Tuesday, April 24, 2018

किसानों के गेंहू खरीद में वसूली और मनमानी और शोषण

किसान एक ऐसी कौम है जो सबका पेट एवं जेब भरता है फिर भी उसे ही हर जगह चूसा जाता है। किसान ही एक ऐसा है जिसे जीव जन्तु से लेकर पशु पक्षी अधिकारी कर्मचारी व्यवसायी दलाल और दैवीय आपदा सभी अपनी हवस का शिकार बनाते हैं इसके बावजूद वह जिंदा रहता है।शायद इसीलिए किसान को भगवान कहा जाता है।सरकार किसानों के उत्पादन का उचित मूल्य दिलाने के लिए किसानों के अनाज की सरकारी खरीद करती है और किसानों की सुविधा के लिए जगह जगह खरीद केन्द्र खोलती है।इन सरकारी क्रय केन्द्रों पर भले ही सरकार दावा कर रही हो कि किसानों का भला हो रहा है लेकिन असलियत इससे कोसों दूर है।सरकारी खरीद का अनाज भारतीय खाद्य निगम के गोदामों में एकत्र होता है जिसे केन्द्र सरकार अपने ढंग से खर्च करती है।भारतीय खाद्य निगम का अपना मानक होता है और इसी मानक के नाम पर वह सरकारी क्रय अधिकारियों का शोषण करता है और भ्रष्टाचार को बढ़ावा देकर सरकारी खरीद को कंलकित करके सरकार को बदनाम कर देता है। राज्य सरकार और उसके अधिकारी चाहकर भी भारतीय खाद्य निगम के गोदामों पर होने वाली खुली लूट पर रोक नहीं लगा पाते हैं। जो क्रय अधिकारी इस लूट खसोट का विरोध करते हैं उनके ट्रक को अपलोड न करके खड़ा किये रहते हैं या अनाज को मानक विपरीत बताकर रिजेक्ट कर दिया जाता है।एफसीआई की खाऊँ कमाऊँ नीति की आड़ में सरकारी क्रय केन्द्रों पर किसानों से वसूली की जाती है और किसानों की बगावत से बचने के लिए व्यापारियों को वरीयता दी जाती है।यहीं कारण है कि किसानों को सरकारी तौल के लम्बा इंतजार करना पड़ता है और केन्द्रों पर कई दिन गुजारने पड़ते हैं।इस समय गेहूं की सरकारी खरीद हो रही है और इसके लिए विभिन्न एजेंसियों को लगाया गया है।कुछ मार्केटिंग के केन्द्रों को छोड़कर अन्य केन्द्रों पर किसानों के गेंहूँ की खरीद नहीं बल्कि औपचारिकता पूरी की जा रही है।मार्केटिंग विभाग खरीदे गये अनाज को एफसीआई गोदाम तक पहुंचाने के लिए ठेका दे देता है जबकि कोआपरेटिव सहकारी विभाग के क्रय केन्द्र प्रभारी अपने स्तर से ढुलाई की व्यवस्था करते हैं जो अपेक्षाकृत महंगी पड़ती है।क्रय अधिकारियों की माने तो ढाई हजार रुपये प्रति ट्रक एफसीआई में खर्च देना पड़ता है जिसकी पूर्ति किसानों और व्यापारियों से की जाती है। क्रय केन्द्रों पर किसान और किसान व्यापारियों की पहचान ट्रैक्टर पर लदे उनकी बोरियों एवं बोरों को देखकर की जा सकती है। बड़े व्यापारियों का गेंहूँ उनके गोदाम से ही सीधे ट्रक पर लादकर उनके अपने खास तथाकथित विभिन्न किसानों के नाम बैंक भुगतान कर दिया जाता है।सरकारी क्रय केन्द्रों पर हो रही गेंहूँ की खरीद का अंदाजा परसों मुख्यमंत्री योगीजी के आकस्मिक निरीक्षण से लगाया जा सकता है। मुख्यमंत्री ने परसों शाहजहांपुर और लखीमपुर जिले में हो रही गेंहूँ की सरकारी खरीद की हकीकत देख और सुन चुके हैं।हर जगह किसान परेशान और बेहाल मिला और हर जगह खरीद के बदले खर्चे के नाम पैसा मांगने की शिकायत मिली। सरकारी गेहूँ खरीद की बानगी देखकर मुख्यमंत्री जी तिलमिला उठे जबकि उन्होंने अभी सिर्फ नगरीय क्रय केन्द्रों को देखा है अभी ग्रामीण क्षेत्र नहीं देखा है। सहकारी समितियों एवं कोआपरेटिव से जुड़े अधिकांश केन्द्रों पर तौल नही हो रही है। कहीं पर पैसा नहीं है तो कहीं पर बोरा उपलब्ध नहीं हो पा रहे हैं। हर खरीद केन्द्र पर सत्ता पक्ष और किसान यूनियन का बोलबाला है और जो किसान इन दोनों से नहीं जुड़ा है उसका शोषण हो रहा है। मुख्यमंत्री जी का औचक निरीक्षण किसानों को राहत और बेखौफ क्रय अधिकारियों में खौफ पैदा करने वाला है लेकिन कहते हैं कि जिस तरह भारत की असली तस्वीर गाँव और ग्रामीण क्षेत्रों में देखी जा सकती है उसी तरह सरकारी गेंहू खरीद की हकीकत सूदूर अंचलों के क्रय केन्द्रों पर देखी जा सकती है। मुख्यमंत्री जी की पहल स्वागत योग्य है लेकिन इसका विस्तार ग्रामीण क्षेत्रों तक होना चाहिए ताकि असली किसान भगवान का भी कुछ कल्याण हो जाय। धन्यवाद।।
       .  भोलानाथ मिश्र
वरिष्ठ पत्रकार/ समाजसेवी
रामसनेहीघाट, बाराबंकी यूपी।

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