Sunday, May 6, 2018

गांव गरीब की विकासोन्मुखी योजनाओं का बंटाधार

यह सही है कि गाँव देश की असली तस्वीर होता है और शहरों की खुशहाली गाँव की खुशहाली से जुड़ी हुई है।इसीलिए देश की खुशहाली के लिए गाँवों का खुशहाल होना जरूरी होता है। गाँवों खेत खलिहानों की खुशहाली के लिए आजादी के बाद से ही प्रयास किए जा रहे हैं और इसके आशातीत परिणाम भी सामने आये हैं।इसके बावजूद अभी भी गाँव पूरी तरह से खुशहाल नहीं हो सके और लोगों को उनकी मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध नहीं हो पा रही हैं। आजादी के बाद से सरकारें आमलोगों को रोटी कपड़ा और मकान उपलब्ध कराना सरकार का दायित्व होता है।आजादी के इतने दशक बीत जाने के बाद भी गाँव गरीब के चेहरे पर उदासी विद्यमान रहना सरकारों के लिए शर्म की बात है। सरकार हमेशा गाँव गरीब के लिए बहुमुखी योजनाएं चलाती जरूर ह़ै लेकिन वह गाँव गरीब तक पहुंचते पहुचंते भ्रष्टाचार का शिकार हो जाती है।गाँव गरीब के लिए सरकार द्वारा चलाई जा रही योजनाओं के क्रियान्वयन की असली तस्वीर प्रधान प्रमुख जिला पंचायत या अन्य पदो पर आसीन जनप्रतिनिधियों और अधिकारियों कर्मचारियों की आँख से देखकर नही देखी जा सकती है।लेकिन समस्या यह है लोकतांत्रिक व्यवस्था में इन्हीं दोनों के सहारे सरकार और देश चलता है।इसलिए इन दोनों जिम्मेदार लोगों का ईमानदार कर्तव्य परायण राष्ट्र प्रेमी होना जरूरी है जिसमें गिरावट आ गई है। इधर भाजपा ने भी इस दिशा गाँव गरीब के लिए कुछ विशेष अभियान चलाये हैं जो स्वागत योग्य हैं। सरकार उज्जवला गैस , बिजली  प्रधानमंत्री आवास जैसी योजना योजनाओं के साथ सीधे गाँव गरीब तक पहुचंने की मुहिम चला रही है और इन योजनाओं की जमीनी हकीकत जानने के लिए जनप्रतिनिधियों के साथ अपने वरिष्ठ पदाधिकारियों एवं कार्यकर्ताओ का सहयोग ले रही है। गाँव में चल रही योजनाओं की वास्तिवकता देखने के लिए गाँवों में रात्रि प्रवास करके चौपालों के आयोजन किये जा रहे हैं। अपनी महत्वाकांक्षी योजनाओं को मूर्ति देने के लिए सरकार की सोच सराहनीय पहल है। गाँवों में रात्रि प्रवास और चौपाल लगाने से बेहतर है कि बिना प्रधान सचिव को साथ लिये लाभार्थी से सीधे संवाद करके हकीकत जानने की कोशिश की जाय। यह सही है कि सरकार के लाख बंदिशों के बावजूद आवास के नाम पर पैसा लिये गये हैं लेकिन चाहे भविष्य की चिंता या भय कह लीजिए कोई यह कहने को तैयार नहीं होता है कि हमसे पैसे लिये गये हैं।यहीं हाल सरकार की अन्य योजनाओं का होता है और सरकार की योजनाओं का लाभ पाने के लिए जेब ढीली करनी पड़ती है। लेकिन यह भी सच है कि जो रुपया देकर योजना का लाभ पाता है वह सरकार का अहसान नहीं मानता है और सरकार का सारा किया कराया बेकार जाता था। घर से निकले गाँव गरीब को हर जगह कामधेनु गाय की तरह दुहने का प्रयास किया जाता है और सरकार की कल्याणकारी योजनाओं के लाभ लेने लायक नहीं रहता है।यहीं कारण है कि सरकार की गैस बिजली सुविधाओं का लाभ पूरी तरह से लाभार्थी चाहकर भी नहीं ले पा रहे हैं। गाँव गरीब लोग खेती मजदूरी या छोटे मोटे धंधों से जुड़कर अपनी जीविका चलाते हैं और जीवन की हर आवश्यकता की पूर्ति करते हैं। गाँव गरीब के लिए आज भी एक हजार एक लाख के बराबर होता है।सरकारी योजनाओं का लाभ लेने में रिश्वत देने में उसका कलेजा निकल आता है और उसका बजट डाँवाडोल हो जाता है।सरकारी योजनाओं की वास्तविक स्थिति का आंकलन कर गाँव गरीब के पास पहुंचने का प्रयास तभी सफल हो सकता है कि इसमें हमेशा और हर कार्यक्रम की तरह औपचारिकता पूरी न करके ईमानदारी से अंजाम इसे मूर्ति रुप दिया जाय।रात के अंधेरे के बजाय दिन के उजाले में योजनाओं की हकीकत और गाँव गरीब के दर्द को सुनना देखना बेहतर होगा।
           भोलानाथ मिश्र
वरिष्ठ पत्रकार / समाजसेवी
रामसनेहीघाट, बाराबंकी यूपी।

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