Wednesday, April 25, 2018

राजनीति में संख्याबल का महत्व और राजनीतिक दलों की रणनीति

  राजनीति में संख्या बल का बहुत महत्व होता है और संख्या बल के बल पर ही राजनैतिक दलों को सरकार गठित करने का अवसर मिलता है।राजनीति में संख्या बल पार्टी के चुने हुये जनप्रतिनिधि होते हैं और जिसके पाल बहुमत चला जाता है वहीं माननीय सम्मानीय एवं शासक हो जाता है। लोकतंत्र में प्रचंड बहुमत सरकार एवं शासक को निरंकुश बना देता है क्योंकि भय समाप्त हो जाती है।इसीलिए लोकतांत्रिक व्यवस्था में विपक्ष का मजबूत होना जरूरी होता है। इस समय भाजपा अपने सहयोगी दलों के साथ प्रचंड बहुमत में आकर देश प्रदेश की सरकार को चला रही है इस समय उसका मुकाबला करना सूरज को दिया दिखाने जैसा है। यहीं कारण है कि इस समय कमजोर विपक्ष का हर राजनैतिक वार खाली चला जा रहा है और वह हंसी के पात्र बन जा रहे हैं। इस समय सत्ता और विपक्ष दोनों भावी लोकसभा चुनाव की तैयारी में जुट गये है और दोनों एक दूसरे को नीचा दिखाने में जुट हैं। विपक्ष जरा जरा सी बातों का बतंगड़ बनाकर सुर्खियां बटोरने में जुटा है तो सत्ता दल पलटवार कर विपक्ष के हमले को नाकामियाब करने में लगा है। केन्द्र में विपक्ष की भूमिका निभाने वाली कांग्रेस के अगुवा राहुल गांधी इस समय सहयोगी दलों के साथ विपक्ष की भूमिका निभा रहे हैं लेकिन संख्या बल आड़े आ रहा है।इसके बावजूद वह सत्ता विरोधी मुहिम में हाथपैर धोकर जुटे हुये हैं फिर भी बाँलबाँबाका नही कर पा रहे हैं। न तो विपक्ष सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव ही ला सका है और न ही प्रधान न्यायाधीश के विरुद्ध महाअभियोग ही चला सका। सात विपक्षी दलों के मात्र बासठ सांसदों की संख्या बल के आधार पर राज्यसभा अध्यक्ष को दी गयी महा अभियोग की नोटिस प्रस्ताव को राज्यसभा के सभापति एम वेंकैया नायडू ने विधि विशेषज्ञों की राय लेने के बाद आधार हीन मानते हुए खारिज कर दिया है। सभी जानते हैं कि महाअभियोग का प्रस्ताव लोकसभा और राज्यसभा में संख्याबल के आधार पर ही पास फेल होता है। संख्या बल न होने के बावजूद विपक्ष द्वारा महाअभियोग की नोटिस एकमात्र राजनैतिक स्टंट मानी जा रही है।महाअभियोग लाना कोई बच्चों का खेल नहीं होता है और सम्भवतः यह पहला अवसर है जबकि प्रधान न्यायाधीश के खिलाफ महाअभियोग की नोटिस दी गयी और हमारी न्यायिक व्यवस्था पर राजनैतिक हमले हो रहे हैं।  हमारी न्यायिक व्यवस्था दुनिया में एक अलग पहचान एवं महत्व रखती है और आम लोगों का उस पर अटूट विश्वास है। न्यायिक व्यवस्था में पार्टी या पक्ष विपक्ष का मुंह देखकर नहीं बल्कि न्याय के तराजू पर तौलकर निर्णय दिया जाता है।इधर न्यायालय द्वारा कुछ बहुचर्चित मामलों में दिये गये निर्णयों से विपक्ष बौखला सा गया है और बौखलाहट में न्यायिक प्रक्रिया पर अविश्वास व्यक्त करने लगा है।यह सही है कि जो भी राजनैतिक दल सत्ता में होता है उसका वर्चस्व होता है फिर हमारी न्यायिक संविधान के अनुरूप कार्य करती है और बिना किसी दबाव के फैसले सुनाती है। महाअभियोग की नोटिस को आंख मूंदकर नही बल्कि तथ्यों के आधार पर खारिज की गयी है। नोटिस खारिज करने के आधार का अध्ययन करने के बाद ही कोई ठीक टिप्पणी करना उचित होगा क्योंकि सभापति बिना आधार नोटिस खारिज नहीं कर सकता है। धन्यवाद।। भूलचूक गलती माफ।
           भोलानाथ मिश्र
वरिष्ठ पत्रकार/ समाजसेवी
रामसनेहीघाट, बाराबंकी यूपी

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