Saturday, April 21, 2018

जनहित याचिका और संवैधानिक अधिकार के दुरुपयोग पर भोला नाथ मिश्रा की रिपोर्ट

  इस देश में हर चींज का दुरपयोग निजी स्वार्थों की पूर्ति के लिए बेझिझक और निःसंकोच करने एक परम्परा जैसे शुरू हो गई है।अबतक लोग अधिकारों एवं कानून का दुरपयोग करते थे किन्तु अब तो न्यायिक व्यवस्था का लोग दुरपयोग करके अपना उल्लू सीधा करने लगे हैं।उच्च न्यायालय एवं सर्वोच्च न्यायालय में इधर जनहित याचिकाओं की आड़ में अपनी राजनैतिक रोटियां सेंकने लगें हैं और न्यायिक प्रक्रिया से जुड़े लोग भी न्यायिक प्रक्रिया की आड़ में राजनेताओं के इशारे पर राजनैतिक खेल खेलने लगे है।कानून की आड़ में पहली बार हमारे देश में हिन्दू उग्रवाद पैदा करके तमाम धार्मिक संत महात्माओं को विभिन्न सम्प्रदायिक घटनाओं का आरोपी बना दिया गया और चोर बदमाशों और आतंंकियों की तरह जेल में करके एक नयी इबारतें लिखने की कोशिश की गई जिसका धीरे धीरे न्यायिक पर्दाफाश होने लगा है। असीमानंद और पांच मक्का मस्जिद विस्फोट कांड के आरोपियों को गत दिनों अदालत से बाइज्जत बरी कर दिया गया है। हिन्दू उग्रवाद एवं आतंकवाद की राजनैतिक महत्वाकांक्षा की पूर्ति के लिए शुरुआत पिछली सरकार के जमाने में हुयी थी।इसी तरह दिसम्बर 14 में हुये सोहराबुद्दीन मुठभेड़ केस की सुनवाई करने वाले सीबीआई के विशेष जज बीएच लोया की मौत नागपुर में एक वैवाहिक कार्यक्रम के दौरान दिल का दौरा पड़ने से हो गयी थी। इस मुकदमे में भाजपा के अध्यक्ष अमित शाह भी आरोपी थे।उनकी मौत के बाद जस्टिक लोया की मौत को लेकर विवाद खड़ा हो गया था और उनकी मौत साजिशन हत्या का रुप दिया जाने लगा था। जनहित के नाम पर मिली संवैधानिक छूट का दुरपयोग करते हुए विशेष जांच की मांग वाली जनहित याचिकाएं दायर करके राजनैतिक लाभ लेने का प्रयास किया गया था जिसका पर्दाफाश दो दिन पहले सर्वोच्च न्यायालय के प्रधान न्यायाधीश की अध्यक्षता में गठित पीठ करते हुए उसे खारिज ही नहीं कर दिया है बल्कि उसे न्यायालय की छबि व विश्वसनीयता को धूमिल करने का प्रयास बताया है।जस्टिक लोया की मौत की विशेष जांच करने वाली याचिका को खारिज करते हुये जिस तरह की तीखी टिप्पणी की गई है उससे स्पष्ट होता है कि जनहित याचिका की मिली संवैधानिक छूट का दुरपयोग किस तरह होता है। जनहित याचिका के नाम पर इस समय अदालतों को उलझाया जा रहा है फलस्वरूप उच्च न्यायालय एवं सुप्रीम कोर्ट में मुकदमों के ढेर लगते जा रहे हैं। जस्टिक लोया की मौत से जुड़ी याचिका पर फैसला सुनाते हुए पीठ ने कहा कि जस्टिक लोया की मौत स्वाभाविक कारणों से हुयी थी और याचिकाएं राजनैतिक लाभ व शत्रुता को जनहित का मुखौटा लगाकर दायर की गई हैं।इन याचिकाकर्ता का उद्देश्य न्यायिक अधिकारियों और महाराष्ट्र की बाँम्बे उच्च न्यायालय के जजों को बदनाम करने तथा न्यायपालिका की छबि धूमिल करने मात्र था। सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले को लेकर राजनैतिक क्षेत्रों में चर्चाएं तेज हो गयी हैं और हमेशा की तरह अदालत की प्रंशसा और निंदा दोनों होने लगी हैं।जो सरकार सत्ता में रहती है उस पर हमेशा विपक्ष न्यायालय के दुरपयोग करने का आरोप लगाता है। अदालत फैसला जिसके विपक्ष में होता है उसकी स्थिति खिसियानी बिल्ली जैसी हो जाती है और वह खीजकर न्यायपालिका की कार्यशैली और विश्वसनीयता पर ऊँगली उठाने लगता है।
         भोलानाथ मिश्र
वरिष्ठ पत्रकार/समाजसेवी
रामसनेहीघाट, बाराबंकी यूपी।

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