Tuesday, April 10, 2018

बदलते मौसम की करवट से किसान तबाह

जिस तरह कुदरत की मार के आगे किसी की भी नही चलती है उसी तरह मौसम भी हर एक को बेवश बेहाल कर देता है। मौसम का असर वैसे खासोआम सबको प्रभावित करता है लेकिन किसानों को तो बेहाल करके बेमौत मरने पर विवश कर देता है।जलवायु परिवर्तन के साथ मौसम भी परिवर्तनशील होता जा रहा है जिसका सीधा असर जनमानस खासतौर पर किसानों पर पड़ता  है। एक समय था जबकि हमारी मान्यताओं के अनुरूप मौसम अपने तय समय पर आता और यत समय पर चला जाता था। आसाढ़ लगते ही बरसात शुरू हो जाती थी तथा कुआर लगते ही बरसात समाप्त हो जाती थी और अगहन लगते ही ठंड दस्तक देने लगती थी और फाल्गुन लगते ही गर्मी की तासीर जाड़े को भगाने लगती थी। जलवायु परिवर्तन के चलते मौसम बेमौसम कब हो जायेगा कोई तय नही होता है। गर्मी के मौसम में बरसात और बरसात के मौसम में गर्मी पड़ने लगी है।इधर जलवायु परिवर्तन से हो रहे मौसम के बमौसम होने का दौर चल रहा है और इस दैवीय प्रकोप का सबसे ज्यादा शिकार अन्नदाता किसान भगवान हो रहा है। किसान की पूँजी लागत और मुनाफा जब एक साथ बेमौसम आपदा में चला जाता है और उसका तथा उसके बच्चों का भविष्य अंधकारपूर्ण हो जाता है। इस जलवायु परिवर्तन से आये आँधी तूफान बरसात ओला वृष्टि से किसान पिछले कई वर्षों लगातार तबाह होकर बरबाद हो रहा है। इस समय आम किसान की पूँजी लागत और मुनाफा सब एक बार फिर खतरे में पड़ गया है क्योंकि मौसम ने ऐसे नाजुक समय में मिजाज बदलना शुरू किया है जबकि किसान की  गेहूँ की फसल बिल्कुल खेत में पकी खड़ी है। हर छोटा बड़ा किसान अपनी गाढ़ी कमाई को समटने में रात दिन जुटा है इसी बीच मौसम बेमौसम हो गया है और अबतक दो बार करवट बदलकर आँधी तूफान और बरसात करके खेत खड़ी या कटी या खलिहान में मड़ाई के लिए लगी फसल को बरबाद कर चुका है।इस दैवीय आपदा के बाद एक बार फिर कटाई मड़ाई में व्यवधान उत्पन्न करके किसानों की धड़कनों को बढ़ा दिया है। मौसम में अचानक शुरू हुये बदलाव से किसानों का भविष्य दाँव पर लग गया है और मौसम ने अगर साथ नहीं दिया तो निश्चित तौर पर किसान पिछले वर्षों की तरह इस बार दैवीय प्रकोप का एक बार शिकार होकर बरबाद हो जायेगा।किसान ही एक ऐसा होता है जिसका भविष्य मौसम के सहारे होता है और जब मौसम मक्कारी कर देता तो वह कर्ज के बोझ तले दबकर मरने पर विवश हो जाता है।मौसम परिवर्तन का असर नौकरी या व्यवसाय करने वालों पर उतना नहीं पड़ता है जितना किसानों पर पड़ता है।
          भोलानाथ मिश्र
वरिष्ठ पत्रकार/समाजसेवी
रामसनेहीघाट, बाराबंकी यूपी।

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