Monday, January 8, 2018

कछुआ संवर्धन अभियान और उनकी तश्करी पर विशेष रिपोर्ट-भोला नाथ मिश्रा की कलम से

यह मनुष्य भी अजीबोगरीब प्राणी होता जा रहा है।आधुनिक शिक्षा एवँ परिवेश ने मनुष्य को इंसान से शैतान बना दिया है। मनुष्य जिंदा और जवान स्वस्थ बने रहने के लिये भगवान को भी बलि चढ़ा सकता है।कुछ मनुष्य इस समय अपने निहित स्वार्थ के लिए जीव जंतुओं पशु पक्षियों  का वध ही नही कर सकते हैं बल्कि उनका जूस निकालकर पीने से गुरेज नहीं करता है।हमारे देश में दुर्लभ प्रजाति के जीव जंतु पशु पक्षियों की कुछ विशेषताएं हैं और उनका शरीर अनेकों बीमारियों की अचूक दवा है इसलिए जबसे इनके मारने पकड़ने पर प्रतिबंध लग गया है तबसे इनकी तस्करी शुरू हो गयी है। कुछ लोग इन जीव जंतुओं पशु पक्षियों का इस्तेमाल दवा के साथ साथ जुबान यानी खाने के रुप में करते हैं।इस देश में जब लोग गाय को मारकर खा सकते हैं तो उनके लिए अन्य जीव जंतु पशु पक्षियों को खाना कोई खास बात नही है। स्थिति यहाँ तक पहुंच गई है कि इंसान इंसान को ही खाने लगा है।फलस्वरूप जीव जंतुओं और पशु पक्षियों की कई प्रजातियां हमारे बीच से विलुप्त होती जा रही हैं।अब जल्दी बरसात के दिनों पहले की तरह पीले रंग के मेढ़कों की फौज और उनकी टिर्र - पो नहीं सुनाई देती है। जीव जंतुओं मे एक प्रजाति कछुआ होती है जिसकी अपनी एक अलग भूमिका होती है और भगवान का कच्छप अवतार भी हो चुका है। इधर कुछ सालों से कछुओं पर आफत आयी है और उनकी तलाश गाँव गाँव हर गली गली नालियों नाबदानो नदियों नाला तालाबों में की जा रही है। जो जहाँ मिल पा जाता है चुपचाप उसे पकड़कर बोरे में भरकर तस्कर रफ्फूचक्कर हो जाते हैं। इन बेचारे कछुओं में मौजूद कुछ विशेषताएं इनकी बरबादी का सबब बनती जा रही हैं और दुनिया इनकी जान की भूखी हो गयी है।इनकी तस्करी की जाती है क्योंकि सरकार ने इनके पकड़ने पर प्रतिबंध लगा रखा है।लोग इन कछुओं को विभिन्न क्षेत्रों में विभिन्न तरह से इन्हें मारकर इनका इस्तेमाल करते हैं। यदाकदा जब कभी पुलिस पकड़कर लिखापढ़ी में ले लेती हैं तो तस्करी का भंडाफोड़ हो जाता है अन्यथा कछुओं की पकड़ और तस्करी बेखौफ़ चलती रहती है। लोग कछुए का इस्तेमाल अय्याशी के लिये सेक्स पावर बढ़ाने में करने लगें हैं। कछुआ प्रायः सितम्बर माह में बच्चे देता है और एक बार में पन्द्रह से बीस अंडे देता है और इसकी आयु मनुष्य से दोगुनी होती है। सबसे दुखद और क्रूरतम यह है कि इन्हें मारने के लिए इन्हें खौलते गर्म पानी में डाला जाता है। मनुष्य की.महत्वाकांक्षा कछुआ प्रजाति के प्राणी पतन का कारण बनती जा रही है और कछुआ प्रजाति लुप्त होने के कगार पर पहुंच गई है। कुछ महानगरों और राज्यों में कछुए का गोश्त बहुत महंगा बिकता है और लोग ताकत बढ़ाने के लिए इसका इस्तेमाल करते हैं। तस्कर इनकी तस्करी करके वहाँ तक पहुंचाते हैं और मनमानी रकम कमाते हैं। एक तरफ तो सरकार विलुप्त हो रहे कछुओं की संख्या बढा़ने के लिये हजारों लाखों कछुओं को विभिन्न नदियों आदि में डलवा रही है दूसरी तरफ तस्कर इन्हें नेस्तनाबूद करने पर आमादा है।तस्करी के मामले में पूर्वी उत्तर प्रदेश सबसे आगे है और वहाँ से उन्हें कलकत्ता आदि पहुंचाना आसान रहता है। कछुए की पन्द्रह प्रजातियां होती हैं जिनमें से ग्यारह को दुर्लभ प्रजाति माना जाता है। एक समय था कि कछुए नदियों तालाबों की स्वच्छता बनाये रखते थे लेकिन जबसे इनकी तस्करी शुरू हो गई है तबह नदियां तालाब सब प्रदूषित होने लगे हैं। सरकार इस दिशा में अभियान तो चला रही है लेकिन इनकी तस्करी नहीं रोक पा रही है।तस्करी और इनकी पकड़ अंधे के रस्सी बंटने और पड़वा के खाने जैसी मिसाल को चरितार्थ करता है। धन्यवाद।। भूलचूक गलती माफ।। सुप्रभात / वंदेमातरम् / गुडमार्निंग / अदाब / शुभकामनाएं।। ऊँ भूर्भुवः स्वः ------/ ऊँ नमः शिवाय।।।

         भोलानाथ मिश्र
वरिष्ठ पत्रकार/समाजसेवी
रामसनेहीघाट, बाराबंकी यूपी

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