Wednesday, April 18, 2018

जिसने मां बाप की सेवा नही की तो कुछ भी नही किया

मनुष्य जीवन में माता पिता की बहुत महत्वपूर्ण भूमिका होती है और पिता को साक्षात परमपिता परमात्मा का तथा माता को साक्षात जगत जननी आदिमाता का प्रत्यक्ष लघु स्वरूप माना गया है।इसीलिए माता पिता से ऊँचा स्थान गुरु को दिया गया था और उसे ही साक्षात ईश्वर का स्वरूप माना गया है।मनुष्य जीवन में पिता को ब्रह्मा विष्णु महेश और माता को महालक्ष्मी माना जाता है।पिता इन तीनों देवों की भूमिका तो माता महालक्ष्मी का ममत्व भरा जननी का स्वरूप होती है।जो माता पिता अपने बच्चे के साथ यह भूमिकाएं नही निभा पाते हैं वह ईश्वरीय दंड के भागीदार होते हैं।आदिपुरुष मनु सतरूपा के पुत्र चक्रवर्ती महाराजा उत्तानपाद को इसी भूल के चलते अपने पिता एवं देवर्षि का कोपभाजन बनना पड़ा और पिता की भूमिका भगवान विष्णु को और माता का रोल महालक्ष्मी को निभाकर उनके पुत्र भक्त ध्रुव की रक्षा करनी पड़ी।महराजा उत्तानपाद ने ध्रुव को पैदा करके ब्रह्मा जी की भूमिका तो निभाई लेकिन पालनहार विष्णु भगवान की भूमिका निभाने के समय दूसरी शादी कर ली और कामवासना की वशीभूत होकर ध्रुव की माता सुनित की जगह दूसरी पत्नी सुरूचि को महारानी बना दिया था।जिस समय ध्रुव के पालन पोषण का समय आया तो छोटी महरानी के कहने पर गोदी से उतारकर माता के साथ तिरस्कार कर दिया गया था।यह बात अलग है कि पिता की फटकार के उन्हें अपनी भूल का अहसास हुआ।पिता का दिल महराजा दशरथ की तरह होता है जो पुत्रमोह में जान तक न्यौछावर करने के लिये हमेशा तैयार रहता है। माता पिता को वैसे मनुष्य जीवन का प्रथम गुरु भी माना गया है और बच्चे को संसारिक माया मोह आदि का बोध माता पिता ही कराते हैं। माता पिता कर्तव्यों से बंधे होते हैं और जो  अपने कर्तव्यों का निर्वहन नहीं करता है वह माता पिता के नाम पर कलंक और रंगे सिआर की तरह होता है।माता पिता के आचरण खानपान व्यवहार और जीवनशैली का सीधा असर बच्चे पर पड़ता है इसीलिए माता पिता बहुत कुछ त्याग एवं सदा नेक आचरण करने पड़ते है।जिसके माता पिता नहीं होते हैं और संसारिक अनाथ होते हैं उनके पिता भगवान विष्णु और माता महालक्ष्मी होती हैं क्योंकि वह दोनों जगतपिता पालनहार व जगतमाता होते हैं।माता पिता को तिरस्कृत एवं अपमानित करके ईश्वर को प्रसन्न नहीं किया जा सकता है तथा ईश्वर भक्ति के लिये माता पिता की भक्ति आवश्यक होती है।माता पिता ही काशी काबा हज और चारोधाम होते हैं। गौरीनंदन गणेश जी ने माता पिता की ही परिक्रमा करने सारी सृष्टि की परिक्रमा पूरी कर ली थी।पिता के वचन की लाज रखने के लिए ही भगवान राम को भाई लक्ष्मण और सीता जी के साथ राजपाट छोड़कर चौदह वर्षों तक वनवासी जीवन जीकर अपार कष्ट झेलने पड़े।माता पिता को ही साक्षात ब्रह्मा विष्णु महेश मानकर भक्त श्रवण कुमार अपने अंधे माता पिता को अपने कंधे पर बिठाकर भ्रमण कराने निकल पड़े थे।वह विधि का विधान था कि वह अपने माता पिता की यात्रा पूरी कराने से पहले ही राजा दशरथ के बाण से मरना पड़ा था। माता पिता ही मनुष्य जीवन के सबसे अनमोल हीरे मोती होते हैं तथा बच्चे के लिए नो डिपाजिट और फुल पेमेंट वाली बैंक की तरह होते हैं। वह बहुत सौभाग्यशाली होते हैं जिनके माता पिता उनके साथ प्रसन्न चित रहते हैं और जिनके माता पिता साथ रहते हैं वह हमेशा भालाशाह बना रहता है।धन्यवाद।। भूलचूक गलती माफ।। सुप्रभात / वंदेमातरम् / गुडमार्निंग /  नमस्कार / अदाब / शुभकामनाएं।। ऊँ भूर्भुवः स्वः ------/ ऊँ नमः शिवाय।।।

         भोलानाथ मिश्र
वरिष्ठ पत्रकार/समाजसेवी
रामसनेहीघाट, बाराबंकी यूपी।

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