Monday, January 15, 2018

मकर सक्रांति पर विशेष रिपोर्ट भोला नाथ मिश्रा की कलम से

हमारा देश श्रद्धा आस्था और धार्मिक मान्यताओं से परिपूर्ण पर्वो त्यौहारों का कुंभ है। यहाँ पर पूरे साल पर्व त्यौहार शुभदिन माँगलिक घड़ियां आती रहती हैं। सिर्फ़ साल के कुछ महीने या दिन ही ऐसे होते हैं जिनमें कोई पर्व त्यौहार या मांगलिक घड़ियां नहीं आती हैं और ठंडक से सारे धर्म कर्म क्षीण होकर मनुष्य को बेवश निढाल हो जाता हैं।हमारे यहाँ कहावत चरितार्थ थी कि -"आधे माघे कम्बल कांधे" यानी माघ महीने का एक पखवाड़ा बीतते ही जाड़े का सबाब चला जाता है और कम्बल से काम चलाया जा सकता है।इसी माघ महीनें में ठंढक के मध्य मकर सक्रांति का पर्व आता है जो मनुष्य के ठंडे पड़े खून और गतिविधियों में संचार और दान पुण्य के साथ बसंत आगमन योग्य बनाकर दानी बना देता है।इस वर्ष भी सन् ईश्वी वाले कलेंडरों एवं पंचाग में मतभेद है क्योंकि हम अपने पंचांग और उदया तिथि को महत्व देते हैं इसलिए हम अपने पर्व त्यौहार माँगलिक कार्य तिथि घड़ी नछत्र के आधार पर मनाते हैं। आज सूर्योदय मंकर संक्रांति की शुभ घड़ी में हो रहा है इसलिए अधिकांश स्थानों पर खिचड़ी का पर्व दान दक्षिणा पूजा पाठ और श्रद्धा आस्था से मनाया जा रहा है।
        आज हम सबसे पहले अपने सभी हजारों लाखों पाठकों अग्रजों शुभचिंतकों को मकर संक्रांति की पावन मंगलमयी बेला पर दिल की गहराइयों से शुभकामनाएं देते हुए सूर्य और उनके पुत्र शनिदेव से आप सभी के कल्याण एवं मंगल भविष्य की कामना कर मन की भावनाओं से उनके चरणों में भावना रुपी काला तिल समर्पित करते हैं।साथियों, मकर संक्रांति के साथ ही महीनों से व्याप्त शीतपूर्ण वातावरण में गर्माहट आने की शुरुआत हो जाती है।एक हिसाब से नये मौसम के आने की शुरुआत होती है इसलिये खानपान में बदलाव की शुरुआत हो जाती है। मंकर संक्रांति की पानव वेला के साथ स्नान पूजा पाठ दान पुण्य का महाकुंभ शुरू होता है जिससे मनुष्य का जीवन धन्य हो जाता है। वैसे मकर संक्रांति पर्व मनाने के पीछे एक नहीं बल्कि अनेकों मान्यताएं है किन्तु हिन्दू मान्यताओं के अनुसार इसके छः मुख्य धार्मिक कारण हैं जिसकी वजह से हमारे देश में मकर संक्रंति अलग अलग राज्यों में अलग पर्वो त्यौहारों के रुप में शारीरक मानसिक आध्यात्मिक जागृति के रुप में धूमधाम और धार्मिक आस्था विश्वास के साथ मनाई जा रही है।हिन्दू दर्शन की मान्यता है कि आज ही के दिन जगत जननी माँ दुर्गा ने महिषासुर को मारने के लिए धरती पर अवतरित हुई थी और आज ही राजा भागीरथ अपने श्रापित पूर्वजों की आत्मा को शांति प्रदान करने के लिए माँ गँगा को लेकर धरती पर आये थे और उनका तर्पण किया था।मकर संक्रांति की वेला पर भगवान विष्णु मधु कैटभ को मारकर मधुसूदन बने थे।आज ही सूर्य भगवान का मकर राशि में प्रवेश करके उत्तरायण अवसर लाते हैं जिसे बहुत शुभ समय माना जाता है।मकर संक्रंति की वेला पर ही भगवान सूर्यदेव अपने पुत्र शनिदेव के घर में प्रवेश करते हैं।इसलिए इस पुनीत वेला को पिता पुत्र के मिलन और सम्बंधों के महत्व के रुप में यादगार के तौर पर मनाया जाता है।मकर संक्रांति की ही वेला पर ही महाभारत के भीष्म पितामह ने शरशैय्या पर अंतिम साँस ली थी जबकि उन्हें इच्छा मृत्यु का वरदान प्राप्त था।इस अवसर पर हमारे लाखों लोग गंगा स्नान का तो लाखों लोग अन्य नदियों पर स्नान लाभ ले चुकें होगें और लाखों स्नान करके दान पुण्य का लाभ अर्जित करेंगें। आज खिचड़ी के साथ तिल व गुड़ का विशेष महत्व है इसलिए इन्हीं चीजों का दान एवं उपयोग दोनों का अपना अलग अलग क्षेत्रों में अलग अलग महत्व होता है।ठंढ के मौसम में लोग कड़ाके की सर्दी से निढाल निर्जीव निष्क्रिय तथा पूजा पाठ से दूर हो जाते हैं और जब यह लोग मकर संक्रंति के नाम पर सुबह चार बजे घर नदियों विशेष रूप से गंगा और  गंगासागर में स्नान करते है तो शरीर में महीनों बाद एक नयी स्फूर्ति एवं चेहरे पर चमक आ जाती है। इस पावन वेला पर अधिकांश साधु संत महात्मा और कुछ घर गृहस्थ सभी पूरे महीने घर आश्रम  छोड़कर गंगा के किनारे कुटिया बनाकर कल्पवास करके जीवन को धन्य बनाते हैं। आज के सुप्रभात सम्पादकीय के साथ उर्दू मूंग की खिचड़ी नीबू और देशी घी की खुशबू  दान और खानपान के शुभ हो और मंगल कल्याणकारी हो। धन्यवाद।।
          भोलानाथ मिश्र
वरिष्ठ पत्रकार/समाजसेवी
रामसनेहीघाट,बाराबंकी यूपी

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