Friday, June 1, 2018

इस चुनाव से नेता और जनता दोनों को सबक लेने की जरूरत है

उत्तर प्रदेश की सियासत में  पश्चिमी उत्तर प्रदेश की एक महत्वपूर्ण भूमिका है जिससे कोई भी राजनीतिक पार्टी नजरअंदाज नहीं कर सकती.  पिछले लोकसभा चुनाव और विधानसभा चुनाव इसके बेहतरीन उदाहरण हैं.  सभी को याद होगा किस तरह भाजपा ने यहां पर प्रचंड बहुमत के साथ जीत हासिल की और सत्तारूढ़ दल को चारों खाने चित कर दिया.  वह आम जनता के आक्रोश की ऐसी लहर थी जिसमें बाकी की अन्य पार्टियां उड़ गई. इसलिए  कैराना और नूरपुर का  यह उपचुनाव एक अहम सियासी संग्राम माना जा रहा था.  इसी वजह से यहां के उपचुनाव पर शुरू से ही मेरी नजर थी.
दोस्तों अब उपचुनाव संपन्न हो चुका है परिणाम हम सभी के सामने आ चुके हैं यहां की जनता ने भाजपा को नकार दिया है और महागठबंधन को स्वीकार कर लिया है.  जीत का जश्न सभी कार्यकर्ता मना चुके हैं और हारी हुई पार्टी के कार्यकर्ता शोकाकुल है.  पार्टी हार की विवेचना करने में लगी हुई है .
कैसे महागठबंधन ने एकजुट- एक मुठ होकर चुनाव लड़ा और  कैराना लोकसभा सीट तथा नूरपुर विधानसभा सीट भाजपा से छीन ली. दोस्तों मैं यहां पर आपको बताना चाहूंगा की भाजपा के लिए गोरखपुर और फूलपुर लोकसभा सीट  हारने के बाद कैराना और नूरपुर का  उपचुनाव एक सियासी परीक्षा थी. जिसमें भाजपा असफल हो गई. इस दिलचस्प मुकाबले मेरालोद की प्रत्याशी तबस्सुम हसन महागठबंधन से समर्थन प्राप्त थी
यानी कि सपा कांग्रेस और और बसपा का समर्थन.
जिन्होंने भाजपा के स्वर्गीय हुकुम सिंह पुत्री को 44,618 वोटों से हराकर सीट छीन ली.
ऐसे ही नूरपुर सीट से सपा के नईमुल हसन ने भाजपा के अवनी सिंह को 5, 662 वोटों से हराकर सीट छीन ली. इस उपचुनाव ने महागठबंधन और भाजपा को अलग-अलग  संदेश दिया है.  इस जीत ने महागठबंधन को समझाया कि यदि वे एकजुट हो जाएं तो भाजपा को रोक सकते हैं और वहीं दूसरी तरफ भाजपा को यह समझाया है यदि वे सिर्फ हवा हवाई बातें करेंगे तो उन्हें हार का सामना करना पड़ेगा क्योंकि जनता सिर्फ जुमले और वायदे नहीं सुनना चाहती वह उन्हें पूरा होते हुए देखना चाहती है इसके अलावा भाजपा को ऐसे भी फैसले लेने चाहिए थे जिस से सीधे आम मतदाता को फायदा पहुंचता लेकिन ऐसा कुछ नहीं हो पाया.
इस उपचुनाव में यह बहुत ही दिलचस्प रहा कि भाजपा का ध्रुवीकरण का कार्ड और तीन तलाक का मुद्दा भी फेल हो गया. वहीं दूसरी ओर महागठबंधन ने भाजपा के हर मुद्दे को वोट हासिल करने का स्टंट बताते हुए हवा में उड़ा दिया.यह उपचुनाव बहुत सारे एंगल से दिलचस्प रहा है जैसे भाजपा के गाजियाबाद से तथाकथित बड़े-बड़े नेताओं  तथा  पार्टी के राष्ट्रीय स्तर के नेताओं जिनमें स्वयं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी,  उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और कुछ मंत्री भी शामिल हैं जिन्होंने वहां जाकर चुनाव प्रचार किया लेकिन जनता की नब्ज और मिजाज परखने में  यह सभी फेल हो गए . भाजपा ने यहां पर अपने उसी पुराने पैटर्न पर चुनाव प्रचार किया और उन्हीं बासी हो चुके मुद्दों को उछाला जिसकी वजह से उन्हें हार का सामना करना पड़ा यानी कि भारतीय जनता पार्टी की लोकल स्तर की टीम पूरी तरह से नाकाम हो गई क्योंकि जमीनी स्तर पर क्या हकीकत है इसकी जानकारी   अपनी पार्टी को नहीं दे सकी बल्कि वह सिर्फ फोटो खिंचवाकर अखबार में और Facebook में डालकर खुश हो रही थी
इसके लिए काफी हद तक पार्टी के वरिष्ठ नेता भी जिम्मेदार हैं जिन्होंने ऐसे चाटुकारों पर भरोसा किया वहीं दूसरी तरफ गठबंधन पूरी तरह से मुस्तैद था और जमीनी स्तर पर काम कर रहा था उसने कोई भी मौका नहीं छोड़ा फिर वह चाहे अप्रैल के महीने में दलित आरक्षण वाला मसला हो या फिर किसानों के भुगतान का मसला हो.  विपक्षी गुट ने भाजपा को घेरने में कोई भी कसर नहीं छोड़ी.
यहां तक की प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की रैली और पेरिफेरल वे का उद्घाटन किसी भी काम नहीं आया.
मेरा मानना है कि मुस्लिम केमिस्ट्री और बसपा का खामोशी के साथ समर्थन देने का गेम काम कर गया क्योंकि बसपा सुप्रीमो मायावती की कांग्रेस की राष्ट्रीय नेता सोनिया गांधी और सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव के साथ तस्वीरें बहुत बड़ा संदेश दे गई दलितों को.
इस उपचुनाव का चक्रव्यू  सियासी रण का एक ऐसा प्रयोग था जिसे लोकसभा चुनाव 2019 के मद्देनजर तैयार किया गया था जिसमें महागठबंधन सफल हो गया.
इस प्रयोग से जाट,  मुस्लिम और दलित वोट बैंक भाजपा से  छिटक गया और भाजपा हिंदुओं का ध्रुवीकरण करने में असफल हो गई.
इस उपचुनाव के नतीजों ने साबित कर दिया है कि कैराना के लोग पुरानी कड़वाहट को भुला कर दोस्ती और विकास की राह पर आगे बढ़ने की कोशिश कर रहे हैं
साथ ही यह भी समझ में आता है कि बड़ी-बड़ी रैलियों और बड़े-बड़े नेताओं के भाषणों से वोटरों को ज्यादा समय तक लुभाया नहीं जा सकता.
दोस्तों चलो यह तो ठीक है की महागठबंधन का प्रयोग सफल हो गया और भाजपा को हार का सामना करना पड़ा लेकिन यहां पर सवाल यह उठता है अब इस उपचुनाव के बाद आगे क्या?
क्या महागठबंधन सन 2019 के लोकसभा चुनावों के लिए एकजुट होकर सियासी महासंग्राम में उतरेगा या फिर उसकी कोई और रणनीति होगी.?  क्योंकि इन उपचुनावों का महत्व 1 साल बाद होने वाले आम चुनावों के लिहाज से महत्वपूर्ण है.  साथ ही इस को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. इस उपचुनाव  ने रालोद को नया जीवन दिया है.
उत्तर प्रदेश का आगामी सियासी महासंग्राम  कुछ सुलगते सवाल छोड़ गया है.
1 .  सांप्रदायिक ध्रुवीकरण नहीं चलेगा बल्कि लोग भाईचारा और सद्भावना चाहते हैं
2..  बंटवारे की राजनीति भी नहीं चलेगी क्योंकि जब तक लोग कांग्रेस सपा.  बसपा और रालोद मैं  बटे हुए थे तब तक कड़वाहट और आपसी वैमनस्य था जैसे ही एकजुट हुए प्रेम और सद्भावना का माहौल बन गया.  दोस्तों मैं इसे लोकतांत्रिक एकता का उदाहरण कहूंगा.
यह चुनाव  इन राजनीतिक पार्टियों के साथ-साथ आम जनता के लिए भी आत्ममंथन का मौका है.  कि वे इन पार्टियों की वजह से आपस में बटे रहे  या फिर एकजुट रहें.
क्योंकि दोस्तों सियासत सिर्फ और सिर्फ चुनाव जीतना जानती है चाहे वह कोई भी तरीका हो उसे तो हर हाल में चुनाव जीतना है.

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