Thursday, May 24, 2018

आसमान छुटे पेट्रोल के मूल्यो से उपजे जनाक्रोश

आजकल पेट्रोलियम उत्पाद डीजल पेट्रोल आदि आमलोगों की दैनिक उपयोग की जरुरत बन गये है और कुल उत्पाद का करीब चालीस फीसदी डीजल पेट्रोल का इस्तेमाल ग्रामीण क्षेत्रों में विभिन्न रुपों में हो रहा है।आजकल समय वह आ गया है कि भले ही दो वक्त के भोजन की व्यवस्था न हो लेकिन घर में नयी पुरानी सस्ती मंहगी मोटरसाइकिल और जेब में नये जमाने वाला मोबाइल न हो। इसी तरह मध्यम वर्ग में चार पहिया सवारी लग्जरी कारों एवं सवारी वाहनों का प्रचलन तेजी से बढ़ रहा है और ऐसा गाँव मुहल्ला मिलना मुश्किल हो जायेगा जहाँ पर दो चार चार पहिया सवारी उपलब्ध न हो। इसी तरह चालीस फीसदी किसानों के पास टैक्ट्रर और डीजल नलकूप मौजूद हैं जो डीजल के सहारे चलते हैं।यही किरोसिन यानी मिट्टी तेल की स्थिति है और आज भी ग्रामीण क्षेत्रों में इसकी प्रांसगिकता एवं आवश्यकता बनी हुयी है।
कहने का मतलब डीजल पेट्रोल के मूल्य कम ज्यादा होने का सबसे ज्यादा असर ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले किसानों मजदूरों के साथ छोटे व्यवसाइयों पर भी पड़ता है।सभी जानते हैं कि देश में डीजल पेट्रोल एवं किरोसिन आदि तेल उत्पादन देशों से खरीदकर लाया जाता है लेकिन यह भी सभी जानते हैं कि यह उपभोक्ताओं तक पहुचंते पहुंचते खरीद और बिक्री के लम्बे अंतराल पर पहुंच जाता है।यह भी सभी जानते हैं कि अगर इन पेट्रोल उत्पादों पर कोई टैकस न लिया जाय तो इनके मूल्य घटकर चौथाई के आसपास हो जाय। लागत और बिक्री मूल्य में जब केन्द्र एवं राज्य सरकारों का टैक्स लग जाता है तो इनके दाम उसी के अनुरूप कई गुना बढ़ जाते हैं। सत्तर के दशक में ढाई तीन रुपये लीटर बिकने वाला डीजल आजकल छाछठ रूपये हो गया है और पेट्रोल के दाम दस पांच रूपये से बढ़कर सैकड़ा के करीब पहुंच गये है।इसी तरह रूपया दो रूपया लीटर मिलने वाला किरोसिन खुले बाजार में पैतिस चालीस रूपये लीटर हो गया है और सरकार ने अनुदान युक्त किरोसिन वितरण व्यवस्था से हाथ समेटना शुरू कर दिया है। पेट्रोल उत्पादों को "वेट" के दायरे से बाहर कर रखा गया है ताकि सरकारी खजाने में हराम की कमाई आती रहे। वैट लागू करके डीजल पेट्रोल आदि के आसमान छूते मूल्यों को जमीन पर लाया जा सकता है लेकिन तर्क दिया जाता है कि इसी टैक्स से तमाम विकास कार्य कराये जाते हैं। डीजल पेट्रोल के तेजी से बढ़ते और आसमान छूते मूल्यों से छोटा एवं मध्यम वर्ग का उपभोक्ता तिलमिला उठा है जिसकी नाराजगी को भुनाने में विपक्षी दलों ने इसे मुद्दा बना  लिया है। मतदाताओं की नाराजगी को कम करना सरकार की मजबूरी बन गई है क्योंकि अगले वर्ष मतलब छः महीने बाद लोकसभा के चुनाव होने जा रहे हैं।सरकार भी जानती है कि सस्ते मूल्य की चीनी बंद होने किरोसिन तेल के कोटे लगातार कटौती होने और डीजल पेट्रोल के सर्वोच्च शिखर पर पहुंच रहे मूल्यों से आक्रोशित है।सरकार जनाक्रोश फैलने और विपक्षी दलों को विरोध करने का मौका नहीं देना चाहती है। इसके लिए वित्त मंत्रालय और पेट्रोलियम मंत्रालय के बीच विचार विमर्श शुरू हो गया है। सरकार कोशिश कर रही है कि जनता पर पड़ने वाले बोझ को केन्द्र राज्य और पेट्रोल कम्पनियां मिलकर उठाये।सरकार इसका फैसला अगर शीघ्रता से नहीं करती है तो निश्चित है कि इसका विपरीत प्रभाव उसकी छबि और भविष्य दोनों पर पड़ेगा।कहावत है कि "अति" किसी भी किसी की किसी चींच की अच्छी नहीं होती क्योंकि "अति" बगावत को जन्म देती है। यह सही है कि पेट्रोलियम उत्पादों के मूल्यों की वृद्धि में अब अति हो गयी है और सरकार को मोटा करने में आमजनता दुबली होती जा रही है। धन्यवाद।। भूलचूक गलती माफ।। सुप्रभात / वंदेमातरम् / गुडमार्निंग / नमस्कार / अदाब / शुभकामनाएं।। ऊँ भूर्भुवः स्वः --------/ ऊँ नमः शिवाय।।
          भोलानाथ मिश्र
वरिष्ठ पत्रकार/ समाजसेवी
रामसनेहीघाट, बाराबंकी यूपी

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