Friday, January 19, 2018

कन्यादान महादान और मुख्यमंत्री कन्या विवाह योजना

                  सम्पादकीय
समाज में कन्याओं को देवी स्वरुपा माना जाता है और उन्हें साक्षात जगत जननी दुर्गा के स्वरूप मानकर उनकी पूजा की जाती है।जिस तरह पुत्र को रत्न कहा जाता है उसी तरह पुत्री को भी रत्न माना गया है और जिस व्यक्ति के कन्या रुपी रत्न नही होता है उसे समाज में हेय दृष्टि से देखा जाता है।कहते कि कन्या का पैर धोकर उनकी पूजा करने का अवसर सभी चाहते हैं और मानते हैं कि बिना कन्या के पैर की पूजा करके जीवन को धन्य नहीं बनाया जा सकता है।इसीलिए कन्या दान को सभी दानों से ऊँचा स्थान दिया गया है क्योंकि कन्या दान और वर की पैर पूजा के साथ ही अहंकार का भाव समाप्त हो जाता है।कन्या रुपी रत्न मनुष्य जीवन का सौभाग्य माना गया है और कन्या दान करने वाला सौभाग्यशाली माना गया है। कन्यादान का अवसर न मिलना मनुष्य जीवन का दुर्भाग्य होता है इसीलिए लोग पराई कन्याओं का कन्या दान करते हैं। कन्यादान का महत्व इसलिए भी अधिक होता है क्योंकि कन्या को छोड़कर अन्य सभी दान निर्जीव की श्रेणी में आते हैं।अपने कोख से पैदा और पाल पोषकर दूसरे घर अपने लख्ते जिगर को भेज देना आसान नहीं होता है शायद इसीलिए दानवीर बनने के लिये लोगों को गम में भी खुशी नजर आती है। हमारे यहाँ पर हमेशा से साधन सम्पन्न समाज के लोग गरीब कन्याओं का कन्यादान कराते रहें हैं और इसमें विभिन्न संस्थाओं की महत्वपूर्ण भूमिका होती है।इधर सामूहिक विवाह का प्रचलन बढ़ गया है और जगह जगह लोग सामूहिक विवाह का दौर शुरु हो गया है।लोग मजबूरी में न चाहते हुए भी इन सामूहिक विवाह समारोहों में शामिल होकर अपनी लाडली कन्या का दान करते हैं।वैसे कहावत है कि मजबूरी का नाम महात्मा गांधी होता है वरना् गरीब से गरीब व्यक्ति भी चाहता है कि उसकी बिटिया रानी की बारात उनके दरवाजे पर आये और वह अपने दरवाजे पर नाते रिश्तेदार समाज के सामने अपनी कन्या का दान करें।कोई भी समाज को अपनी गरीबीं नही दिखाना चाहता है और सभी चाहते हैं कि उनकी बिटिया की शादी अच्छे घराने में हो जाय। इसीलिये लोग कन्या दान करने के लिये अपना घर खेत जेवर आदि तक बेंच डालते हैं और कर्जदार हो जाते हैं।इधर दहेज की परम्परा ने कन्यादान जैसे पवित्र सभी को नसीब न होने वाले शुभ अवसर को कलंकित कर दिया है।जबसे दहेज प्रथा शुरू हुयी है तबसे कन्याएँ सौभाग्य से दुर्भाग्य में बदल गयी हैं और लोग पैदा होने से पहले कोख में ही कन्या का वध कराने लगे हैं। समाज में कन्याओं की जन्मदर लड़को सेघट गयी है और कन्यादान करना सभी के लिये आसान नहीं रह गया है। हमारे यहाँ पर सामूहिक विवाह को उतना महत्व नहीं दिया गया है बल्कि घर की बेदी को महत्व दिया गया है। इसीलिए पहले राजा महराजा सम्मानित सम्पन्न समाज के दानवीर कर्ण सामूहिक विवाह नहीं बल्कि मदद देकर कन्याओं की शादी उनके घर पर ही सम्पन्न करवाते थे।इज्ज्त एक ऐसी चींज है जो कि हर गरीब अमीर के पास होती है इसीलिए हमारे यहाँ गुप्तदान देने की परम्परा रही है। कन्यादान जैसे महायज्ञ में हमारी सरकार भी किसी से पीछे नहीं रहती है और गरीब मध्यम वर्गीय परिवार की कन्याओं की शादी के लिए अरसे से अनुदान दे रही है। अबतक स्वीकृत अनुदान राशि नकद बैंक खाते के माध्यम से मिल जाती थी और आदमी चुपके से निकालकर शान से विवाह कर देता था। जल्दी किसी को पता ही नही चल पाता था कि शादी में सरकारी अनुदान लिया गया है या नही लिया गया है।योगीजी की सरकार ने सरकारी शादी अनुदान योजना में बदलाव कर दिया है और इस योजना में लाभार्थी को नकद धन नही बल्कि उसकी जगह सरकार खुद सामूहिक विवाह समारोहों का आयोजन करेगी। यह आयोजन ब्लाक स्तर पर कराये जायेगें और इसमें सिर्फ उसी विकास खंड की कन्याओं को शामिल किया जायेगा।योगी बाबा की सरकारी शादी अनुदान योजना एक बहुत ही महत्वाकांक्षी योजना है लेकिन इसमें हर व्यक्ति शामिल होना पसंद नहीं करेगा।वैसे सरकार की हर योजनाएं उसकी भावी राजनीति से जुड़ी होती हैं।हर सरकार अपनी योजनाओं को समाज में समारोह पूर्वक लागू करके उसका लाभ लेना चाहती है। सरकार की इस योजना का लाभ समाज के बीस से तीस फीसदी लोगों को मिलेगा लेकिन लाभ पाने वालों में अधिकांश विभिन्न राजनैतिक दलों से जुड़े लोग होगें जो लाभ पाने के बाद भी विचारधारा नहीं बदलेंगे। अबतक सरकार गरीबों को शादी के लिए आर्थिक मदद देती थी लेकिन सामूहिक प्रदर्शन नही होता था।योगीजी की सामूहिक विवाह योजना का शुभारंभ हो गया है और कुछ ही समय बाद इसके परिणाम सामने आने लगेंगे।वैसे सरकार की प्रस्तावित मुख्यमंत्री सामूहिक विवाह योजना भविष्य के लिए एक मिशाल और भ्रांतियों व मिथ्यकों को तोड़ने वाली साबित हो सकती है
          भोलानाथ मिश्र
वरिष्ठ पत्रकार/समाजसेवी
रामसनेहीघाट, बाराबंकी यूपी

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