Sunday, March 11, 2018

इच्छामृत्यु के फैसले पर भोला नाथ मिश्रा की कलम से विशेष

जिंदगी सबको प्यारी होती है और जल्दी कोई मरना नहीं चाहता है।मनुष्य अपनी जिंदगी बचाने के नाम पर अपना सबकुछ दाँव पर लगा देता है और जहाँ तक वश चलता जिंदगी को बचाने के उपाय किये जाते हैं।मनुष्य दुनिया में किसी से अगर घबड़ाता है तो सिर्फ मौत से घबड़ाता है जबकि मौत एक कड़ुआ सच है जिससे कोई आजतक बच नहीं सका है।यहीं कारण है कि हमारे देश में खुद अपनी मर्जी से जान देना या आत्महत्या करके मौत को गले लगाना अपराध माना जाता है और किसी को खुद मरने की इजाजत नहीं दी जाती है।आत्महत्या भी दो तरह की होती है एक में मनुष्य गुस्साकर जहर खाकर, फाँसी लगाकर या फिर पानी में छलांग लगाकर जान दे देता है जबकि दूसरी स्थिति में मनुष्य असाध्य रोगों से ग्रस्त हो जाता है और अपार कष्ट उठाता है।एक स्थिति ऐसी आ जाती है कि जबकि मनुष्य जिंदगी से तंग आ जाता है और खुद मरने की इच्छा व्यक्त करने लगता है।हमारे देश में किसी भी दशा में जिंदगी खत्म करने का अधिकार नहीं है और ऐसा करना अपराधिककृत्य माना जाता है जबकि नीदरलैंड,बेल्जियम,स्विटजरलैंड, हालेंड, जैसे तमाम देशों यहाँ तक कि अमेरिका के कुछ राज्यों में मनुष्य को अपनी मर्जी से मरने का अधिकार है।लगभग ढाई दशक पहले माकपा नेता टीबी रणदवे कैंसर की असहनीय पीड़ा से बम्बई के एक अस्पताल में जूझ रहे थे और जिंदगी से बेहतर मौत मानकर अदालत से मरने की अनुमति माँग रहे थे लेकिन उन्हें मरने की इजाजत नहीं दी गयी थी।इसी तरह 2014 में बम्बई की एक बलात्कार पीड़िता नर्स ने और 2004 में हैदराबाद के एक पूर्व खिलाड़ी वेंकटेश ने भी इच्छामृत्यु की मांग अदालत से की थी लेकिन किसी को भी मरने की अनुमति नहीं दी गयी थी।इस सम्बंध में सुप्रीम कोर्ट द्वारा दो दिन पहले दिये गये अभूतपूर्व ऐतिहासिक महत्वपूर्ण फैसले में पहली बार पहली बार इच्छामृत्यु का अधिकार दे दिया है और उसके लिए विशेष दिशा निर्देश भी जारी किये गये हैं।सुप्रीम कोर्ट ने मरने के दो तरीकों में से एक तरीकें से मरने का अधिकार दिया गया है।कुछ लोग लम्बे समय तक वेलटीनेटर पर पड़े रहते हैं ऐसे लोगों को वेटीनेटर से हटाया जा सकता है।जहर की सुई लगवाकर मौत को गले लगाने की अनुमति नहीं दी गयी है।इसके लिए भी वसीयत लिखने की छूट दी गयी है किन्तु यह वसीयत मजिस्ट्रेट के समक्ष स्वस्थ चित्त दशा में ही लिखी जायेगी और उसमें उसे यह भी लिखना होगा कि वह बीमारी की किस स्थिति में दवा इलाज रोककर मृत्यु चाहता है।वसीयत में यह भी लिखना होगा कि कौन सी ऐसी परिस्थितियां हैं जिनकी वजह से वह मौत चाहता है। वसीयत पर दो गवाह एवं मजिस्ट्रेट के हस्ताक्षर होना अनिवार्य है।सर्वोच्च न्यायालय ने वसीयत लिखने वाले को छूट दी है कि वह जब चाहे अपनी वसीयत को रद्द कर सकता है या वापस ले सकता है।न्यायालय ने इच्छामृत्यु का अधिकार उसी स्थिति में दिया गया है जबकि बीमारी लाइलाज हो जाय।इसके लिए मेडिकल बोर्ड बनाया जायेगा जिसके फैसले के विरुद्ध हाईकोर्ट में अपील की जा सकती है। देश की सबसे बड़ी अदालत ने माना है कि सम्मान से जीवन जीने के अधिकार के साथ सम्मान से मरने का अधिकार का भी निहित है।अदालत का यह फैसला मनुष्य के मौलिक अधिकारों की कड़ी में एक मील का पत्थर साबित होगा और उन लोगों को राहत मिलेगी जो लोग मृत्युशैया पर एक लम्बे अरसे तक पड़े रहते हैं और कानून की डर से चाहकर भी मौत को आत्मसात नहीं कर पाते हैं।इस ऐतहासिक फैसले को सुनने वाली मुख्य न्यायाधीश वाली खंड पीठ बधाई और साधुवाद की पात्र है।धन्यवाद।। भूलचूक गलती माफ।। सुप्रभात / वंदेमातरम् / गुडमार्निंग / नमस्कार / अदाब / शुभकामनाएं।। ऊँ भूर्भुवः स्वः --------/ ऊँ नमः शिवाय।।।
         भोलानाथ मिश्र
  वरिष्ठ पत्रकार/ समाजसेवी
रामसनेहीघाट, बाराबंकी यूपी

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