Monday, April 2, 2018

कृषि प्रधान देश मे किसानों की दयनीय हालत जिम्मेदार कौन-रामशरण शर्मा

कृषि प्रधान देश होने के नाते हमारा किसान अब  बहुत सारी चीजों के उत्पादन में दुनिया में सबसे आगे हैं, जैसे आलू टमाटर प्याज और अनेक  प्रकार की सब्जी भाजी इसके अलावा  विभिन्न  फल  जिसमें  केला  अमरूद  आम  नाशपाती  संतरा  चीकू  शहतूत  जामुन  आदि इनमें से ज्यादातर बहुत जल्दी सड़ने-गलने वाली होती हैं।  इनमें से  बहुत सारी खेत, खलिहान, बाग आदि से निकलने के बाद लगभग एक-तिहाई खाद्य उत्पाद मंडी तक आते-आते खराब हो जाते हैं जिससे  पैदा करने वाला किसान  के पास इससे हताश होकर इन्हें पैदा करने की बजाय दूसरी उपज उगाने के अतिरिक्त कोई विकल्प नहीं रहता।  और दूसरा बंपर पैदावार ई की स्थिति में उपज का वास्तविक मूल्य  नहीं मिल पाना उचित भंडारण खाद्य प्रसंस्करण  के साधन  ना होने की वजह से  किसान  उस उत्पाद को सुरक्षित नहीं कर पाता फलस्वरूप उत्पाद की बर्बादी होती है और मूल्य ना मिलने की स्थिति में किसान को घाटा झेलना पड़ता है भंडारण रखरखाव के लिए उचित संसाधन अगर सरकार ध्यान देगी तो ऐसी वस्तुओं को भंडारण कर किसान अग्रिम समय में उचित लाभ का भागी बनेगा
दूसरी कम समय में खराब होने वाली चीजों की बात तो छोड़ो हमारे देश में आलू के पर्याप्त भंडारण के लिए उत्पादन को रखने की 60 परसेंट भी भंडारण क्षमता की जगह नहीं है ऐसी स्थिति में अन्य वस्तुओं का प्रसंस्करण और रखरखाव कैसे संभव है यह सोचने का विषय है
यही कारण है कि हमारे देश में अधिकतर कोल्ड स्टोरेज आलू से भरे पड़े हैं और दूसरी चीजों को रखने के लिए जगह ही नहीं मिलती। परिणाम यह हुआ कि पैकेज्ड वस्तुओं के उत्पादन में पापड़, अचार, बडिय़ां, चिप्स आदि की चलन के अलावा और किसी वस्तु के प्रसंस्करण के संबंध में विचार नहीं हो सकाजबकि अन्य देशों में डिब्बाबंद चीजों का चलन तेजी से पनपने के कारण हमारे देश के उद्यमियों ने भी फूड प्रोसैसिंग को एक लाभदायक व्यापार समझते हुए यूनिटें लगानी शुरू कर दीं। उनके सामने सबसे बड़ी कठिनाई यह थी कि एक प्रोसैसिंग यूनिट लगाने के लिए इतने मंत्रालयों, विभागों में चक्कर लगाने पड़ते हैं कि वे सोचने लगते हैं कि इस व्यापार को करें या नहीं। परिणामस्वरूप यह व्यवसाय बहुत ही धीमी गति से बढ़ा और इस बीच हमारे यहां दूसरे देशों की बनी चीजें घरों में आने लगीं। जो हमारे देश के लिए और ख़ासकर किसानों की हित के लिए अच्छी बात नहीं थी
हमारे देश में जिस उद्योग-व्यापार में तेजी से बढ़ौतरी हो रही है उसमें खाने-पीने की चीजों को डिब्बाबंद रूप में तैयार करने और उचित दाम पर उपभोक्ता तक पहुंचाने को रखा जा सकता है।एक समय था जब परिवारों में खाद्यान्न, फल, सब्जियां, मेवे और मसाले साबुत आया करते थे। घर में या चक्की पर पीसे जाने के बाद उनके व्यंजन तथा अन्य पदार्थ बनते थे। अनुमान है कि लगभग 40 प्रतिशत खाद्य  सामग्री लाने-ले जाने, पकाते समय या इस्तेमाल के बाद बच जाने से नष्ट हो जाती थी। इतनी बड़ी मात्रा को उपयोग में लाने के लिए फूड प्रोसैसिंग का कारोबार शुरू हुआ और यह व्यापार, जो विदेशों में तो पहले से ही फल-फूल रहा था, हमारे यहां भी धीरे-धीरे पांव पसारने लगा।जैसे-जैसे व्यक्ति अपने कामकाज में ज्यादा से ज्यादा व्यस्त होता गया, महिलाएं नौकरी और अन्य व्यवसायों में आने लगीं, खाने-पीने की चीजें पैकेटों में बंद होकर घरों में आने लगीं। युवा वर्ग अर्थात 35 वर्ष तक की आयु के लोगों की जनसंख्या हमारे देश में लगभग 65 प्रतिशत है। यह वह वर्ग है जिसकी आगे बढऩे, जीवन में जल्दी से जल्दी कुछ पा लेने की इच्छा बलवती होती गई। उसके लिए रसोई में खाने-पीने की चीजें तैयार करना वक्त की बर्बादी है। बड़े संभावित व्यापार को चलाने के लिए अभी तक सरकार कोई राष्ट्रीय स्तर पर  फूड प्रोसैसिंग पॉलिसी ही नहीं बना पाई है। यह विडम्बना ही है कि इतने बड़े सैक्टर में युवा वर्ग को शिक्षित, प्रशिक्षित करने के साधन न के बराबर हैं। यही नहीं, फूड प्रोसैसिंग  टैक्नोलॉजी का विकास करने के लिए प्रयोगशालाओं की बहुत कमी है और जो हैं वे अभी अपने शैशवकाल से बाहर ही नहीं निकल पाई हैं। उदाहरण के लिए मैसूर में सरकारी संस्थान सी.एस.आई.आर. की एक प्रयोगशाला सी.एफ.टी. आर.आई. है। 15-20 वर्ष पहले जो टैक्नोलॉजी बनी थी, उसके आगे कोई खास प्रगति नहीं हुई है जबकि दुनियाभर के वैज्ञानिक संस्थान इस दिशा में बहुत आगे बढ़ चुके हैं।  और कृषि प्रगति के मामले में हमारे कोई भी संस्थान शोध के उपरांत तैयार पॉलिसी को अमल में नहीं कर पाए हैं और जब किसी देश की अनुसंधान प्रक्रिया के फलस्वरूप बनने वाली पॉलिसी और और उसका क्या क्रियान्वन नहीं होगा देश के किसान तो क्या अन्य किसी क्षेत्र में भी प्रगति संभव नहीं है इसी हाल से हमारा किसान गुजर रहा है और वह दुनिया के मानचित्र में पिछड़ता जा रहा है जबकि प्राचीन काल से हमारा देश कृषि उन्नत कृषि प्रधान कृषि तकनीक का जनक रहा है अब वह धारणा क्यों हाशिए पर है यह सवाल चिंता का विषय हैसरकार कृषि नीतियां  बजट में बदलाव बजट को बढ़ावा  देने  की  घोषणाएं  और बजट आवंटन तो करती है सरकार की मैगा फूड पार्क, कोल्ड चेन, स्टोरेज और दूसरे संसाधन जुटाने की पहल, उचित क्रियान्वन ना होने की स्थिति में  बेमानी लगती है लेकिन जब तक  उनका संचालन करने के लिए योग्य और कुशल कामगार क्रियान्वन करता नहीं मिलेंगे, ये सब तामझाम बेकार ही रहेंगे। जबकि यह आवश्यक है कि बड़े पैमाने पर कृषि अनुसंधान खाद्य बस्तियों में जल्दी खराब होने वाली किसानों के बाद की रखरखाव के अनुसंधान कृषि उत्पादन भंडारण और प्रसंस्करण को बढ़ावा के लिए अलग से कृषि विश्वविद्यालय के तहत अनुसंधान केंद्र ज्यादा से ज्यादा मात्रा में खोले जाएं सरकारी और गैर-सरकारी संस्थानों, स्कूल-कालेजों में फूड प्रोसैसिंग की पढ़ाई-लिखाई के लिए विशेष पाठ्यक्रम चलाए जाएं। उनमें खाद्य पदार्थों के उत्पादन, उनकी प्रोसैसिंग, पैकेजिंग, बायोटैक्नोलॉजी, भंडारण, वितरण व बिक्री से लेकर प्रोजैक्ट की लागत, प्राॉफिट माॢजन, आयात, निर्यात, इन्फार्मेशन टैक्नोलॉजी तक की बारीकियों को बेहतर तरीके से प्रशिक्षण का बंदोबस्त हो उपरोक्त स्थिति में यह आवश्यक हो जाता है कि मौजूदा कृषि बजट को सरकारें किस स्थिति में, किस तरह से, किस कार्यशैली से ,और किस कार्यशीलता से अनुपालन कर पाती हैं सोचने का विषय है
रामशरण शर्मा

रामशरण शर्मा
पूर्व आर्मी मैन

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