Monday, April 16, 2018

इस फैसले से राजनीति हुई हावी-भोला नाथ मिश्रा

प्रधानमंत्री मंत्री देश में रहने वाले सभी वर्गों धर्मो एवं सम्प्रदायों का रहनुमा होता है और उसकी निगाह में सभी देशवासी एक समान होते हैं। प्रधानमंत्री की आवाज को मुल्कवासियों की आवाज मानी जाती है और यह माना जाता है कि वह जो कुछ कहता है वह देश की जन भावनाओं के अनुरूप होता है। देश की आवाज में सभी वर्गों धर्मो सम्प्रदायों की भावना निहित होती है इसीलिए प्रधानमंत्री दूसरे देशों से सामायिक समझौतो पर देश की तरफ से हस्ताक्षर करता है। इधर पिछले कुछ दिनों से एसी एसटी एक्ट को लेकर काफी तनातनी चल रही है और पहली बार देश की सर्वोच्च अदालत को कटघरे में खड़ा कर दिया गया है। अनुसूचित जाति के कुछ लोगों के साथ विपक्ष ने सुप्रीम कोर्ट पर एससी एसटी कानून को शिथिल करने का आरोप लगाया है जबकि सुप्रीम कोर्ट स्पष्ट कर चुका है कि उसने कानून को कमजोर या शिथिल नहीं किया है बल्कि न्यायहित को मजबूती प्रदान की गई है।सभी जानते हैं कि इससे पहले बसपा सरकार में भी इसे शिथिल करके उत्पीड़न की शिकायत की उच्चस्तरीय जांच करने के बाद मुकदमा दर्ज करके गिरफ्तारी करने के आदेश दिये जा चुके हैं।सुप्रीम कोर्ट ने भी कहा है कि पहले  उच्चस्तरीय जांच करने के बाद ही मुकदमा दर्ज करके आरोपी को गिरफ्तार किया जाय।सरकारी नौकरों पर एससी एसटी एक्ट लगाने से पहले जांच और विभागीय अधिकारियों की स्वीकृति लेने की बात कही गई है।उत्पीड़न एक ऐसी चींज है जो जाति धर्म मजहब नही देखती है और हमेशा उत्पीड़न का शिकार गरीब कमजोर होता है। उत्पीड़न वर्ग जाति धर्म विशेष का नहीं बल्कि व्यक्ति का होता है इसलिए उत्पीड़न को वर्ग जाति में समेटना उचित नहीं होता है।यह हमारे देश का दुर्भाग्य है कि यहाँ पर इधर कुछ दशकों से जाति धर्म मजहब के आधार पर राजनीति होने लगी है और जाति धर्म विशेष के वोटों को ध्रुवीकरण करने के लिये उन्हें भड़काया उकसाया और हिंसक आंदोलन के लिए प्रेरित किया जाता है।यह भी इस देश का दुर्भाग्य ही है कि यहाँ पर जाति धर्म की रक्षा के नाम पर निजी सुरक्षा के नाम तरह तरह की सैनाए बनी हुई हैं जो महात्मा गांधी जी के अहिंसक आंदोलन के विपरीत गोली का जबाब गोली से देने लगे हैं जिसके फलस्वरूप हिंसक घटनाओं की भरमार हो गयी है और इसी के सहारे नक्सलवाद को पैर पसारने का अवसर मिल गया है।इधर जातीय संघर्ष एवं हिंसा की घटनाओं में अचानक वृद्धि होती जा रही है और अभी पिछले दिनों सहारनपुर मेरठ आदि स्थानों पर जातीय संघर्ष हो चुका है।जातीय हिंसा एवं खूनी संघर्ष का नंगा नाच अभी पिछले दिनों सुप्रीम कोर्ट के फैसले के विरोध में भारतबंद के नाम पर हो चुका है।इसके बाद देश में एससी राजनीति हावी हो गई है और हर राजनैतिक दल इसका लाभ लेने के लिए सुप्रीम कोर्ट तक को कोसने से बाज नहीं आ रहा है।लगता है कि देश में अनुसूचित जाति के अलावा और किसी अन्य जाति धर्म का मतदाता ही नहीं है।एससी एसटी एक्ट के दुरपयोग का शिकार होने वालों की भी तादाद देश में कम नहीं है बल्कि ज्यादा है।सबसे दुखद पहलू तो यह है कि देश की अन्य गैरदलित जातियों की परवाह किए बगैर एससी वर्ग के कुछ लोगों के दबाव के आगे नतमस्तक होते हुए प्रधानमंत्री ने भी सुप्रीम कोर्ट को कटघरे में खड़ा कर दिया और चंद हिंसक लोगों और विरोधी दलों के दबाव में अदालत से फैसला वापस लेने का फरमान यह कहते हुए दे दिया कि आपके फैसले से देश नाराज हैं।सभी जानते हैं कि देश अकेली जाति अथवा वर्ग से नहीं बल्कि समाज के विभिन्न वर्गों जातियों धर्मो से बनता है।प्रधानमंत्री जी द्वारा सुप्रीम कोर्ट को फैसला वापस लेने का दिया गया संदेश निःसंदेह देश की आवाज नही हो सकता है। साथ ही इस तरह के फैसलों से देश का समाजिक सौहार्द समान संवैधानिक अधिकार प्रभावित हो सकते हैं। यह सही है कि दोषी और निर्दोष साबित करने के लिए ही मुकदमा चलता है लेकिन जानबूझकर निर्दोष को अदालती प्रक्रिया में भेजकर परेशान करना मानवीय हित में नहीं कहा जायेगा।
           भोलानाथ मिश्र
वरिष्ठ पत्रकार/समाजसेवी
रामसनेहीघाट, बाराबंकी

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