Thursday, April 12, 2018

अपने जीवन की पहंचान खोकर भटकता इन्शान

सुप्रभात-सम्पादकीय
कहते हैं कि मानव जीवन पानी के उस बुलबुले के समान होता है जो कब फूटकर मिट जायेगा इसे कोई नही जानता है। वैसे भी कलियुग में मनुष्य की आयु सौ साल मानी गयी है लेकिन सौ साल की उम्र तक हर एक का पहुंच पाना संभव नहीं होता है और बहुत कम लोग होते हैं जो सौ साल तक जीवित रहते हैं। इस सौ साला मानव जीवन के बावजूद मनुष्य अपने आपको अपने बाप को और अपनी औकात को भूल जाता है।लगता है कि जैसे उसे सौ नहीं बल्कि हजारों साल यहाँ पर रहना है और सारा जीवन धन यश कमाने में लगाकर तेली के कोल्हू के बैल जैसा बन जाता है। खाना सोना पेट भरना और मैथुन करना तो पशु पक्षी भी जानते हैं अगर मनुष्य भी अपना सारा जीवन इन्हीं तीन चीजों के परिधि में रह जाता है तो उसमें पशु पक्षी में कोई फर्क नहीं है और मानव जीवन मिलना व्यर्थ हो जाता है। मनुष्य का सारा जीवन हित और अनहित करने में व्यतीत हो जाता है और परहित करके मानव जीवन धन्य करने का उसे मौका ही नहीं मिल पाता है।कहते हैं कि जल्दी जीव को मनुष्य योनि नही मिलती है और जब जीव के पुण्य प्रताप जागृत और ईश्वर की महती कृपा होती है तब मनुष्य जीवन मिलता है।मनुष्य जीवन को मोक्ष का धाम और आत्मा का परमात्मा से मिलन का सुगम साधन बताया गया है।मनुष्य चाहे तो मानव जीवन के माध्यम से वह नर से नारायण और मानव से महामानव एवं देवमानव बन सकता है। इसीलिए मनुष्य को ईश्वर का प्रत्यक्ष स्वरूप भी कहा जाता है और ईश्वर ने मानव शरीर अपनी सुविधा के लिए अपने जैसा बनाया है। कहते हैं कि मनुष्य अबतक अपने दिमाग का मात्र सोलह प्रतिशत ही इस्तेमाल कर पाया है और इतने में ही वह चाँद पर ही नहीं धरती की उत्पत्ति के समय का ट्रायल करने लगा है। परखनली और ट्यूबनली से बच्चे ही नही पैदा करने लगा है बल्कि अणुबम और परमाणु बम बनाने लगा है। जिस समय मनुष्य अपने दिमाग का शतप्रतिशत इस्तेमाल कर लेगा उस दिन वह मनुष्य नहीं बल्कि ईश्वर जैसा पावरफुल ईश्वर के समान हो जायेगा।मनुष्य जीवन परिष्कृत करने के ज्ञान और विवेक की जरूरत होती है और दोनों बाजार में बिकने वाली वस्तु नहीं होती है। देवता और दैत्य दोनों मनुष्य शरीर वाले होते हैं और उनके कर्म उन्हें देवता या दैत्य बनाते हैं।जिस तरह आम के पेड़ की पहचान उसके फल से होती है उसी तरह मनुष्य की पहचान उसकी मनुष्यता से होती है।अगर मनुष्य में मनुष्यता और ईश्वर का खौफ नहीं है तो वह मनुष्य हो ही नहीं सकता है।जीवों में मनुष्य ही एक ऐसा होता है जिसके सारे अंग मोक्ष के माध्यम होते हैं और वह हर अंग से  सुकर्म करके ईश्वर तक पहुंच सकता है।आत्मा का परमात्मा से मिलन ही मनुष्य जीवन का मुख्य लक्ष्य माना गया है और परहित परस्वार्थ उसका गहना कहा गया है। धन्यवाद।।
          भोलानाथ मिश्र
वरिष्ठ पत्रकार/समाजसेवी
रामसनेहीघाट,बाराबंकी यूपी।

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