Saturday, May 19, 2018

राजनीति में पांव पसारती अवसरवादिता और कर्नाटक चुनाव पर विशेष

आजादी के बाद लोकतंत्र और लोकतांत्रिक प्रणाली की स्थापना करते समय जिस बात की कल्पना नहीं की गयी होगी वह आज लोकतंत्र के नाम पर होने लगा है। मतदाताओं का दिल सेवा भाव से जीतकर चुनाव जीतने की परम्परा समाप्त होती जा रही है और छल फरेब प्रलोभन जातीय एवं सम्प्रदायिक भावनाओं को भड़का कर राजनीति शुरू हो गई है। आजकल राजनीति भ्रष्टाचार का मूलस्रोत बनती जा रही है और भ्रष्टाचार को समाप्त करने वाले ही रिश्वतखोरी को बढ़ावा देने लगे हैं। पैसे के बल पर जनप्रतिनिधि बनकर विधानसभा लोकसभा पहुंचने वाला नेता खुद बिकाऊ हो जाता है और सरकार बनने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने लगता है। सासंदों विधायकों के बिकने का धंधा कोई नया नहीं है बल्कि दशकों से फलफूल रहा है और इसी राजनैतिक सौदेबाजी के चलते भ्रष्टाचार की शुरुआत हो जाती है। राजनीति में वक्त आने पर यहीं राजनेता अधिकारियों का मुँह भी पैसे से बंद करके अपना उल्लू सीधा करके नौकरशाही का मनोबल बढ़ाकर व्यवस्थापिका को भी भ्रषटाचार की तरफ उन्मुख कर देते हैं।राजनीति को भ्रष्टाचार का जननी कहना आज के बदलते परिवेश में गलत नहीं होगा जबकि राजनीति लोकतंत्र की पोषक मानी जाती है और राजनेता संरक्षक की भूमिका अदा करता है।इसी तरह लोकतांत्रिक व्यवस्था में महामहिम राज्यपाल और राष्ट्रपति को राजनैतिक महत्वाकांक्षा की पूर्ति के लिए नही बल्कि देश प्रदेश की जनता और लोकतांत्रिक व्यवस्था का संचालक होता है। उसके बाद दूसरा स्थान हमारी विश्व विख्यात न्यायिक प्रणाली को दिया गया है जो लोकतांत्रिक एवं न्यायिक मर्यादाओं का पोषक संरक्षक माना गया है।इधर कुछ दशकों से सरकार बनाने के लिए जरूरत पड़ने पर लाखों करोड़ों में खरीद फरोख्त करने में संकोच नहीं हो रहा है और समय समय पर आरोप प्रत्यारोप ही नहीं बल्कि इसकी न्यायिक पुष्टि करके सजा भी सुनाई जा चुकी है।सासंदों विधायकों की खरीद फरोख्त होने का आरोप प्रायः विपक्ष लगाता है जैसा कि भाजपा के केन्द्र में सरकार पर लगाया जा रहा है।कुछ इसी तरह के आरोप पिछले दिनों गोवा मणिपुर कर्नाटक आदि राज्यों के सम्पन्न विधानसभा चुनावों के दौरान विपक्ष लगाये जा रहे हैं और देश प्रदेश के सर्वोच्च प्रथम नागरिक के साथ न्यायाधीशों एवं न्यायिक व्यवस्था पर ऊँगलियाँ उठाकर पक्षपात करने का ढिढोरा पीटा जा रहा है। अभी दो दिन पहले सम्पन्न कर्नाटक चुनाव में पहले मतदाताओं को खरीदने की कोशिश की गई और अब विधायकों की बिक्री की बात कही जाने लगी। खरीद फरोख्त के मूल्य भी आसमान छूने लगे और इसका भाव बढ़कर सौ करोड़ प्रति विधायक पहुंच गया है। असलियत क्या है इसे वहीं बता सकता है जो उसमें शामिल रहा हो या फिर खरीद फरोख्त से विधायकों को बचाने और कमी पूरी करने की योजना बनाने में शामिल रहा हो। कर्नाटक में सभी जानते हैं कि किसी भी राजनैतिक दल को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला है लेकिन सरकार बनाने के लिए पक्ष विपक्ष दोनों लालायित है और बड़ा दल होने के नाते भाजपा के पूर्व मुख्यमंत्री यदुरप्पा को मुख्यमंत्री के पद की शपथ भी परसों दिला दी गई है। विपक्षियों की गुहार पर सुप्रीम कोर्ट इस मामले में हस्तक्षेप करके महामहिम राज्यपाल के निर्णय में संशोधन करके पन्द्रह दिनों की जगह आज ही सदन में बहुमत सिद्ध करने का आदेश दिया है। सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद पक्ष और विपक्ष दोनों अपने अपने विधायकों को सुरक्षित कर लिये हैं फिर भी कुछ बिछुड़ गये हैं। इस समय महामहिम राज्यपाल एवं सुप्रीम कोर्ट का रात में विशेष सुनवाई करने के सुनाया गया फैसला गली कूचों में चर्चा का विषय बना हुआ है और तरह के तर्क कुतर्क एवं बहस हो रही है। कुछ लोग मणिपुर गोवा का उदाहरण देते हैं और कहते हैं कि सबसे बड़े दल को सरकार बनाने के लिए बुलाने का नियम क्यों नहीं लागू किया गया? आज शाम तक तस्वीर साफ हो जायेगी कि असली सरकार किसकी बनेगी। धन्यवाद।। भूलचूक गलती माफ।। सुप्रभात / वंदेमातरम् / गुडमार्निंग / नमस्कार / अदाब / शुभकामनाएं।। ऊँ भूर्भुवः स्वः --------/ ऊँ नमः शिवाय।।।
           भोलानाथ मिश्र
वरिष्ठ पत्रकार/ समाजसेवी
रामसनेहीघाट, बाराबंकी यूपी।

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