Monday, April 2, 2018

किन्नरों का सामाजिक शक्तिकरण हमारा उद्देश्य-रुद्राणी फाउंडेशन

अजय शर्मा
नई दिल्ली महानगरों की लाल बत्तियों पर कार के शीशे पर दस्तक देकर भीख मांगने वाले किन्नरों के बीच से कोई संघर्ष करके खेल या  नौकरी में खुद को योग्य साबित करता था तो उसे यह कहकर बाहर का रास्ता दिख दिया जाता है कि ये तो ताली पीटने वाले हैं लेकिन सुप्रीम कोर्ट के इस ऐतिहासिक और साहसिक फैसले के बाद उम्मीद की जानी चाहिए कि अब हमारी विविधता की संस्कृति पहले की तुलना में कहीं और गंभीर और गहरी होगी
बताते चलें कि सुप्रीम कोर्ट ने 15 अप्रैल 2016 को अपने एक ऐतिहासिक फैसले से किन्नर समाज को एक नई पहचान दी है। कोर्ट ने अपने अंतिम निर्णय में कहा कि हर सरकारी दस्तावेज में महिला और पुरुष के साथ-साथ एक कॉलम थर्ड जेंडर या किन्नर का भी हो। केंद्र सरकार, राज्य सरकार और केंद्रशासित प्रदेश किन्नरों के साथ सामाजिक और शैक्षणिक तौर पर पिछड़े हुए वर्ग की तरह उन्हें सारी सुविधाएं मुहैया कराए। शैक्षिक संस्थाओं और नौकरियों में उन्हें अन्य पिछड़ा वर्ग को मिलने वाले आरक्षण का लाभ भी मुहैया कराए। के.एस. राधाकृष्णन और ए.के. सीकरी की खंडपीठ ने अपने फैसले में किन्नरों को सभी न्यायायिक और संवैधानिक अधिकार देने की बात कही है जो देश के आम नागरिकों को प्राप्त हैं। इस फैसले से किन्नर समाज के लोग काफी उत्साहित है क्योंकि अब उन्हें शादी करने, तलाक लेने-देने, बच्चा गोद लेने का अधिकार, उत्तराधिकार, वंशानुगतता सहित केंद्र और राज्यों की ओर से चलाई जाने वाली सभी स्वास्थ्य व कल्याणकारी योजनाओं का लाभ मिल सकेगा। इस खंडपीठ ने अपने फैसले में कहा कि संविधान में वर्णित अनुच्छेद 19 (1) के तहत उन्हें निजता और वैयक्ति स्वतंत्रता के सभी अधिकार हासिल होंगे और केंद्र और राज्यों सरकारों का यह दायित्व होगा कि वे उनके अधिकारों की हरसंभव रक्षा करे।
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र, राज्य और केंद्रशासित प्रदेशों को इस फैसले को अगले छह महीने के भीतर हर हाल में लागू करने को कहा है। इस फैसले पर ‘अस्तित्व’ नाम की एक गैर-सरकारी संस्था की अध्यक्ष और इसी समुदाय से आने वाली लक्ष्मी नारायण त्रिपाठी ने बहुत भावुक होते हुए कहा- ‘मैं जब फैसले से पूर्व कोर्ट में दाखिल हो रही थी तब मुझे बहुत सारी नजरें घूर रही थीं, पर जब मैं इस फैसले के साथ बाहर आई तो मुझे उन घूरती हुई नजरों की रत्ती भर चिंता नहीं थी क्योंकि अब मेरे हाथ में वे तमाम अधिकार हैं जिनका हमें बहुत लंबे वक्त से इंतजार था।’ गौरतलब है कि ‘अस्तित्व’ एलजीबीटी (लेस्बियन-गे, बायसैक्सुअल ऐंड ट्रांसजेंडर कम्युनिटी) समुदाय के लिए 2007 से संघर्षरत है। लक्ष्मी कहती हैं, ‘किन्नरों को अब तक सिर्फ नाचने-गाने वाला समझा जाता था। समाज ने कभी उन्हें बराबरी का दर्जा नहीं दिया लेकिन दस साल की कानूनी लड़ाई के बाद हमें जीत मिली है और सुप्रीम कोर्ट ने किन्नरों को एक नई पहचान दी।’
इसी विषय पर काम करने वाली रुद्राणी फाउंडेशन की अध्यक्ष संगीता त्यागी कहती है कि किन्नरों को वह सभी अधिकार मिलने चाहिए जो एक आम आदमी को भारतीय संविधान देता है कोर्ट का यह फैसला अपने आप में एक ऐतिहासिक फैसला है इससे किन्नरों के सर्वांगीण विकास में सहायता मिलेगी
रुद्राणी फाउंडेशन की उपाध्यक्ष सुमन कौशिक कहती है कोर्ट के इस फैसले के बाद से हमारे अंदर एक नई ऊर्जा है कि हम अच्छे ढंग से इस काम को कर सकते हैं हम पूरी कोशिश कर रहे हैं कि किन्नर समुदाय को उनके अधिकारों को लेकर जागरूक कर सकें और समाज को भी जागरुक कर सकें समाज को यह बताने की पूरी कोशिश की जा रही है यह भी हमारी तरह ही इंसान हैं इनको आप अछूत ना समझें
रुद्राणी फाउंडेशन के राष्ट्रीय महासचिव अजय शर्मा ने कहा किन्नरों का सामाजिक सशक्तिकरण होना अनिवार्य है किन्नरों को सिंपैथी की बजाय प्यार और सम्मान चाहिए यह वह लोग हैं जिन्हें समाज दुत्कार देता है इसके बावजूद यह बिन बुलाए मेहमान की तरह आपकी खुशियों में शामिल होने के लिए चले आते हैं नाचते हैं गाते हैं आपको बधाई देते हैं और दुआएं देकर चले जाते हैं जिसके बदले में यह आपसे कुछ शगुन के रूप में आर्थिक मदद की उम्मीद करते हैं क्योंकि यही उनकी आजीविका का साधन है
रुद्राणी फाउंडेशन किन्नरों की आजीविका के लिए प्रयास कर रहा है और उनको आर्थिक रूप से सशक्त बनाने के लिए आजीविका के लिए शिक्षा मुहैया कराने का प्रयास शुरू कर चुका है. इसी सिलसिले में रुद्राणी फाउंडेशन का प्रतिनिधिमंडल गाजियाबाद के विधायक एवं उत्तर प्रदेश सरकार में राज्य मंत्री अतुल गर्ग से मिला था उन्होंने इस विषय पर अपनी सकारात्मक प्रतिक्रिया दी और कहा कि हम हर संभव सहायता करेंगे. आपका यह प्रयास समाज को एक नई चेतना देने का कार्य कर रहा है इसके लिए आप साधुवाद के पात्र हैं.

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