Saturday, May 12, 2018

उसूल और सिद्धांत बदलता मनुष्य और करवट बदलती प्रकृति

मनुष्य जीवन प्रकृति से जुड़ा हुआ होता है और जो प्रकृति एवं उसके वसूलो से बंधकर जीवन जीता है उसके लिए प्रकृति अपना सबकुछ उस पर न्यौछावर कर देती है।जब तक दोनों अपने वसूलों सिद्धांतों पर अढिग रहते हैं तबतक दोनों का संतुलन बना रहता है इसलिए दोनों का समन्वय बना रहना दोनों के लिए हितकर होता है।आज बदलते युग में मनुष्य अपने वसूलों सिद्धांतों से हटता और मनुष्य ही प्रकृति का दुश्मन बनता जा रहा है। प्रकृति भी मजबूरी में अपने वसूलों सिद्धान्तों से हटकर मनुष्य के भविष्य और वर्तमान दोनों के लिए खतरा बनती जा रही है। मनुष्य और प्रकृति में हो रहे बदलाव के चलते मनुष्य का जीवन खतरे में पड़ता जा रहा है और उसे तरह तरह की दैवीय आपदाओं का सामना करना पड़ रहा था।सूर्य की तीखी किरणों को मनुष्य जीवन लायक बनाने वाली ओजोन परतों में ब्लैक होल हो गये हैं, ग्लेशियर पिघलने और पहाड़ों की शक्ल सूरत बिगड़ने लगी है।इतना ही नहीं जलस्तर तेजी से गिरने लगा है और प्रदूषण के चलते सूर्य की रोशनी का रंग बदलने लगा है।जलवायु परिवर्तन के साथ मौसम परिवर्तन होने लगा है फलस्वरूप अब चक्रवात आँधी तूफान बरसात जाड़ा गर्मी की अधिकता के साथ ही दैवी आपदाओं का प्रकोप बढ़ने लगा है। मनुष्य ने अपने फायदे के लिए प्रकृति का भविष्य खतरे में डाल दिया था तो प्रकृति ने मनुष्य जीवन का पानी का बुलबुला जैसा बना दिया है और न जाने कितनी आकाल मौतें इस समय रोजाना होने लगी हैं।हम अपने जिस विज्ञान के बल प्रकृति को ठेगा दिखा रहे थे वहीं विज्ञान समस्या का निदान कराने की जगह असहाय हो गया है। धन्यवाद।। भूलचूक गलती माफ।। सुप्रभात / वंदेमातरम् / गुडमार्निंग / नमस्कार / अदाब / शुभकामनाए
            भोलानाथ मिश्र
वरिष्ठ पत्रकार / समाजसेवी
रामसनेहीघाट, बाराबंकी यूपी

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