Sunday, April 22, 2018

जाने क्या होता है महाभियोग जिसके तहत जज को हटाया जा सकता है

भारतीय संसद तीन हिस्सों में बंटी हुई है । लोकसभा, राज्यसभा और राष्ट्रपति । इन तीनों को मिलाकर ही संसद बनती है । ऐसे में चीफ जस्टिस को हटाने के लिए भारतीय संविधान में प्रस्ताव है कि अगर दोनों ही सदनों यानी लोकसभा और राज्यसभा के दोनों सदन अगर दो तिहाई बहुमत से चीफ जस्टिस को हटाने का प्रस्ताव पास कर देते हैं, तो फिर राष्ट्रपति उसे अपनी मंजूरी दे देता है।  राष्ट्रपति की मंजूरी के बाद देश के चीफ जस्टिस को अपने पद से हटना पड़ता है । इस प्रक्रिया को महाभियोग कहा जाता है ।
क्या होती है पूरी प्रक्रिया
भारतीय संविधान में एक धारा है धारा 124,  इस धारा में भारत के जजों की नियुक्ति की पूरी प्रक्रिया है । धारा 124 का भाग 4 कहता है कि अगर कोई शख्स देश का चीफ जस्टिस है, तो उसे सिर्फ संसद ही हटा सकती है ।  इसके लिए संसद में महाभियोग प्रस्ताव लाया जा सकता है ।  अगर किसी चीफ जस्टिस के खिलाफ महाभियोग लाना है, तो लोकसभा के कम से कम 100 सांसद और राज्यसभा के कम से कम 50 सांसद महाभियोग के प्रस्ताव पर हस्ताक्षर करते हैं ।  इसके बाद इस प्रस्ताव को लोकसभा या राज्यसभा में से किसी एक जगह पर पेश किया जाता है । लोकसभा में इस प्रस्ताव को मंजूरी लोकसभा अध्यक्ष और राज्यसभा में राज्यसभा का सभापति मंजूरी देता है ।  लोकसभा अध्यक्ष या फिर राज्यसभा के सभापति के पास ये विशेषाधिकार है कि वो प्रस्ताव को खारिज कर दे या फिर उसे स्वीकार कर ले, अगर प्रस्ताव खारिज हो जाता है तो प्रक्रिया फिर से शुरू करनी पड़ती है । लेकिन अगर लोकसभा या फिर राज्यसभा में प्रस्ताव स्वीकार हो जाता है, तो फिर जजेज (इन्क्वायरी) ऐक्ट) 1968 के तहत मुख्य न्यायाधीश के खिलाफ लगे आरोपों की जांच के लिए एक कमेटी बनती है । इस कमेटी में तीन लोग होते हैं :-
1. इनमें से एक सुप्रीम कोर्ट का जज होता है
2. अलग-अलग राज्यों के हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीशों में एक जज
3. एक कानून का जानकार (वकील, संविधान विशेषज्ञ या रिसर्च स्कॉलर) होता है । कमेटी अगर अपनी जांच में चीफ जस्टिस को दोषी पाती है, तो फिर जिस सदन में ये प्रस्ताव रखा गया होता है, कमेटी अपनी जांच रिपोर्ट उस सदन में रखती है।  सदन उस प्रस्ताव पर अपनी सहमति दे देती है तो फिर इसे दूसरे सदन में भेज दिया जाता है ।  अगर इस प्रस्ताव को दोनों सदन में दो तिहाई बहुमत मिल जाता है, तो इसे राष्ट्रपति के पास भेज दिया जाता है । इसके बाद राष्ट्रपति चीफ जस्टिस को हटाने के लिए मंजूरी दे देते हैं और चीफ जस्टिस को अपने पद से त्यागपत्र देना पड़ता है ।

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