Sunday, March 25, 2018

जनादेश के नाम पर तार तार होती लोकतांत्रिक मर्यादाये-भोला नाथ

राजनैतिक दल और उनके राजनेता ही लोकतांत्रिक प्रणाली के पोषक एवं संरक्षक होते हैं। इन्हीं राजनैतिक दलों के राजनेताओं के सहारे हमारे लोकतंत्र की रक्षा सुरक्षा होती है इसीलिए इन्हें ही लोकतंत्र का रखवाला माना जाता है।रखवाली करने वाला पहरेदार ही अगर चोर हो जाता है तो वह चोरों से रक्षा नहीं कर पाता है और वह खुद चोरों की लाइन में खड़ा हो जाता है।लोकतंत्र में जनादेश का महत्व होता है और उसी के बल पर लोकतांत्रिक प्रणाली का संचालन एवं निष्पादन होता है।आजादी मिलने के बाद से हीे राजनीति और राजनेता हमारी लोकतांत्रिक प्रणाली पर हमला करके उसे कमजोर कर रहे हैं और चुनाव में जनादेश अपने पक्ष में करने के लिए लोकतांत्रिक मूल्यों की बलि दी जा रही है। लोकतांत्रिक प्रणाली में जनादेश के नाम पर चुनाव के समय किस तरह लोकतंत्र का मजाक उड़ाया जाता है इसे सभी जानते हैं।चुनाव चुनाव होता है वह चाहे ग्राम पंचायत क्षेत्र पंचायत जिला पंचायत विधानसभा विधान परिषद लोकसभा या राज्य सभा का हो।सभी चुनाव मतदाता के सहारे होते हैं इसीलिए राजनीति में मतदाता को भगवान भी कहा जाता है और उसी के सहारे लोकतंत्र फलता फूलता एवं स्वस्थ रहता है।जिस तरह राजनेता चुनाव जीतने के बाद अपने स्वार्थ सिद्धि के लिए पाला बदल लेता है उसी तरह मतदाता भी अपना हित अनहित और भविष्य देखकर चुनाव में मतदान के समय अपना मन बदल लेता है। मतदाताओं का मन बदलने के लिए आज के दौर में उसे प्रताड़ित प्रलोभित भ्रमित तक किया जाता है।मतदाता मतदाता होता है चाहे आम नागरिक हो चाहे जनता का चुना हुआ जनप्रतिनिधि हो और अगर ऐसा नहीं होता तो राज्यसभा के चुनाव में जिस तरह का नाटक हुआ है ऐसा नहीं होता।इस तरह का नाटक कोई पहली बार नहीं हुआ है बल्कि कमोवेश हर बार क्रास वोटिंग के रूप में होता है।इस चुनाव में एक वोट पाने के लिए उन्हें भी गले लगा लिया जाता है जो गले की हड्डी बने होते हैं। परसों सम्पन्न हुये राज्यसभा की दस रिक्त सीटों के लिये कुल ग्यारह उम्मीदवार मैदान में थे।यह चुनाव विधायकों के संख्या बल के आधार पर होते हैं और एक सदस्य के लिए सैंतिस विधायक मतदाताओं की आवश्यकता होती है।संख्या बल के आधार पर भाजपा के आठ और सपा के एक सदस्य को स्पष्ट बहुमत से चुना जा सकता है।लेकिन लोकतांत्रिक मर्यादाओं को तार तार करने के भाजपा और बसपा ने अपना अपना उम्मीदवार मैदान में उतार दिया गया था।सपा के शेष और बसपा के विधायकों को मिलाकर बसपा प्रत्याशी को जिताया जा सकता था।इसी तरह भाजपा के अवशेष बचे विधायक मतदाताओं में अगर थोड़े विधायक मतदाता मिल जाते तो वह भी अपना एक उम्मीदवार जिताने में सक्षम हो जाती और अन्ततोगत्वा वहीं हुआ जिसकी आशंका थी।मतदान के दौरान विधायक मतदाताओं का असली स्वरूप और राजनैतिक दलों का लोकतांत्रिक चरित्र सामने आ गया है।इतना ही नहीं दो ऐसे भी हमारे सम्मानीय विधायक मतदाता हैं जिन्हें इतना इतना सिखाने पढ़ाने के बावजूद मतदान करने का सलीका नहीं आया और दो मत गणना के दौरान रद्द कर दिये गये।समझा जाता है कि मत रद्द होने वालों में एक भाजपा और एक बसपा का विधायक है।मतदान के दौरान  जिस तरह कुछ विधायक मतदाताओं ने भूमिका निभाई उसे लोकतांत्रिक मर्यादाओं के हित में कतई नहीं कहा जा सकता है। लोकतंत्र में जनादेश अपने पक्ष में करने के लिये गधे को बाप बनाने वाली कहावत लागू होना लोकतंत्र के भविष्य के लिए उचित नहीं माना जा सकता है। धन्यवाद।। भूलचूक गलती माफ।। सुप्रभात / वंदेमातरम् / गुडमार्निंग / नमस्कार / अदाब / शुभकामनाएं।। ऊँ भूर्भुवः स्वः -------/ ऊँ नमः शिवाय।।
          भोलानाथ मिश्र
वरिष्ठ पत्रकार/ समाजसेवी
रामसनेहीघाट, बाराबंकी यूपी

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