Monday, April 2, 2018

निर्माण कार्य मे अनियमियता पर खाश ख़बर भोला नाथ मिश्रा की खबर

सरकार के अधिकांश निर्माण कार्य ठेकेदारों के माध्यम से निविदा के आधार पर कराये जाते हैं और हर कार्य का कार्यकाल अथवा  आयु सीमा भी तय होती है। यह सही है कि इधर पिछले कुछ दशकों से ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों का सर्वागीण विकास अरबों खरबों खर्च करके कराया गया है लेकिन यह भी सत्य है कि जितना पैसा विकास के नाम पर खर्च हुआ है उससे कायाकल्प ही नहीं बल्कि मिनी स्वर्ग बनाया जा सकता था।अस्सी के दशक में पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने कहा था कि गाँव विकास के लिए भेजी गई धनराशि गाँव पहुंचते पहुंचते मात्र पन्द्रह फीसदी बचती है। उसी तरह निर्माण कार्यों के नाम पर जितना पैसा सरकारी खजाने से निकलता है यदि ईमानदारी के साथ लगा दिया जाय तो वह कार्य लम्बे समय तक मजबूत एँव जनपयोगी रह सकता है।ग्रामीण  क्षेत्रों में  सड़कों का जाल बिछ गया है और लोक निर्माण विभाग मंडी परिषद व जिला परिषद सभी अपने अपने स्तर से डामर और सीसी मार्गों का निर्माण करवा रहें हैं।जहाँ पर कभी किसी ने सोचा भी नहीं था वहाँ पर सड़कें बन गयी हैं और अभी भी निर्माण कार्य पूरी रफ्तार से जारी है।गाँवों में हो रहे विभिन्न निर्माण कार्यों में प्रधान और सचिव तो ब्लाकों में प्रमुख और बीडीओ तथा स्कूलों के निर्माण में शिक्षक ठेकेदार की भूमिका निभाते हैं। ठेकदारी प्रथा के फलस्वरूप नवनिर्मित भवनों में टपका लगने लगता है और डामर सड़कों की गिट्टी तथा सीसी रोडे उखड़ने व टूटने लगती हैं। गाँवों में बन रही डामर और सीसी रोड अक्सर तीसरे चौथे साल ही मरम्मत लायक हो जाती हैं जबकि इन मार्गों पर कोई खास यातायात भी नही रहता है। सरकारी खजाने के करोडों रूपये से बने मार्ग दस साल के अंदर ही उखड़कर गलियारा बन जा रहे हैं। सभी जानते हैं कि निर्माण कार्यों में हर लेबिल पर कमीशन का धंधा चलता है और कमीशन निकालने के बाद आधी धनराशि भी नहीं बचती है। जब दो रुपये लागत का कार्य एक रुपये या बारह आने में होगा तो कल्पना की जा सकता है कि वह कितना गुणवत्तापूर्ण होगा ? कमोवेश यही हाल हर स्तर पर है और आधी से भी कम धनराशि में कार्य कराये जा रहे हैं।चूंकि कमीशनखोरी में शामिल लोग ही कार्य का मूल्यांकन करते हैं इसलिए अब स्टीमेट ही बढ़ाकर बनाया जाने लगा है ताकि जबाबदेही बनी रही है।इसके बावजूद जो भी कार्य  ठेकेदारों अथवा जनप्रतिनिधियों के माध्यम कराये जाते हैं उनमें कमीशनखोरी का बोलबाला रहता है। सरकार इस कमीशनखोरी को समाप्त करने में भले ही जुटी हो लेकिन कमीशनखोरी कम ज्यादा आज भी हो रही है।अभी तीन चार साल पहले बनी सड़कें मरम्मत योग्य हो गयी हैं चाहे मंडी से बनी हो चाहे लोक निर्माण विभाग आदि ने बनवाये हो। इधर दशकों पहले बनी मंडी परिषद व लोक निर्माण विभाग की सड़कों की मरम्मत सरकार द्वारा अभियान चलाकर कराया गया है लेकिन अभियान की भी असलियत दूर दराज जाकर देखी जा सकती है।खास बात तो तह कि जब हल्के फुल्के खर्च पर मरम्मत करने की जरूरत होती तब कोई ध्यान नहीं देता है क्योंकि छोटे हल्के फुल्के कार्य का स्टीमेट नहीं बनता है और बिना बड़े स्टीमेट के मजा नही आता है। कुल मिलाकर चाहे ग्रामीण क्षेत्र हो चाहे शहरी क्षेत्र हो हर जगह हर विभाग में सरकार की तमाम बंदिशों के बावजूद कमीशनखोरी जारी है और सरकारी धनराशि का विकास के नाम पर बंदरबाट हो रहा है। धन्यवाद।। भूलचूक गलती माफ
           भोलानाथ मिश्र
वरिष्ठ पत्रकार/समाजसेवी
रामसनेहीघाट, बाराबंकी यूपी।

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