Wednesday, May 16, 2018

राजनीतिक परिदृश्य के बदलते दौर में मतदाताओं की भूमिका

राजनैतिक परिदृश्य का बदलाव जो पिछले लोकसभा चुनाव के साथ शुरू हुआ था वह आज भी यथावत चल रहा है। राजनीति में मतदाता किसी का स्थाई दोस्त नही होता है और जिस तरह राजनैतिक पार्टियों के लोग केचुल बदलते रहते हैं। आजादी मिलने के कुछ दशक तक राजनैतिक परिदृश्य में ठहराव रहा लेकिन इमरजेंसी के बाद इसमें बदलाव होना शुरू हो गया है।इमरजेंसी में काग्रेंस का का सूपड़ा साफ हो गया और विपक्षियों का गठबंधन जनता पार्टी प्रचंड बहुमत से सत्ता में आ गयी थी। इसके बाद जनता पार्टी सत्ता से बाहर आ गयी और कांग्रेस पुनः सत्ता में आ गयी थी। इसके बाद एक बार कांग्रेस की जगह पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की अगुवाई वाला राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन सत्ता में आ गया था। यह भारतीय मतदाताओं की मतदान की शैली ही कहा जायेगा कि वह अब तवे की रोटी की तरह सत्ता में बदलाव देखने का आदी सा हो गया है। कांग्रेस के दस वर्षों तक लगातार सत्ता में रहने के बाद पिछले चुनाव में हिंदुस्तानी मतदाताओं ने कांग्रेस को नेस्तनाबूद करके प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की अगुवाई वाली भाजपा गंठजोड़ को प्रचंड बहुमत से सत्ता सौंप दी थी। नरेन्द्र मोदी और अमित शाह की बेजोड़ जोड़ी सरकार बनने के बाद से अपने राजनैतिक अश्वमेध यज्ञ को पूरा करने के लिए विपक्षी दलों खासतौर पर मुख्य प्रतिद्वंद्वी कांग्रेस के सफाये पर जुटी है और उसके अश्वमेध विजयी घोड़े को कोई रोक नहीं पा रहा था। जिन राज्यों को कांग्रेस व विपक्षियों का गढ़ कहा जाता था वहाँ पर भी मोदी शाह की जोड़ी अपना केसरिया लहराने लगा हैं।जिन राज्यों में कल तक भाजपा का वजूद नहीं था वहाँ पर भी उसका वजूद ही कायम नहीं हो रहा है उसका परचम फहराने लगा है। मोदी कार्यकाल में पिछले दिनों हुये विधानसभा चुनावों में भाजपा ने विपक्ष को जैसेे शक्तिहीन बना दिया है और वह लाख प्रयास के बाद भी भाजपा की बढ़त को रोक नही पा रहा है।प्रधानमंत्री मोदी ने पिछले दिनों चुनाव के दौरान कांग्रेस पर तंज कसते हुए कहा था कि कांग्रेस देश में सिर्फ दो राज्यों पीपी तक सीमित रह जायेगी। अभी कल आगामी लोकसभा चुनाव के अंतिम दौर के विधानसभा चुनाव की श्रंखला में कर्नाटक के चुनावों की मतगणना हुयी है।कर्नाटक को कांग्रेस और जेडीयू का गढ माना जाता है और अब तक भाजपा एक औपचारिक पार्टी के रूप में थी। कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों ने भाजपा को रोकने के लाख प्रयास किये लेकिन कोई नतीजा नहीं मिला और उसके गढ़ राज्य पर केसरिया लहराने लगा। इस चुनाव में वह सबसे बड़ी पार्टी के रुप में जनादेश लेकर आयी है और उसे अभूतपूर्व एक सौ पांच सीटें मिली हैं जबकि कांग्रेस अपनी मात्र सतत्तर सीट ही बचा पाई है।जेडीयू छासठ में सिमट गयी है और चुनाव परिणामों से विधानसभा त्रिशंकु बन गयी है। इसके बावजूद अगर परम्परा के अनुसार बड़े दल को सरकार बनाने का मौका मिलता है तो निश्चित तौर पर भाजपा यहाँ भी अपनी कूटनीति के चलते सरकार बनाने में सफल हो सकती है। अभी चुनाव परिणाम आये चौबिस घंटे भी नहीं बीते है अभी सभी दल परिणाम विश्लेषण एवं खुशी गम मनाने में लीन हैं लेकिन इसके बावजूद राजनैतिक गलियारे में राजनैतिक हलचलें परिणाम आने के तुरंत बाद से ही शुरू हो गई हैं। यह सही है कि लोकसभा चुनावों के पूर्व अंतिम दौर के इस परिणाम को आगामी लोकसभा चुनाव के परिदृश्य में बहुत महत्वपूर्ण माना जा रहा है। कर्नाटक चुनाव परिणामों ने एक बार फिर भाजपा का हौसला बुलंद कर दिया है जिससे विपक्षी प्रयासों को करारा झटका लगा है। राजनैतिक क्षेत्र में भले ही इसे आगामी लोकसभा चुनावों से जोड़ा जा रहा हो किंतु विश्व के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश के बहुमुखी मतदाताओं पर कोई भरोसा करके भविष्यवाणी नही की जा सकती है क्योंकि इनकी स्थिति क्षणे रूष्टा क्षणे तुष्टा रूष्टा तुष्टा क्षणे वाली है और शायद इसीलिए इनको मतदाता भगवान कहा जाता है। धन्यवाद।। भूलचूक गलती माफ।। सुप्रभात / वंदेमातरम् / गुडमार्निंग / नमस्कार / अदाब / शुभकामनाएं।। ऊँ भूर्भुवः स्वः -------/ ऊँ नमः शिवाय।।।
          भोलानाथ मिश्र
वरिष्ठ पत्रकार/समाजसेवी
रामसनेहीघाट, बाराबंकी यूपी।

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