Friday, January 12, 2018

परबाबा जमाने की है ये नहरे लेकिन

किसानों को खेती करने के लिए सरकार की तरफ से खाद बीज पानी और तैयार फसल की बिक्री की सुविधा तक उपलब्ध करायी जाती है।आज के बदलते दौर में किसानों ने सिंचाई की कितनी भी व्यवस्था भले ही क्यों न कर ली हो लेकिन आज भी नहरों की प्रांसगिकता बनी हुयी है। एक समय था जबकि फसल की बुआई सिंचाई करऩे के समय नहरों में पानी आ जाता था और कुलाबे से जुड़े किसानों को खेती के अनुपात में पानी लगाने का समय निश्चित होता था जिसे देहात में लोग ओसराबंदी भी कहते थे। नहरों की सफाई सरकार करवाती थी और कुलाबे की मुख्य जलनिकासी नाली की सफाई उससे जुड़े किसान करते थे। यह बात अलग है कि उस समय इक्का दुक्का लोगों के पास डीजल पम्पिंग सेट या बिजली चलित नलकूप थे।नलकूप वाले भी नहर के पानी का इस्तेमाल करते थे। आज सिंचाई के संसाधनों में व्यापक वृद्धि हुई है फिर भी आज भी तीस से चालीस फीसदी किसान नहरों के सहारे खेती करता है और जब नहर धोखा दे देती है तो भुखमरी के कगार पर खड़ा हो जाता है।नहरें बाबा परबाबा के जमाने की बनी हुयी हैं कुशल यह है कि कुछ मुख्य नहरों की पटरियों को पक्के डामरयुक्त या सीसी मार्ग बनाकर पटरियों को मजबूत बना दिया गया है लेकिन जिन नहरों की पटरियों पर रोड नहीं बनी हैं वह भगवान के सहारे लावारिस पड़ी रहती हैं और कभी मौके पर कोई उन्हें जल्दी देखने तक नहीं जाता है।नहरों के संरक्षण एवं सफाई के नाम सरकार भले ही करोडों खर्च कर रही हो लेकिन अबतक सफाई खुदाई के नाम पर सिर्फ खानापूर्ति ही होती रही है। माइनरों के आखिरी अंतिम टेल के किसान हमेशा दुखी रहते हैं क्योंकि जब कम पानी आता है तो उनके यहाँ तक पहुंचता ही नही है लेकिन जब आशा के विपरीत असमय में पहुंच भी जाता है तो नहरों की पटरियों को तोड़कर किसानों की बरबादी का सबब बनने लगता है।नहरों के अंतिम टेल के किसान बिन माँ बाप जैसे लगते हैं।  सरकार या विभाग दोनों ऐसे लगते हैं जिन्हें शायद खेती किसानी के बारे में जैसे कोई जानकारी ही नहीं है। ऐसा नही होता तो रबी की फसल के लिये नवम्बर दिसम्बर महीने में सफाई न कराकर अक्टूबर में ही सफाई खुदाई करवाकर नवम्बर मे पलेवा करने के लिये पानी छोड़ दिया गया होता। कभी नहरों की मरम्मत नहीं करवाई जाती है और न समय पर पानी ही छोड़ा जाता है। नहरें जहाँ से टूटती या कटती है उसी जगह मरम्मत करके कर्तव्यों की इतिश्री कर ली जाती है। हर साल माइनरों अल्पिकाओं के टूटने से होने वाली बरबादी पर रोक लगाने के लिये वर्षों से डैमेज नहरों और उसकी पटरियों की देखभाल व संरक्षण जरूरी है। नहर विभाग और सरकार को सोचना चाहिए कि किसानों का बड़ा गरीब मध्यम वर्गीय वर्ग नहरों के सहारे खेतीे किसानी करता है और समय पर पानी न आने और नहरों की मरम्मत न होने से हो रही उसकी तबाही से रोकना उसका दायित्व बनता है।नहरें किसानों की खुशहाली के लिए होती हैं बरबादी के लिये नहीं होती हैं। धन्यवाद।। भूलचूक गलती माफ।। सुप्रभात / वंदेमातरम् / गुडमार्निंग / अदाब /नमस्कार /शुभकामनाएं।। ऊँ भूर्भुवः स्वः-------/ऊँ नमः शिवाय।।।

          भोलानाथ मिश्र
वरिष्ठ पत्रकार/समाजसेवी
रामसनेहीघाट, बाराबंकी यूपी

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