघ पूस में रहते हैं। जाड़े का मौसम घर से बाहर निकलने वालों के लिए सबसे अधिक कष्टदायी होता है और उन्हें ठंड से बचना बहुत मुश्किल हो जाता है।इस समय गाँव हो चाहे शहर हो हर जगह ठंड का अधिपत्य है और घरों से निकलना दुश्वार हो गया है।एक आग ऐसी है जो ठंड से मुकाबला करने में सहायक हो रही है क्योंकि आग के बिना गर्म कहे जाने वाले कपड़े भी गर्म नही होते हैं।इस समय समाज का साठ फीसदी आदमी ठंड से बेहाल हैं और उसे जान बचाने के लाले पड़े हैं। ठंड के मौसम में बर्फीली हवाएँ पाला शरीर को बेजान करके जाड़े की सिद्दत को बढ़ावा दे रही हैं। कुशल यह है कि अभी जाड़े में होने वाली महावट की बरसात नहीं हुयी है।जाड़े की बरसात रबी की कम पानी वाली फसलों के लिए वरदान और जनमानस के लिए अभिशाप होती है।बरसात के साथ पड़ने वाली सर्दी बच्चों और बुजुर्गों के लिए मौत बनकर आती है।वैसे कहा भी जाता है कि जाड़े का मौसम कहता है कि-" लरिकन से बोलित नाही उइ लागै हमार सग भाई औ बुढ़वन का हम छोड़ित नाहीं चाहे ओढ़ै सात रजाई "। सरकार अकेले दम पर सभी लोगों को जाड़े की मार से नहीं बचा सकती है और जो बचाव के उपाय करती है वह ऊंट के मुंह में जीरे के समान होता है। सरकार हर साल गरीबों को ठंड से बचाने के नाम पर करोड़ों रुपये के कम्बल वितरित करवाती है लेकिन वह हर गरीब को नहीं मिल पाता है क्योंकि एक ग्राम पंचायत व राजस्व ग्राम के हिस्से में पांच से दस कम्बल ही आ पाते हैं। गाँव में रहने वाले अस्सी फीसदी लोग दया के पात्र होते हैं क्योंकि दो हेक्टेयर तक की अनाज की खेती घाटे की होती है और घर में सबके पास रजाई तक उपलब्ध नही हो पाती हैं।यहीं कारण है कि ठंड में सबसे ज्यादा मौतें गाँवों में असहाय बेसहारा और बुजुर्गों की होती हैं। आजकल पक्की ईटों के घर को देखकर गरीबी अमीरी का अनुमान नही लगाया जा सकता है क्योंकि इस जो भीख मांगने वाला है उसका भी घर पक्का होता है।अब मिट्टी के घरों का बनना समाप्त सा हो गया है। सरकार कम्बल ही नही बंटवाती है बल्कि जाड़े से बेवश बेसहारा गरीबों राहगीरों को बचाने के लिये अलाव जलवाती है लेकिन उसका कितना लाभ जाड़े के मौसम मे मिल पाता है उसे सभी जानते हैं। यह अलाव तमाम लोगों के प्राणरक्षक होते हैं लेकिन दुख के साथ कहना पड़ता है कि यह लगातार जल नहीं पाते हैं जबकि ठंडक लगातार पूरे मौसम होती है। इतना ही नहीं सरकार बेवश बेसहारा लोगों को रात्रि निवास करने की सुविधा भी रैनबसेरा के रूप में उपलब्ध कराती हैं।शहरी व नगरीय क्षेत्रों के रैनबसेरा तो किसी हद तक तलाशने पर मिल जाते हैं लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों के चौराहों बाजारों में जल्दी रैन बसेरा नही मिल पाता है। सरकार गाँवों में अलाव नही जलवाती है जबकि ग्राम पंचायत से जुड़े हर मजरों में इस समय कम से कम पांच पांच अलाव यथार्थ रुप में लगातार जलवाने की आवश्यकता है। यह कार्य ग्राम पंचायत फंड से विकास या पंचायत अधिकारियों के जरिये आसानी से कराया जा सकता है क्योंकि ग्रामीण क्षेत्र के गरीब बेवश बुजुर्गों को ठंड से बचाने की नितांत आवश्यकता है। हमने पहले ही कहा था कि जाड़े के प्रकोप से सभी लोगों को बचा पाना सरकार के अकेले दम की बात नही है इसलिए जाड़े व बरसात में समाज के तमाम दानवीर कर्ण इस सहायता महायज्ञ में आहूति देतें हैं। हम ऐसे समाज के दानवीर कर्णो से विनती करते हैं कि वह दिल खोलकर इस जानलेवा मौसम की मार से बचाने के लिए सामने आ जाय भगवान भोलेनाथ उनका कल्याण करेंगे।अब जो लोग इस महायज्ञ में अपनी आहूति डाल चुके हैं हमें उन्हें दिल की गहराइयों से साधुवाद धन्यवाद देते हैं। कहते हैं कि गरीबों में भगवान का वास होता है और गरीबी के कारण वह हमेशा लगातार भगवान की याद किया करते हैं। हमारे तमाम साथी हर साल अपने अपने यहाँ इस पुनीत महायज्ञ में दिल खोलकर आहुति डालकर पुण्य के भागीदार बनते हैं। हम एक बार पुनः गाँव स्तर तक अलाव जलवाने कम्बल वितरण योजना के विस्तारीकरण करने का निवेदन जनहित में सरकार से करते हैं और चाहते हैं कि अपनी सभी योजनाओं जमीनी हकीकत पहले के राजाओं की तरह रात में घूम टहलकर जाने। धन्यवाद।। भूलचूक गलती माफ।। सुप्रभात / वंदेमातरम् / गुडमार्निंग / अदाब / शुभकामनाएं।। ऊँ भूर्भुवः स्वः-------/ ऊँ नमः शिवाय।।।
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           भोलानाथ मिश्र
वरिष्ठ पत्रकार/समाजसेवी
रामसनेहीघाट, बाराबंकी यूपी
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