Monday, April 9, 2018

नेपाल और चीन की बढ़ती नजदीकियां और ओली की यात्रा

नेपाल और भारत भले ही दो अलग अलग देश हो लेकिन शुरू से ही दोनों के दिलों की घड़कने एक जैसी रही हैं। जब नेपाल में राजतंत्र था तब वह भारत को अपने बड़े भाई के रूप में मानता था और भारत अपना बड़प्पन बनाये रखने के लिए हमेशा उसके दुख सुख में साथ रहता था। राजशाही परिवार की सामूहिक मौत क बाद बने नये नरेश ने भी भारत को अपना अग्रज ही माना और कभी सिर नहीं उठाया। राजशाही समाप्त होने के बाद माओवादी नेता प्रचंड ने चीन के इशारे पर पुरानी परिपाटी को बदलने का प्रयास किया था लेकिन उसमें सफलता नहीं मिली थी और उन्हें भी भारत के सामने नतमस्तक होना पड़ा था।चीन एक लम्बे अरसे से नेपाल से नजदीकियां बढ़ाकर हमारा सिरदर्द बढ़ाने के फिराक में लगा हुआ है लेकिन नेपाली शासकों को वह अपने पक्ष में नहीं कर पा रहा है।चीन आजादी मिलने के बाद से ही हमारी संप्रभुता अखंडता के लिये खतरा बना हुआ है और लगातार हमारे सीमा पर हस्तक्षेप एवं धक्का मुक्की कर हमारे दुशमनों को संरक्षण और बढ़ावा दे रहा है।वह हमारे देश को कमजोर करके अपना उल्लू सीधा करने की फिराक में लगा हुआ है और हमारे पड़ोसी मित्र देशों में दखंलदाजी कर रहा है।वह हमारे देश की दूरी समाप्त करने के लिए नेपाल पर गिद्ध दृष्टि लगाये बैठा है। इधर नेपाल के संदिग्ध दृष्टिकोण से लग रहा था कि वह भारत से दूरी और चीन से नजदीकियां बढ़ाना चाहता है क्योंकि वहाँ के प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली ने चीन की वन बेल्ट वन रोड योजना में सहभागिता की घोषणा कर दी थी। प्रधानमंत्री ओली की चीन से हमदर्दी अपनत्व को देखते हुए सदियों पुराने भारत नेपाल सम्बंध बिगड़ने की आशंका बलवती हो गयी थी लेकिन ओली ने अपनी पहली विदेश यात्रा की शुरुआत भारत से करके आशंकाओं पर पानी फेर दिया है।ओली की पहली यात्रा पर आने पर हमारे देश के प्रधानमंत्री ने उनका खैरमकदम भी गर्म जोशी के साथ किया है और इस मिलन से दिल्ली काठमांडू की दूरियां कम हो गयी हैं और निकट भविष्य में दिल्ली से सीधी काठमांडू के लिये रेल सेवा शुरू हो जायेगी।इस संबंध में दोनों देशों के बीच करार हो गया है तथा इसके साथ ही दूसरे करार से नेपाल के जरिये भारतीय नदियों के सहारे समुद्र तक पहुंचने की जल परिवहन सुविधा उपलब्ध हो जायेगी।तीसरा करार कृषि क्षेत्र को लेकर किया गया है और भारत अब नेपाल को कृषि विकास में अपने अनुभवों और नयी तकनीक को साझा करेगा जिसका सीधा लाभ नेपाल को मिलेगा। हमारे और नेपाल के बीच आज से नहीं आदि काल से धनिष्ठ मित्रता ही नहीं बल्कि रोटी बेटी के नजदीकी रिश्ते रहे हैं इसलिए पुरानी रीति नीति को संजोए रखना दोनों देशों के हित में है।चीन हमारे पड़ोसी किसी भी देश का हमदर्द नहीं है बल्कि वह अपनी विस्तारवादी नीति के तहत भारत को कमजोर करने के लिए उसका निरोध की तरह इस्तेमाल करना चाहता है।वह हमारे छोटे छोटे पड़ोसी देशों को कर्ज के बोझ तले दबाकर उन्हें अपना जर खरीद मुरीद बनाना चाहता है। नेपाल को अपने भले बुरे का अहसास है और अहसास नहीं होता तो वहाँ के प्रधानमंत्री परम्परा के तहत सबसे पहली अपनी विदेश यात्रा की शुरुआत भारत से नहीं बल्कि चीन से करते। असलियत तो यह है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था लागू होने के बाद वहाँ का राजनैतिक परिदृश्य बदल गया है और राजनेता चीन की दोस्ती का भय दिखाकर ब्लैकमेल करने लगे हैं।यह सही है कि भारत अपने पड़ोसियों की यथाशक्ति मदद करता है लेकिन यह भी सही है कि पैसे के मामले में भारत उसका मुकाबला नहीं कर सकता है।वह अपनी ताकत के बल वीटो बना हुआ है और अब संविधान संशोधन के बाद वहाँ पर लोकतंत्र की जगह राजतंत्र पनपने के आसार बढ़ गये हैं।
           भोलानाथ मिश्र
वरिष्ठ पत्रकार/समाजसेवी
रामसनेहीघाट, बाराबंकी यूपी।

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