Wednesday, May 23, 2018

ईश्वर से किये वादे से विमुख होता मनुष्य अपने पतन का कारक

धरती पर आने से पहले ईश्वर की गई चिरौरी अनुनय विनय और वायदे को जो मनुष्य नही भूलता है उसका जीवन ईश्वरमय हो जाता है।कहते हैं मनुष्य को पैदा होने और मरने में दुसह दुख होता है जो बर्दाश्त से बाहर होता है। इसीलिए मनुष्य दोनों समय मुक्ति के लिए ईश्वर की दिल से याद करता है और अपनी गलतियों के लिए माफी मांगता है।जब मनुष्य माता के उदर में रहता तो वह एक गंदे पानी की थैली में उल्टा लटका कैद रहता है जिसमें उसे अपार तकलीफ होती है। मनुष्य इस कैद से मुक्ति के लिए ईश्वर से तमाम अनुनय विनय चिरौरी और मुक्ति के लिए ईश्वर से उसके बताते रास्ते पर चलने का वायदा करता है। ईश्वर जब मनुष्य को उस कैद से मुक्ति दे देता है तो वह धरती पर आते ही मायामोह में फंसकर उस अपार कष्ट और वायदे को भूल जाता है।जो धरती पर आते ही ईश्वर को भूल जाता है उसे शैतान बनकर ईश्वर के दंड का भागीदारी बनना पड़ता है।ईश्वर से किये गये वायदे को भूलने का मतलब अपने आपको अपने बाप को और अपनी औकात भूलना होता है।धन्यवाद।। भूलचूक गलती माफ।।सुप्रभात / वंदेमातरम् / गुडमार्निंग / नमस्कार / अदाब / शुभकामनाएं।। ऊँ भूर्भुवः स्वः----------/ ऊँ नमः शिवाय।।।
         भोलानाथ मिश्र
वरिष्ठ पत्रकार/समाजसेवी
रामसनेहीघाट, बाराबंकी यूपी।

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